कुत्ते ने काटा तो पौ बारह
दवा का दावा
कुत्ते ने काटा तो पौ बारह
जे के कर
विज्ञान तथा तकनालॉजी का उपयोग मानव समाज की बेहतरी के लिये किया जाना चाहिये, न कि
उनका आर्थिक रुप से शोषण करने के लिये. विश्व भर में जितनी भी उन्नत प्रौद्योगिकी
है, उन पर धन्ना सेठों का कब्जा है. वे इनका उपयोग ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने
के लिये करते हैं. दवा कंपनियां भी इससे अछूती नहीं है.
किसी ज़माने में कुत्ता या अन्य जानवर के काटने पर दस से चौदह इंजेक्शन लगवाने
पड़ते थे. इस इंजेक्शन की कीमत करीब 225 रुपये के आसपास पड़ती थी. इस वैक्सीन रैबीज
के विषाणु को भेड़ के दिमाग में एक इंजेक्शन द्वारा डाल दिया जाता था तथा उन्हें
विकसित होने दिया जाता था. इसके पश्चात भेड़ के इस दिमाग का अर्क निकाल कर उससे
रैबीज का इंजेक्शन तैयार किया जाता था. चूंकि इस वैक्सीन में भेड़ के दिमाग का
‘फारेन प्रोटीन’ होता था, इस कारण इससे एक प्रकार का खतरनाक एलर्जिक रियेक्शन
‘एलर्जिक इनसिफेलोमेलाइटिस’ हो सकता था, जिसकी संख्या पांच हजार में एक होती थी.
इसके पश्चात करीब ढाई दशक पहले नई टेक्नालॉजी का उपयोग कर मनुष्य या पशुओं के
‘एम्ब्रायनिक टिश्यू’ का उपयोग कर रैबीज का वैक्सीन बनाया जाने लगा. सेल कल्चर के
द्वारा बनाये गये इस वैक्सीन से पहले वाले वैक्सीन के समान रियक्सन नहीं होता है.
इस नये वैक्सीन की एक मिली लीटर की मात्रा इन्ट्रामस्कुलर देनी पड़ती है. Rabipur
के एक खुराक की कीमत होती है 369 रुपया. इसकी पांच खुराक देने पर कुल खर्चा आता है
1845 रुपये. इसे विदेशी दवा कंपनी बेचती है. भारतीय कंपनियों द्वारा बनाये गये
Abhayrab की एक खुराक 298 रुपये तथा Rabivax की एक खुराक की कीमत 293 रुपये है.
इनसे भी क्रमशः 1490 रुपये तथा 1465 रुपये का खर्च बैठता है.
1984 में थाइलैंड के रेडक्रास सोसायटी ने यह तकनीक ईजाद की कि यदि इस वैक्सीन को
इन्ट्रामस्कुलर (मांस पेशियों में) लगाने के बजाये इन्ट्राडर्मल (चमड़ी के नीचे,
जैसे इन्सुलिन लगाया जाता है) लगाया जाता है तो केवल 0.1 मिलीलीटर की मात्रा से ही
काम चल जाता है.
इंट्राडर्मल में 0.1 मिली लीटर के दो इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं. अर्थात इस
प्रक्रिया से इंजेक्शन लगाने पर खर्च पांच गुना कम पड़ता है. थाइलैंड में कुत्ता
काटने का इलाज इंट्राडर्मल इंजेक्शन द्वारा किया जाता है. 1992 में विश्व स्वास्थ्य
संगठन ने इस विधि को मान्यता प्रदान कर दी. फिलीपिंस में 1993 तथा श्रीलंका में
1996 से इस विधि से ही रैबीज का वैक्सीन लगाया जाता है. भारत सरकार ने मार्च 2006
में इस इंट्राडर्मल विधि को मान्यता दे दी है.
लेकिन इस पूरे मामले में दवा कंपनियों का खेल चौंकाने वाला है. यह ठीक है कि दवा
कंपनियों ने नई टेक्नालॉजी से बने सुरक्षित रैबीज के वैक्सीन का उत्पादन तथा विक्रय
हमारे देश में किया है लेकिन इन कंपनियों ने एक और तक्नालॉजी, जिसके द्वारा इससे
पांच गुना कम खर्च पर इंट्राडर्मल उपयोग के द्वारा रैबीज का वैक्सीन लगाया जा सकता
है, उसे आज की तारीख तक भी भारत में उपलब्ध ही नहीं कराया है.
जब तक रैबीज की वैक्सीन 0.1 मिली लीटर या 0.2 मिली लीटर की मात्रा में हमारे देश
में उपलब्ध नहीं होता तब तक तक कुत्ता काटने का इलाज पांच गुना अधिक कीमत चुका कर
ही संभव है. इसकी उपलब्धता और रजिस्ट्रेशन के द्वारा ही देश के लाखों लोगों को राहत
दी जा सकती है.
2010 में भारत में लगभग 300 करोड़ रुपये कीमत की रैबीज का वैक्सीन बिका है. अगर
इंट्राडर्मल तकनीक का उपयोग भारत में किया जाता तो रैबीज के वैक्सीन पर होने वाला
खर्च केवल 60 करोड़ रुपये होता. लेकिन आज भी रैबीज का वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां
मुनाफा बटोरने के लिये अधिक मात्रा वाले वैक्सीन बना रही हैं और कुत्ता काटने का
इलाज करवाने वालों को मजबूरी में अधिक कीमत चुका कर अधिक मात्रा में वैक्सीन लगवाना
पड़ता है. दवा कंपनियों का दबाव और सरकारी तंत्र की हालत देख कर लगता नहीं है कि
अभी इस दिशा में कोई पहल होगी. जाहिर है, तब तक तो जनता को भुगतना ही है.
27.06.2012, 00.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित