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2 जून के आतंक से बिहार की छवि बिगड़ी

संवाद

 

2 जून के आतंक से बिहार की छवि बिगड़ी

बिहार के अवकाश प्राप्त मुख्य सचिव वी एस दुबे से पुष्पराज की बातचीत


वर्ष 2012 का 2 जून बिहार के इतिहास में एक ‘‘दहशत भरे काले दिन’’ की तरह याद किया जायेगा. बिहार की राजधानी पटना को कुछ घंटों के लिए बलवाइयों के हवाले कर दिया गया था. रणवीर सेना के संस्थापक-प्रमुख, 277 मनुष्यों की हत्या के अभियुक्त बह्मेश्वर सिंह की लाश को रणवीर समर्थक कंधे पर लेकर पटना की गंगा में अंत्येष्टि के लिए आये थे. गौरतलब है कि मृतक के निवास से निकट में सोन और गंगा नदी मौजूद है.

वी एस दुबे

 
प्रतिबंधित आतंकी संगठन रणवीर सेना के हथियारबंद लोगों की शव यात्रा से पटना सिहर उठा. पुलिस की सख्ती से राजधानी की दुकानें बंद करायी गयीं और शवयात्रा की दहशत से नगर कांपता रहा. पुलिस चौकी, पुलिस की गाड़ियाँ, देवता के मंदिर धू-धूकर जलते रहे. दर्जन भर छायाकार-पत्रकारों को बलवा कवरेज करते हुए बेरहमी से पीटा गया. जानकार बताते हैं कि सेवा यात्रा में शामिल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद विधि-व्यवस्था पर नजर रख रहे थे. मुख्यमंत्री ने सेवा यात्रा से लौटकर 2 जून के उस ‘दहशत भरे काले दिन’ के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है.

बिहार के पुलिस महानिदेशक का बयान आया है कि किसी संभावित बड़ी हिंसा के मद्देनजर बलवाइयों को छेड़ना पुलिस ने उचित नहीं समझा. चैनलों से बलवाइयों के हवाले पटना का दृश्य पूरे देश में प्रसारित होता रहा. मीडिया ने राजधानी पटना को बलवाइयों के हवाले छोड़ने वाले राज्य सरकार से ना ही सवाल-जवाब किया है ना ही बिहार के विपक्ष ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेड़ने की कोशिश की है. देश के जिन प्रतिष्ठित पत्राकारों ने कल तक नीतीश कुमार के सुशासन सरकार की छवि को विश्वख्याति दिलाने की भूमिका निभायी, उन्होंने भी 2 जून 2012 को पटना क्यों जलता रहा, इस सवाल पर चुप्पी साध ली है.

कहा जा रहा है कि 2 जून को पटना में जो दहशत और आतंक कायम हुआ, वह आतंक आजादी के बाद पहली बार पटना नगर में देखा गया. क्या एक लोकतांत्रिक प्रदेश की राजधानी को एक लोकतांत्रिक सरकार बलवाइयों के हाथ में सुपुर्द करने का हक रखती है? क्या 4-5 हजार बलवाइयों को राजधानी में प्रवेश से रोकने या उन पर नियंत्रण पाने में पटना की पुलिस अक्षम थी? पुराने लोग जानते हैं कि 5 जून, 1974 को जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की रैली पर इंदिरा ब्रिगेड के गुंडों ने गोली चलायी थी, उस समय पटना नगर में बड़ा बलवा हो सकता था.

पटना को उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी वी.एस. दूबे ने अपने प्रशासनिक कौशल से जलने से बचा लिया था. देश की प्रधनमंत्री इंदिरा गांधी के नामधारी संगठन के बलवाइयों को जेल भेज कर पटना को बचाने वाले चर्चित जिलाधिकारी वी.एस. दूबे कालांतर में बिहार के मुख्य सचिव हुए. जिलाधिकारी और मुख्य सचिव के रूप में चर्चित प्रशासक वी.एस. दूबे से 2 जून, 2012 के हालात और विधि-सम्मत विकल्पों पर खुल कर बातचीत की गई है-

अगर एक नगर को मुख्यमंत्री और डी.जी.पी. के निर्देश पर बलवाइयों के हाथ जलने के लिए छोड़ दिया गया हो तो एक जिलाधिकारी या मुख्य सचिव क्या अपनी ताकत से नगर को बचा सकता है ?

एक कलक्टर शहर को बलवाइयों से बचाने में सक्षम है. कर्तव्यपालन ना करने का लिखित आदेश मुख्यमंत्री या पुलिस महानिदेशक नहीं दे सकते हैं. कर्तव्यपालन ना करने का मौखिक आदेश निंदनीय है. कलक्टर को हर हाल में कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए नगर को बचाने की जिम्मेवारी स्वीकारनी होगी. अगर जिलाधिकारी किसी भय या दवाब से अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पा रहा हो तो यह दुखद है. कलक्टर को विषय परिस्थिति में कानूनी शक्ति का विवेकपूर्वक निर्वाह करना होगा. अगर कलक्टर डीजीपी के निर्देश से पीछे हटते हैं तो यह कलक्टर का बचकाना फैसला है.

5 जून, 1974 को पटना में कांग्रेसी सरकार के विधायक निवास से इंदिरा ब्रिगेड के गुंडों ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली विशाल रैली पर गोली चला दी थी. तब आपने पटना के जिलाधिकारी की हैसियत से किस तरह संभावित हिंसा पर नियंत्रण कायम किया था? क्या इंदिरा गांधी के नाम से जुड़े ब्रिगेड के गुंडों को गिरफ्तार करने पर आपको सरकार की नाराजगी भी झेलनी पड़ी ?

जे.पी. के नेतृत्व वाली रैली गांधी मैदान की तरफ बढ़ रही थी, तो हड़ताली मोड़ के पास एक विधायक निवास की खिड़की से इंदिरा ब्रिगेड के गुंडों ने रैली पर पीछे से गोली चला दी. एक आंदोलनकारी घायल भी हो गया. मैंने सोचा कि अगर जन सैलाब बदले की भावना से प्रतिक्रिया करेगा तो नगर में विधि-व्यवस्था संभालना मुश्किल हो जायेगा. हमने 5 मिनट के अंदर इंदिरा ब्रिगेड के गुंडों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और गांधी मैदान में हो रही सभा में जे.पी. को सूचना दी कि आंदोलनकारियों पर गोली चलाने वालों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है. जयप्रकाश नारायण ने हमारी सूचना को मंच से जन समूह को बताया और जिला प्रशासन को इस कार्रवाई के लिए धन्यवाद दिया.

मैंने एक जिलाधिकारी की हैसियत से अपने दायित्व का निर्वाह किया और अपनी निष्पक्षता, तटस्थता से संभावित हिंसा को रोक दिया. तब मुख्य सचिव, डीजीपी मुख्यमंत्री किसी ने भी जिलाधिकारी की आलोचना नहीं की. मैं इस घटना के बाद साढ़े तीन वर्ष लगातार पटना का जिलाधिकारी रहा. मुझे इंदिरा ब्रिगेड के गुंडों को जेल भेजने के बाद ना ही किसी तरह से परेशान किया गया ना ही किसी ने कोई धमकी दी. लेकिन यह सच्चाई है कि इंदिरा ब्रिगेड का गुंडा जेल से लौटकर कांग्रेस का एम.एल.सी. बनाया गया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ram Balak Roy [rambalaksahara@gmail.com.] samastipur - 2012-07-29 14:49:12

 
  मुझे कई जानकारियां आपकी वेबसाइट से मिली इसके लिए घन्यवाद.  
   
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