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50 हजार मजदूरों के पेट पर लात

मुद्दा

 

50 हजार मजदूरों के पेट पर लात

आवेश तिवारी सोनभद्र से लौटकर

सोनभद्र में खनन


उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कारपोरेट नीतियों ने छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 50 हजार पत्थर तोड़वा मजदूरों के मुंह से निवाला छीन लिया है. देश में असंगठित क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्यम सोनभद्र का खनन उद्योग पिछले तीन माह से बंद पड़ा है. अब सरकार ने सुरक्षा नियमों का हवाला देकर यहाँ के लगभग 155 खदानों को बंदी की नोटिस जारी कर दी है.

गौरतलब है कि यहाँ के एक अवैध खदान में मार्च में घटी दुर्घटना में 16 मजदूरों की जान चली गयी थी. इसके बाद सरकार ने जबलपुर खान सुरक्षा निदेशालय की रिपोर्ट का हवाला देकर खदानों को अगले आदेश तक बंद कर दिया था. ताजा जानकारी ये है कि लगभग 40 वर्ग किलोमीटर में फैले लाइमस्टोन और डोलोमाईट की खदानों को सरकार किसी भी तरह से जेपी एसोसिएट को सौंपना चाहती है और इसको लेकर हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.

इस इलाके में ही जेपी की डाला सीमेंट यूनिट अवस्थित है और पूर्व में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में जेपी को सैकड़ों हेक्टेयर जमीन बिना किसी नियम कायदे के दे दी गयी थी. जिसको लेकर शुरू हुआ विवाद अभी तक थमा नहीं है. इस बीच अभाव के साथ-साथ उपेक्षा से जूझ रहे खनन मजदूरों के सर पर ये बेरोजगारी, पहाड़ बनकर कहर बरपा रही है. मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार और रोजगार के अन्य विकल्पों के अभाव ने इन मजदूरों को भूखमरी के कगार पर ला खड़ा किया है.

आम तौर पर छोटी जोत की जमीन की वजह से पत्थर तोड़ने को मजबूर इन राज्यों के आदिवासी किसान अपना सब कुछ औने पौने दाम पर बेच कर या तो अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं या फिर पंजाब, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली की ओर पलायन कर रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि इस बंदी का असर सिर्फ मजदूरों पर पड़ा है. इस बंदी की वजह से जहाँ समूचे उत्तर प्रदेश में आधारभूत निर्माण कार्य ठप्प पड़े हैं. वहीँ अपने सपनों का घरौंदा बनाने के लिए बाट जोह रहे लाखों लोग सपनों को टूटता देखने को मजबूर हैं.

खनन की यह कहानी भ्रष्टाचार से शुरू होकर वहीँ पर ख़त्म हो जाती है. उत्तर प्रदेश में सरकार किसी की भी बने, मोटी कमाई का जरिया हमेशा सोनभद्र का खनन क्षेत्र ही रहता था. मुलायम सिंह यादव के पिछले कार्यकाल में उनके भाई शिव पाल सिंह यादव जब खनन मंत्री बने तो उन्होंने यहाँ के खनन उद्योग का माफियाकरण कर डाला. एक तरफ उद्यमियों से लीज के नवीनीकरण और खनन पत्तों के समुचित संचालन के लिए जमकर वसूली की गयी, वहीँ दूसरी तरफ देश भर के नामचीन माफियाओं, मंत्रियों और पत्रकारों को वैध-अवैध खनन की इजाजत दे दी गयी.

जाहिर है, पत्थर के धंधे में काली कमाई का सीधा असर मजदूरों पर पड़ा. हर महीने करोड़ों रूपए सुविधा शुल्क के रूप में देने वाले उद्यमियों ने सारे नियम कायदों को ताक पर रखकर जिनमे सुरक्षा उपाय भी शामिल थे. पहाड़ों का सीना चीर कर रख दिया. नतीजा मजदूरों की अकाल मौत के आंकड़ों में बढोत्तरी के रूप में सामने आया. पूरा इलाका डैथ वैली कहलाने लगा. सत्ता गयी लेकिन भ्रष्टाचार नहीं रुका.

मायावती के सत्तारूढ़ होते ही बाबू सिंह कुशवाहा को खनन मंत्री बनवा दिया. कुशवाहा ने अपने सिपहसालार आर पी जैसवाल के साथ मिलकर उद्यमियों को 125 करोड़ रूपए सालाना सुविधा शुल्क के रूप में देने का हुक्म जारी कर दिया. उसके अलावा अपने लोगों को सोनभद्र में गिट्टी-रेत के अवैध खनन में जम कर लूट-खसोट करने की इजाजत दे दी. कुशवाहा के समय में एक-एक लीज के लिए लाखों रूपए वसूले गए. उद्यमी पैसे देते जा रहे थे और उसकी वसूली के लिए जैसे-तैसे आँख बंद करके खनन करते जा रहे थे.

खनन क्षेत्र में हुयी दुर्घटना मायावती के कार्यकाल में अवैध खनन की बढती जा रही पैदावार का ही परिणाम था. अजीबोगरीब ये था कि जिस खनन में दुर्घटना हुयी, उसमें भी बसपा के जिला महासचिव समेत कई नेता और पत्रकार शामिल थे.

सोनभद्र और सिंगरौली की सभी खदानों में सुरक्षा नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी निदेशालय की है लेकिन वहां के अधिकारी 4-6 महीने में सिर्फ एक बार वसूली की गरज से ही आते हैं. उत्तर प्रदेश खनिज विभाग नयी नवेली दुल्हन की तरह सिर्फ मुँह दिखाई लेना ही जानता है. न अधिकारियों को न मंत्री को, किसी के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

लेकिन इस एक घटना के बाद तो जेपी के हाथों जैसे तुरुप का पत्ता लग गया. ये बात सर्वविदित है कि जेपी यहाँ के खनन क्षेत्र पर कब्ज़ा करना चाहता है क्योंकि उसे अपनी उत्पादक इकाइयों के लिए कच्चे माल की कमी पड़ रही है. जिन्होंने पूर्व सपा महासचिव अमर सिंह और जेपी के मालिक जयप्रकाश गोंड के टेप को सुना होगा, वो समझ जायेंगे कि जेपी का मुलायम सिंह की सरकार में किस कदर रसूख रहा है.

सत्ता बदली, चेहरे बदले लेकिन सरकार का रवैया नहीं बदला. घटना एक खदान में घटी थी लेकिन बंदी सारी खदानों की कर दी गयी. प्रदेश सरकार के खनन निदेशालय ने बहाना ये बनाया कि हम पुनः सीमांकन करा रहे हैं. सीमांकन ख़त्म होते ही फिर से खनन शुरू कर दिया जायेगा. लेकिन सीमांकन की प्रक्रिया बीच में ही रोक दी गयी. अजीबोगरीब ये है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी इस बंदी को गैरकानूनी मानकर एक मामले में बंद खदान को चालु करने का आदेश दिया लेकिन मौजूदा सरकार ने इस आदेश को भी ताक पर रख दिया.

मिनी भोपाल कहे जाने वाले सोनभद्र सिंगरौली पट्टी में कथित विकास की होड़ में घातक उद्योगों को नियमों का उल्लंघन करके अनुमति हमेशा से दी जाती रही है. पहले कनोडिया केमिकल, फिर बैढन और बार-बार बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र, विस्फोटों से होने वाली अकाल मौतें और उसके एवज में काली कमाई सोनभद्र की नियति है. अकेले सोनभद्र में सालाना खनन क्षेत्रों और बारूद विक्रेताओं से करोड़ों रुपयों की वसूली होती है. न सिर्फ वसूली की जाती है, धर पकड़ की धमकी देकर साझेदारी भी हथियाई जाती है.

2003 में जब हिनौत में पीएसी की गाड़ी पर माओवादियों द्वारा हमले के बाद यहाँ के खनन क्षेत्र से नक्सलियों को विस्फोटकों की आपूर्ति का राज खुला था तब गृह मंत्रालय की पहल पर विस्फोटकों के प्रयोग के नियमन की कोशिशें की गयी थी. लेकिन समय के साथ-साथ समूचे खनन क्षेत्र पर मंत्रियों, विधायकों के रिश्तेदारों, माफियाओं और दबंगों का कब्जा हो गया. अवैध खनन बढा. साथ में गैरकानूनी विस्फोटकों का इस्तेमाल भी. इन सबके बीच मजदूर हमेशा हाशिए पर रहा. चाहे सरकार किसी की हो, यहाँ के मजदूरों के लिए कमाई का पहला और आखिरी स्रोत पत्थर ही था. जब इससे भी उन्हें हाथ धोना पड़ा तो उनके सामने फिर से वापस अपने घर-गिरांव लौटने का कोई विकल्प नहीं था. वैसे भी गांव में भी रोजी कहां है?

24.06.2012, 21.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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