प्रणव मुखर्जी की बेचारगी
बाईलाइन
प्रणव मुखर्जी की बेचारगी
एम जे
अकबर
प्रणब मुखर्जी के साथ जो घटित हो रहा है वह एक निर्मम
मजाक कहा जा सकता है. हालांकि, यह असामान्य नहीं है. पोप हों, संपादक हों, चीफ
एग्जीक्यूटिव्स हों या फिर पूर्व वित्त मंत्री, सभी के साथ ऐसा होता रहा है.
वैटिकन कभी भी अपने पुराने पादरियों के असमंजस का प्रचार नहीं करता. इसकी वजह उस
संस्था की पवित्रता और गरिमा है. लेकिन, किसी संपादक या दूसरे लोगों के लिए यह खबर
बेहद खराब है, जिनके पास किसी किस्म की ईश्वरीय ताकत नहीं होती.
जब तक आप सत्ता में होते हैं, आप पर ईश्वरीय कृपा बनी रहती है. लेकिन, आप सत्ता से
बेदखल हुए नहीं कि आपकी प्रतिष्ठा और मर्यादा पर दबी हुई कुंठाओं, प्रतिशोध और
महत्वाकांक्षाओं के हमले शुरू हो जाते हैं. असल जिंदगी में खाली कुर्सी जैसी कोई
चीज नहीं होती. कोई भी शख्स न तो अपने सेवक और न ही अपने उत्तराधिकारी के लिए नायक
जैसा होता है. प्रणब मुखर्जी के मामले में असामान्य पहलू यह है कि उनके पूर्व बॉस
ही उनके उत्तराधिकारी हैं.
मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन की ओर कदम बढाने के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने
वित्त मंत्रालय की कमान संभाल ली है. भारतीय लोकतंत्र के छह दशक बीत जाने के बावजूद
भारत में राजनीतिक, आर्थिक और मीडिया जगत के अभिजात्य लोग अभी तक पूरी तरह यह नहीं
जान पाये हैं कि सरकारों का कामकाज कैसे चलता है?
नीतियां बनाना कैबिनेट का विशेषाधिकार है. प्रधानमंत्री आर्थिक, विदेश या घरेलू
नीतियों के प्रति अपनी जवाबदेही से इनकार नहीं कर सकते. आखिर, प्रणब मुखर्जी ने
किसी स्वायत्त राज्य के राजा की तरह देश की वित्तीय नीतियां नहीं बनायीं. सच यह है
कि प्रधानमंत्री की स्वीकृति के बिना कोई भी नीति शक्ल ले ही नहीं सकती.
मंत्री का काम इन नीतियों को लागू करने का है. अगर मुखर्जी इस बिंदु पर चूक गए, तो
इसके लिए कई ऐसी वजहें जिम्मेदार थीं, जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं.
सुर्खियों में आये रिटेल सेक्टर में प्रयत्क्ष विदेशी निवेश के मुद्दे को ही लें.
इस फैसले को रोकने वाले मुखर्जी नहीं थे. उन्होंने तो किसी भी दूसरे व्यक्ति की
तुलना में इसकी सबसे ज्यादा पैरवी की थी. वे यह जानते थे कि सरकार के पास इस फैसले
को आगे ले जाने के लिए बहुमत नहीं हैं, इसलिए उन्होंने खुद को रोक लिया था.
यहां सिर्फ ममता जैसे सहयोगियों का ही मसला नहीं था, उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस में
भी एक बड़ा गुट इसके खिलाफ था. ऐसे में अगर प्रणब आगे बढ़ते, तो मनमोहन सिंह की
सरकार के ढहने का खतरा था. इस जोखिम को उठाने को न तो मनमोहन तैयार थे और न ही
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही.
मुखर्जी खुद यह कह चुके हैं कि वे आरबीआइ के राजकोषीय फैसलों पर कुछ खास नहीं कर
पाये, क्योंकि गवर्नर डी सुब्बाराव ने उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया.
अब प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्रालय की कमान संभालते ही अपने सहयोगियों से आगे बढ़कर
एनिमल स्पिरिट अपनाने को कहा है. हमें जल्द मालूम पड़ जाएगा कि ये अधिकारी किस
जानवर से प्रेरणा लेते हैं. लेकिन, प्रधानमंत्री अभी इससे भी मुश्किल समस्या से जूझ
रहे हैं. अधिकारियों में एनिमल स्पिरिट जाग पाती है या नहीं, यह कहना मुश्किल है,
लेकिन मुखर्जी की विदाई ने कैबिनेट मंत्रियों में इस सोच को जरूर उभार दिया लगता
है.
प्रणब की पुरानी कुर्सी के कई दावेदार हैं. कई मंत्री इस संघर्ष में शमिल हो गये
हैं. बड़े कॉरपोरेट अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुट गये
हैं.
मेरे ख्याल से ये भद्र लोग एक बड़ी गलती कर रहे हैं. वे प्रधानमंत्री को कम करके
आंक रहे हैं. प्रधानमंत्री ने जल्द ही मंत्रिमंडल में बदलाव का इशारा किया है.
लेकिन यह ‘जल्दी’ अपने आप में काफी लचीला है और इसका अर्थ ‘प्रतीक्षा’ भी हो सकता
है. राष्ट्रपति चुनाव से पहले कोई नाटकीय बदलाव नहीं हो सकता है.
इसके बाद उपराष्ट्रपति के चुनाव होंगे, और ठीक इसके बाद मानसून सत्र शुरू हो
जायेगा. जब वह खत्म होगा, तब तक मौसम काफी बदल चुका होगा और गुजरात चुनाव सामने
होगा. नवंबर के आते ही सारी चर्चा अगले बजट पर सिमट जायेगी.
हालांकि, राजनीति, ‘निश्चित’ शब्द का विलोम है, लेकिन इसकी उम्मीद काफी ज्यादा है
कि 1996 के बाद पहली बार मनमोहन अपना पहला बजट पेश करेंगे. इस पूरी कवायद की
खूबसूरती यह है कि कैलेंडर के तारीख ही प्रधानमंत्री के लिए एजेंडा तय कर देंगे. यह
कभी मत भूलिए कि मनमोहन सिंह ने राजनीति की दीक्षा उन्हीं नरसिंह राव से ली है, जो
अपनी प्राणरक्षा में माहिर थे.
जिन लोगों ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का पर्चा भरने के बाद देखा है, वे
बताते हैं कि वे कभी इतने निश्चिंत और खुश नहीं दिखाई दिये. निश्चिंतता इस बात की
है कि उन्होंने दिल्ली की सत्ता संस्कृति को पीछे छोड़ दिया है. खुशी आसानी से समझ
में आने वाली है. कोई भी दिखाई देने वाला कारण उन्हें राष्ट्रपति भवन का 13वां
निवासी होने से नहीं रोक सकता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के
संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
01.07.2012, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित