येदियुरप्पा और पत्नी के हाथ का शोरबा
बाईलाइन
येदियुरप्पा और पत्नी के हाथ का शोरबा
एम जे
अकबर
यह कहानी सच्ची है. मेरे पास ऐसी कहानी बनाने लायक उम्दा
कल्पनाशक्ति नहीं है. न ही मेरा मानना है कि ब्रिटिश अखबार द संडे टाइम्स के
संपादकों के पास ही ऐसी कल्पना शक्ति हो सकती है, जहां मैंने यह कहानी पढ़ी है.
एक रूसी अपनी पत्नी द्वारा खराब शोरबा परोसे जाने से गुस्से में आकर जंगल में भाग
गया. वह वहां भूख के कारण लगभग मौत की कगार पहुंच गया था. एक महीने बाद जब वह मिला
तो ठंड के कारण सुन्न हो गया था.
घर पहुंच कर उसने एक दार्शनिक बात कही- आखिरी बार मैंने अपनी पत्नी के खाने की
आलोचना की है. उसने सबक सीख लिया. सबक क्या था? गुस्से में कभी घर ना छोड़ें. आपने
पत्नी से शादी की है, खाना बनानेवाली से नहीं. आपको घर की सच्चाइयों के साथ चलना
होता है.
मेरे लिए हमेशा ताज्जुब का विषय रहा है कि राजनेता इस बात को नहीं समझते कि उनका
पार्टियों के साथ संबंध हमेशा अच्छे या बुरे के लिए होता है. समय के साथ आपका भाग्य
भी बदलता रहता है और अगर आप नाराज होकर पार्टी से बाहर चले जाते हैं, तो वह आपकी
नियति है. नाराज होने के विशेषज्ञ कर्नाटक भाजपा के बीएस येदियुरप्पा के लिए यह
बिल्कुल सही कहानी है.
मैं उनकी उम्र नहीं जानता, लेकिन उनका राजनीतिक निर्णय किसी बच्चे की तरह है, जो यह
सोचता है कि वह परिवार का पालन करने के लिए कमा रहा है. यह सोच गलत है. आप धमकी
देकर आगे नहीं बढ़ सकते. घर खड़ा रहेगा और आपके द्वारा पहुंचाये गये नुकसान की
भरपाई की जा सकेगी, भले इसका तात्कालिक परिणाम अस्थायित्व ही क्यों ना हो.
अगर भाजपा कमजोर दिख रही है तो इसकी वजह पार्टी हाइकमान का यह अनूठा विश्वास है कि
अगर थोड़ा झुक जायें, तो सभी बवंडर से पार पाया जा सकता है. यह स्वयंसिद्ध है कि
कर्नाटक में भाजपा हाइकमान का फैसला पूरे देश में पार्टी की छवि पर असर डालेगा,
क्योंकि वोटर सब कुछ देख रहा है. वोटर नहीं चाहता कि वह दिल्ली में एक खराब सरकार
के बदले बदतर सरकार का चयन करे.
भाजपा के अंदर कुछ काबिल लोग इस बात को आगे बढ़ा रहे हैं कि कर्नाटक में पार्टी के
समक्ष उत्पन्न संकट के लिए जातिगत प्रतिस्पर्धा मूल वजह है. यह कुछ नेताओं द्वारा
स्वयं खड़े किये गये संकट का बहाना भर है, जो तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सत्ता
में वापस आ रहे हैं या नरक की ओर बढ़ रहे हैं.
येदियुरप्पा के लिए सबसे सरल और सटीक विवरण यह है कि वे इस बात से वाकिफ हैं कि
राज्य में भाजपा की वापसी की कोई संभावना नहीं है. ऐसे में विधायकों के साथ रहते जो
कुछ हासिल किया जा सकता है, कर लिया जाये.
कर्नाटक के दो उत्कृष्ट मुख्यमंत्रियों- कांग्रेस के देवराज उर्स और जनता पार्टी के
रामकृष्ण हेगड़े के दौर में भी जाति और उसके विरोधाभास कुछ अलग नहीं थे. उर्स और
हेगड़े शांत और आत्मविश्वासी थे. आपातकाल के बाद उत्तर भारत में मिली करारी हार के
बाद उर्स ने जाति और आरक्षण का प्रयोग चालाकी से कर कांग्रेस के आधार को कर्नाटक
में व्यापक बनाया.
हेगड़े ने अभिजात तरीके से जमीनी स्तर की राजनीति को समझते हुए भारतीय इतिहास में
सबसे बड़ी विजय हासिल की. 1984 में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ हो रहे थे.
विधानसभा में उन्हें पूर्ण बहुमत हासिल हुआ, जबकि संसदीय चुनाव में राजीव गांधी को
अपार बहुमत हासिल हुआ. उस समय के बाद जातीय राजनीति का दबाव कुछ कम हुआ है. यह पूरे
देश के लिए सच है कि वोटर बेहतरी के लिए बदल चुका है और राजनेता बदतर के लिए बदल
गये हैं.
राजनीति में रूठना एक सामान्य प्रक्रिया है. राजनेता रूठने के लिए लंबी रस्सी देते
हैं, लेकिन यह रस्सी जंजीर होती है. अच्छा हाइकमान जानता है कि इसे कब फंदे में बदल
देना है. अगर येदियुरप्पा नियंत्रण के बाहर दिखाई दे रहे हैं, तो केवल इसलिए कि वे
इस बात को जान चुके हैं कि भाजपा नेता रीढ़विहीन हैं.
हालांकि, येदियुरप्पा इस चीनी कहावत से वाकिफ नहीं हैं कि जो आप चाहते हैं उसके
प्रति सावधान रहें, आप इसे पा सकते हैं. वे अपने साथी लिंगायत को मुख्यमंत्री बनाने
की पैरवी कर रहे हैं. सत्ता पर काबिज होते ही लिंगायत उत्तराधिकारी का पहला काम
होगा कि कल के नेता इतिहास बन जायें. इस कहानी का अभिप्राय है- अपनी पत्नी के सूप
से चिपके रहें. पार्टी में शामिल होने से पहले आपको मेन्यू के बारे में विचार कर
लेना चाहिए था.
गुस्सा आपको पार्टी के सुरक्षा कवच से वंचित कर देता है. एक बार घर छोड़ने के बाद
आप अकेले हो जाते हैं. अगर येदियुरप्पा यह कल्पना करते हैं कि कांग्रेस में उनका
स्वागत होगा, तो वे अपनी बौद्धिक समझ को आश्चर्यलोक में ले जा चुके हैं. अगर वे
सोचते हैं कि क्षेत्रीय दल तत्काल खड़ा किया जा सकता है, तो उन्हें पंजाब के मनजीत
सिंह बादल से सीख लेनी चाहिए. उन्हें बंगाल पर भी गौर करना चाहिए. ममता बनर्जी तीन
दशकों के प्रयास के बाद आज सत्ता पर काबिज हैं. पत्नी का सूप कई तरह का हो सकता है,
लेकिन यह आपको जीवित रखता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के
संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
08.07.2012, 12.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित