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बस्तर के कोहराम में जय हो ननकीराम!

बहस

 

बस्तर के कोहराम में जय हो ननकीराम!

कनक तिवारी

ननकी राम कंवर


छत्तीसगढ़ के आदिवासी गृह मंत्री ननकीराम कंवर गैर जिम्मेदार, विवादास्पद और मनोरंजक बयान देने में महारत हासिल किए हुए हैं. उनकी पिछले पोलिस महानिदेशक से पटरी नहीं बैठी. उन्होंने धर्मसेना की तरह ननकी-सेना का भी गठन कर लिया था जिसे छापा मारने की कथित अनुमति दी गई थी. पोलिस अधिकारियों के मनमुआफिक स्थानांतरण नहीं कर पाने का मलाल गृह मंत्री के लिए एक खरोंच की तरह सालता रहता है.

सहकारिता विभाग में भी ऊलजलूल, असंवैधानिक और अधिकारिताविहीन आदेशों के जरिए ननकीराम कंवर ने अपना निजी अर्धन्यायिक ज्ञानशास्त्र गढ़ लिया है. राज्य के पूर्व अध्यक्ष राजस्व मण्डल के कथित अवैधानिक आदेशों के खिलाफ खुद राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की हैं. लेकिन ननकीराम कंवर के मामले में उनसे न्यायिक अधिकार वापस लेना तो दूर समुचित समझाइश भी दिए जाने का कोई समाचार नहीं है. गृह मंत्री पद का जो प्राकृतिक रुतबा होता है उससे वंचित होने के कारण ननकीराम कंवर समाचारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए सुविचारित वक्तव्य कम देते हैं प्रलाप ज्यादा करते हैं.

बस्तर को नक्सली गतिविधियों के कारण धीरे-धीरे संसार का सबसे बड़ा श्मशान बनाया जा रहा है. जिस इलाके में पर्यटन होता था वह शव यात्राओं का पैशाचिक बोझ ढो रहा है. बस्तर के आदिवासी गुमनाम इकाइयों की तरह घर, गांव और जंगल की बांबियों में जीने का बोझ लिए मरने को अभिशप्त हैं. कथित छत्तीसगढ़ी राजभाषा से उनका कोई परिचय नहीं है. नक्सली उनमें से एक बड़ी आबादी को अपना बंधुआ मजदूर बना चुके हैं. बहुत से आदिवासी डर के कारण अतिथि नक्सलियों की आवभगत भी करते हैं. कुछ विरोध या असहमति प्रकट करते हैं तो उनका नक्सली कत्लेआम करते हैं.

छत्तीसगढ़ के पुलिसिया जवान या कोबरा बटालियन वगैरह के सदस्य, बेहद विषम परिस्थितियों में उनका संघर्ष जारी रखे हुए हैं. पुलिस के आला अधिकारी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं सिवाय इक्का दुक्का अपवादों के. बस्तर में नक्सल उन्मूलन के नाम पर केन्द्र सरकार द्वारा प्रेषित धन की कमी नहीं है. केन्द्रीय गृह मंत्री अत्यंत अमीर परिवार के कुलशील, उच्च शिक्षित, वाक्पटु कांग्रेसी नेता हैं जो राज्य की नौकरशाही के सूचना तंत्र पर मुग्ध हैं.

राज्य शासन के मुखिया नक्सलियों के सामने घुटने टेकने को तो क्या, उनसे किसी तरह खौफ खाने तक को भी तैयार नहीं हैं. सुकमा कलेक्टर के अपहरण को यदि अपवाद समझा जाए तो मौजूदा राज्य सरकार नक्सलियों से मैदानी लड़ाई लड़ने को प्रतिबद्ध है. बकौल केन्द्रीय गृह मंत्री ग्रीन हंट नाम का शब्द राज्य के पूर्व पुलिस मुखिया ने ईजाद किया था. लाल क्रांति के स्वयंभू पैरोकार नक्सली ग्रीन हंट शब्द से उसी तरह भड़कते हैं जैसे सांड लाल कपड़े से. केन्द्रीय योजना आयोग की टीम ने बस्तर सहित देश के तमाम नक्सली इलाकों का व्यापक सर्वेक्षण किया है. कई सिफारिशें की गईं लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने उस रिपोर्ट पर न तो व्यापक विचार किया है और न ही उसे सार्वजनिक किया है.

सरकारों को नागरिक समाज से कुछ लेना देना नहीं है. वह उसे केवल वोट बैंक समझती है और उसकी निष्क्रियता बल्कि पंगुता से अच्छी तरह आश्वस्त है. छत्तीसगढ़ में बौद्धिक पदों की खुरचन चाटने वाले बुद्धिजीवी बस्तर से पूरी तरह नावाकिफ हैं और राज्य स्तुति में संलग्न हैं.

ननकीराम कंवर का कथन यदि समाचार पत्रों में विकृत होकर प्रकाशित नहीं हुआ है तो उसके अनुसार उन्हें ऐसे आदिवासियों के अर्धसैनिक बल द्वारा मार दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है बल्कि प्रसन्नता है जिन्होंने किसी भी कारण नक्सलियों को अस्थायी संरक्षण या सोहबत प्रदान की हो. यक्ष प्रश्न यह है कि क्या बस्तर के भोले भाले आदिवासी नक्सलियों को आमंत्रित करते होंगे? आदिवासी तो उकताकर यही चाहते हैं कि सभ्य समाज का कोई भी नुमाइंदा बस्तर में आए ही नहीं.

यदि टाटा की सल्तनत फुलानी हो और एस्सार स्टील पर नक्सलियों की मदद करने की तोहमत लगे या सरकारी खनिज विकास निगम लौह अयस्क खोदकर उसे विदेशों में बेचने की दलाली करे तो ऐसे में आदिवासी बस्तर में सरकारी आर्थिक विकास भी नहीं चाहते. वे नहीं चाहते कि जंगल, पुलिस, राजस्व और खनिज विभाग के अधिकारी उनकी खेती की जमीन, फसलें, वनोत्पाद, बच्चों और बहू बेटियों का शोषण करें. वे नहीं चाहते कि देसी विदेसी पर्यटक वहां आकर बस्तर ललनाओं के अर्धनग्न चित्र खींचकर उसकी प्रदर्शनियां लगाएं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

satyendra [satyendra3110@gmail.com] raipur - 2012-07-02 19:08:44

 
  kathan : कथित छत्तीसगढ़ी राजभाषा से उनका कोई परिचय नहीं है. नक्सली उनमें से एक बड़ी आबादी को अपना बंधुआ मजदूर बना चुके हैं. बहुत से आदिवासी डर के कारण अतिथि नक्सलियों की आवभगत भी करते हैं. कुछ विरोध या असहमति प्रकट करते हैं तो उनका नक्सली कत्लेआम करते हैं.

pratikriya : सर जी .... लोक भाषा का तो अत्यधिक महत्व है ... वहां के लोग न हिंदी समझते हैं .. न ही छत्तीसगढ़ी ... उनकी भाषा तेलुगु के निकट है ... इसीलिए उत्तर आन्ध्र प्रदेश के नक्सली मुखिया जन के द्वारा ये आसानी से बरगलाए जाते हैं .... इस स्थिति से बचने के लिए राज्य शासन को उस क्षेत्र में पदस्थापना के पूर्व अधिकारियों को वहां की भाषा का कार्यिक ज्ञान अवश्य कराया जाना चाहिए ... यह सत्य है कि उत्तर आन्ध्रा के इन मुखियाओं ने इन्हें बंधुवा बना रखा है ... उस क्षेत्र की प्रचुर संपदा का दोहन भोले भाले आदिवासियों की सहायता से कर, अपने बच्चों को विदेशी कालेज और दिल्ली आदि की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं... जो उनके दोहन तंत्र का विरोध करते हैं उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं ...क्योंकि सरकारी सुरक्षा व्यवस्था एक एक आदमी कि लम्बे समय तक सुरक्षा नहीं कर सकती ... आज साथ दिए तो कल मरना तय है ... इसीलिए सलवा जुडूम कि अवधारणा सही थी ... कम से कम ५० गावों की बिखरी जनसंख्या एक जगह पर साथ रह कर अपनी सुरक्षा स्वयं करने में सक्षम तो थी ..
 
   
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