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कब तक याचक देश हमारा?

बहस

 

कब तक याचक देश हमारा?

कनक तिवारी

मनमोहन सिंह


शायद गौतम बुद्ध पहले भारतीय थे जिनके उपदेशों का प्रचार भारत के बाहर दक्षिण पूर्व एशिया में किया गया. विवेकानंद दूसरे महत्वपूर्ण भारतीय थे जिन्होंने ‘अमरीकावासी बहनों और भाइयों‘ क्या कहा, पूरी धरती में भारतीय विचारों का भूचाल आ गया. गांधी ने इंग्लैंड से दक्षिण आफीका जाते हुए पानी के जहाज पर छोटी सी पुस्तिका ‘हिन्द स्वराज‘ क्या लिखी, पूरी दुनिया आज भी उससे उलझ रही है.

कहते हैं अंकगणित के अंक भारत से ही अरब देशों के रास्ते यूरोप तक पहुंचे. ज्योतिष, आर्युर्वेद, उपनिषदों के दर्शन, आध्यात्म, अहिंसा वगैरह के कई भारतीय विचार और आदर्श पूरी दुनिया को भारत की ही देन हैं. कभी यह देश यूरोपीय लोगों के लिए ‘सोने की चिड़िया‘ था जिसके पंख बार बार कतर डाले गए. कोहिनूर हीरा लूट लिया गया. ढाका की मलमल का कोई मुकाबला पश्चिमी दुनिया के पास नहीं रहा. बाद में भी जवाहरलाल नेहरू ने पूंजीवादी और कम्युनिस्ट खेमों के बीच एक तीसरी दुनिया खड़ी कर ही दी. यह देश सदियों तक दुनिया के लिए अजूबा, समृद्ध और ज्ञानी बना रहा.

आज लेकिन क्या हालत है? मनमोहन सिंह जैसे गैरराजनीतिज्ञ की अगुआई में देश का कितना पतन हो गया है. अमरीकी डॉलर भारतीय रुपए को चौबीसों घंटे दुलत्ती मारता है. अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री, योजना आयोग के आत्ममुग्ध उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बाराव, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु और सी. रंगराजन वगैरह देश को झूठी दिलासा देने से बाज़ नहीं आते कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. महंगाई देश की गृहणियों को मनोरोगों का शिकार बना रही है. भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आदत में तब्दील किया जा रहा है. काले धन के खलनायकों को कानून और लफ्फाज़ी की आड़ में बचाने वाले वित्त मंत्री देश के संविधान को बचाने के काम पर लगा दिए गए हैं.

विदेश मंत्री का स्थायी काम अन्य मुल्कों के सामने गिड़गिड़ाना रह गया है. नॉर्वे दुधमुंहे बच्चों को देने में नाक रगड़वाता रहा. आस्ट्रेलिया में भारतीयों की दिनदहाड़े हत्याएं होती रहती हैं. अमरीका में भारतीय छात्र पैरों में बेड़ियां डालकर पढ़ रहे हैं. हिन्दुत्व के बड़े पैरोकार मुख्यमंत्री अमरीकी विसा के लिए जाने कब से हाथ जोड़े खड़े हैं. खुद को किंग खान कहने वाले अमरीकी हवाई अड्डे पर बार-बार अपने कपड़े उतरवा रहे हैं. यही सलूक तो भारत के पूर्व राष्ट्रपति के साथ अमरीका कर चुका है. उस देश की विदेश सचिव सीधे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री से तीस्ता नदी के बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे और विदेशी प्रत्यक्ष पूंजी निवेश को लेकर भारतीय संविधान की मनाही के बावजूद चर्चा कर रही हैं. अमरीकी अदालतें यूनियन कार्बाइड के सरगनाओं को खुलेआम छोड़कर हजारों बेबस भारतीयों को तमाचे मार रही हैं.

पड़ोसी घुड़की देते रहते हैं. चीन अब भी भारतीय धरती पर बेजाकब्जादार है. वह ब्रम्हपुत्र नदी की धारा को मोड़ता रहता है. वह वैज्ञानिक परीक्षण करता है कि भारत में प्राकृतिक मानसून नहीं बरसे. उसने पाकिस्तान से मौसेरे भाई का रिश्ता बना रखा है. उसके कारण सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का बखेड़ा है.

‘आस्तीन के सांप‘ वाली कहावत तो पाकिस्तान चरितार्थ कर रहा है. भारत में हुए प्रत्येक आतंकी हमले की योजना उसी देश में बनती है. कसाब से लेकर अबू सलेम और दाउद इब्राहीम जैसे आतंकियों का वह मादरे वतन है. वह सरबजीत को छोड़ने का ऐलान करके यू टर्न कर लेता है. प्रसिद्ध भारतीयों के जन्म स्थान बंटवारे के कारण पाकिस्तान में हैं. वहां भारतीयों के जाने में वह रोड़े अटकाता है.

श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने को लेकर राजीव गांधी को अपना जीवन होम करना पड़ा. एकद्रष्टा करुणानिधि के कारण भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट देकर उसे अपना शत्रु बना लिया. म्यामांर की सू की के पक्ष में प्रजातंत्र की ताकतों को भारत मुनासिब समर्थन देने में भी परहेज कर रहा है. नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने के बावजूद वहां के जनमानस में भारत विरोधी बयार बह रही है.

अरब मुल्कों और ईरान से तेल खरीदने के मामले में इस देश की सरकार अमरीका के चंगुल में है. उसने अपनी परमाणु नीति को प्रदूषित कर लिया है. दुनिया के बाजारों में प्रतिबंधित दवाइयां भारतीय मरीज़ों को खिलाई जा रही हैं. विदेशी बैंक और बीमा कंपनियों की जीभें भारतीय जेबों को देखकर लपलपा रही हैं. विदेशी शिक्षा संस्थान और वकील दौलत कमाने के लिए भारत में आने आने को हैं. सरकारें उन्हें न्यौता दिए पड़ी हैं. भारतीय सीमेंट, इस्पात और विद्युत कंपनियां विदेशी दैत्याकार कंपनियों की एजेंट बनी हुई हैं. विदेशी अजगर भारतीय सांपों को निगलना चाहते हैं. दोनों का मकसद सामान्य भारतीयों को कीड़ा मकोड़ा समझकर लील जाने का है.

देश में कृषि भूमि सिकुड़ रही है. गोदामों के अभाव में खुलेआम अनाज सड़ाया जा रहा है. किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. नेता घोटाले कर रहे हैं लेकिन केवल 10 प्रतिशत के अनुपात में पकड़े जा रहे हैं. अंगरेज़ घिसटने वाली न्याय प्रणाली दे गया है. किसी अभियुक्त-नेता को कभी सजा नहीं होती. मिस्त्र, लीबिया, सीरिया, यमन, इटली, यूनान जैसे देशों में जनता हिम्मत के साथ बगावत करती है. काहिरा में तहरीर चौक अमर हो गया है. भारत की महान जनता ठीक से उफ तक नहीं करती.

विवेकानंद और गांधी ने कहा था- बगावत करो. सविनय अवज्ञा करो. बहिष्कार करो. गलत बात को मत मानो. भगतसिंह ने कहा था हंसते हंसते सजा कबूल करो लेकिन आत्मा के साथ समझौता मत करो. उस रास्ते पर डायलिसिस पर चलते जयप्रकाश ने आगे कदम बढ़ाए थे तो देश में भूचाल आ गया था. आपातकाल की उद्घोषिका इंदिरा गांधी तक ने अमरीकी घुड़की से बेपरवाह बांग्लादेश आखिर बनवा ही दिया.

एक मुख्यमंत्री गाजर मूली की तरह अल्पसंख्यकों को कटवाने को राष्ट्रवाद कहता है. एक मुख्यमंत्री के लिए खुद की पत्थर की मूर्तियां बनवाना दलितों की सेवा है. एक तुनकमिजाज मुख्यमंत्री किसी न किसी का रोज मुंह नोचती रहती है. एक मुख्यमंत्री लोकायुक्त कानून के अष्टावक्र में फंसकर अरण्यरोदन कर रहा है. एक मुख्यमंत्री अपनी पत्नी सहित अधिकारियों से खुलेआम घूस मांगता पकड़ा गया है.

तीन मुख्यमंत्री अपने और रिश्तेदारों के लिए छोटे छोटे फ्लैट हड़पने के नाम पर खुद को महान प्रशासक मान रहे हैं. एक मुख्यमंत्री अपने कुनबा समेत हजारों करोड़ रुपयों की संपत्ति कबाड़ने के बाद भी जेल के बाहर हैं. तरह तरह के राजनीतिक ढिंढोरची चुनावों के समय एक जुट होकर सत्ता के इर्द गिर्द चिपके रहने में सिद्धहस्त हो गए हैं. आदिवासियों और किसानों की जमीनें छिन रही हैं. चम्बल के डाकुओं का प्रभार नक्सलियों ने ले लिया है. अमीरों को टैक्स से छूट और गरीबों पर टैक्स की मार का नया अर्थशास्त्र एक नया कौटिल्य लगातार लिख रहा है. इतिहास उसे बांच रहा है.

भारतीय प्रेस परंपरा से छिटककर सेठियों का प्रवक्ता हो गया है. ग्रामीण जीवन की रिपोर्टिंग केवल तीन प्रतिशत खबरों तक सिमट गई है. विज्ञापनों को समाचारों की तरह छापा जाता है. संपादकों से दलाली का काम लिया जाता है. संवाददाताओं से घरेलू काम कराए जाते हैं. कुछ चुनिंदा पत्रकार टेलीविजन के स्थायी प्रवक्ता हैं. वे महंगी शराब, सुंदर औरतों, अरबपति धनाड्यों, रसूखदार राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट अफसरों वगैरह की सोहबत के लिए तड़पते रहते हैं. छात्र चुनाव नहीं लड़ सकते लेकिन विधायिका के मतदाता बना दिए गए हैं. सरकारें प्राकृतिक संसाधनों को बेशर्मी से बेच रही हैं. अगली पीढ़ियों का इतिहास अभी से मिटाया जा रहा है. भारतीय सहिष्णु तो हैं लेकिन दब्बू क्यों हैं? भारतीय आत्मा के योद्धा तो हैं लेकिन पस्त हिम्मत क्यों हैं? भारतीय दाता तो हैं लेकिन याचक क्यों बन गए हैं?

29.06.2012, 20.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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