गब्बर ही गब्बर हैं, ठाकुर साहब!
मुद्दा
गब्बर ही गब्बर हैं, ठाकुर साहब!
कनक तिवारी
‘कितने आदमी थे?‘
‘हुजूर, केवल एक.‘
‘वह एक और तुम दो. फिर भी उसे जान से नहीं मारा. जांघ पर गोली मारकर आ गए. सोचा
गब्बर बहुत खुश होगा. सबासी देगा. हमारा नाम मटियामेट कर दिए.‘
यह फिल्मी डायलॉग छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में ठीक उस वक्त बोला जा रहा था, जब राजधानी
रायपुर में मुख्यमंत्री कलेक्टरों और जिला पुलिस अधीक्षकों को फिल्म ‘शोले‘ के नायकों
वीरू और जय की तरह जोड़ी बनाकर भ्रष्टाचाररहित प्रशासन के गुर बता रहे थे. रायगढ़ में
हरियाणा निवासी तेज़ तर्रार कलेक्टर हैं और हरियाणा के ही अरबपति उद्योगपति. ईमानदार
सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल को दिन दहाड़े गोली मारी गई और प्रशासन में अब भी
जय और वीरू की जोड़ी कम से कम रायगढ़ में तो बन नहीं पाई.
इसमें कोई शक नहीं कि यदि कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ठान लें तो प्रशासन में
अपेक्षित कसावट आ सकती है. आपातकाल लोकतंत्र के लिए अभिशाप भले कहा जाए लेकिन इन्हीं
अधिकारियों के माध्यम से इंदिरा गांधी ने प्रशासन में कसावट लाने का उदाहरण तो पेश
किया ही था. राजनीतिक हालात फिल्म ‘शोले‘ के मुकाबले कहीं ज़्यादा पेचीदे हैं. जय
और वीरू के अधिकार कम से कमतर होते जा रहे हैं. गब्बर ‘रक्तबीज‘ की तरह अपना परिवार
फैला चुका है. कई बार तो गब्बर-वंश ही जय और वीरू की जिलों में पोस्टिंग तय करता
है. मंत्रिपषिद, मंत्रालय और रसूखदार राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं की भूमिका
में भी दिखाई देता है.
जय और वीरू की कथा को लेकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के इशारों में कई सवाल फुफकारते
हैं. अमज़द खान वाला गब्बर सिंह बेचारा कम पढ़ा लिखा पहलवान किस्म का एक आतंकी है, जो
रामगढ़ गांव के लोगों से जजिया कर की तरह वसूली करने तक सीमित है. मध्यप्रदेश के लोग
चंबल के बीहड़ों के कारण ऐसे डाकू से ज़्यादा परिचित रहे हैं. छत्तीसगढ़ के गब्बर
सैकड़ों की संख्या में राजधानी सहित जिला मुख्यालयों की हवेलियों में रहते हैं. वे
बस्तर के बीहड़ों में भी पसरते जा रहे हैं. वे केवल बंदूक तक सीमित नहीं हैं. अब
उनकी संदूकें ज़्यादा भारी भरकम होती जा रही हैं. ओरिजिनल गब्बर जंगल की सीमाओं में
कैद था. उसकी यात्रा बीहड़ से रामगढ़ तक की होती थी. उसके छत्तीसगढ़िया वंशजों ने
हज़ारों की संख्या में दूसरे प्रदेशों के जंगलों से गुजरकर एक गलियारा बना लिया है.
मुट्ठी भर लोगों को लेकर देश को सुधारने का पहला विचार विवेकानंद का था. स्वामी जी
एक हजार प्रतिबद्ध युवा सन्यासियों को लेकर हिन्दुस्तान का चेहरा बदलने का संकल्प
लिए सामाजिक जीवन में आए थे लेकिन निराश और असफल हो गए. उन्हें देश में एक हजार
ईमानदार युवा सन्यासी ही नहीं मिले. जवाहरलाल नेहरू ने भी देश के कलेक्टरों के
माध्यम से लोकजीवन का चेहरा बदलने की कोशिश की थी. उसकी पुनरावृत्ति सभी
प्रधानमंत्री अब तक कर रहे हैं.
मेरा निजी अनुभव है कि आज से कोई पैंतीस चालीस साल पहले मेरे ज़िले के कलेक्टर और
पुलिस अधीक्षक ने एक ताकतवर मंत्री के आदेशों को मानने से खुलेआम इंकार कर दिया था.
उन्होंने कई कालाबाजारियों को पकड़कर मुकदमे चलाए. चाहे वे राइस मिल मालिक रहे हों
या लोहे और किराना वस्तुओं के बड़े व्यापारी. यह भी हुआ कि कलेक्टर का तबादला कर
दिया गया. ज़िले के नब्बे प्रतिशत विधायकों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रधानमंत्री तक
गुहार लगाई. कलेक्टर का दुबारा तबादला उसी ज़िले में फिर किया गया.
कहां हैं वैसे जय और वीरू अब ठाकुर साहब? बाज़ार की अफवाहों और अफवाहों के बाज़ार में
आज के बहुत से जय और वीरू उगाही में लगे रहते हैं. किसी का होटल बन रहा है. कोई
कारखाने में रुपया लगा रहा है. कोई साहूकारी कर रहा है. कोई ज़मीनें हड़प रहा है. कोई
परिवारों का संकटमोचक बन रहा है. हो सकता है यह सच नहीं हो. बारदाना घोटाला, डामर
घोटाला, मालिक मकबूज़ा घोटाला, कोयला वितरण घोटाला इत्यादि संपन्न हो रहे हैं.
बेशकीमती पेड़ अरबपतियों द्वारा खुलेआम काटे जा रहे हैं. जय और वीरू की आंखें बंद
हैं.
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छत्तीसगढ़ में शराबखोरी के खिलाफ बहादुर महिलाएं लामबंद हो रही हैं बिना जय और वीरू
की मदद के. बेचारे मंत्री खुलेआम शिकायतें करते हैं कि जय और वीरू उनके ज़िलों तक
में उनकी नहीं सुनते. यदि नियम कायदे के अनुसार जय और वीरू आचरण करें तो उन्हें
बहुत से मंत्रियों में गब्बर की आत्मा दिखेगी.
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जिला सरकार का मनोरंजक, असफल और
कल्पनाशील प्रयोग किया था. शासन तंत्र में संसद और विधानसभाओं द्वारा विरचित
अधिनियमों में कलेक्टर केन्द्रीय धुरी की तरह होता है. कानूनों के द्वारा उसकी
शक्तियों को कम नहीं किया जा सकता लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप के द्वारा कुंठित किया
जाता है. जय और वीरू में असाधारण दोस्ती थी लेकिन देश के आई.ए.एस. और आई.पी.एस.
अधिकारियों में सदैव सौतियाडाह पनपाया जाता है. जिस तरह शिक्षकों का आचरण और चरित्र
गिर गया है वैसा ही कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का भी. इनमें अब भी कई युवा, समझदार,
गंभीर और तेज़ तर्रार अधिकारी हैं. प्रशासन उनके ही दम पर चल रहा है. मुख्यमंत्री का
संबोधन प्रत्यक्षतः ऐसे ही जय और वीरू के लिए लागू हो सकता है. बहुत से जय और वीरू
को तो अपनी आत्मा के आइने में झांककर देखना होगा.
छत्तीसगढ़ में सुशासन की अपार संभावनाएं हैं. देश के सबसे ज़्यादा भोले आदिवासी इसी
प्रदेश में हैं. बड़ी संख्या में अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के लोग भी हैं.
इस प्रदेश में अल्पसंख्यकों की ज़्यादा आबादी नहीं होने से उत्तरप्रदेश या बिहार की
तरह संकुल राजनीतिक स्थिति नहीं है. प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत के कारण दूसरे
प्रदेश के लोगों को यहां आकर लूटखसोट करने के अच्छे अवसर हैं. अब राजनीतिक सत्ता भी
उनके ही हाथों में आ गई है. यदि साहसी, संकल्पित, विवेकशील और व्यावहारिक युवा
अधिकारियों की टीम खड़ी की जा सके तो निचले स्तर तक प्रशासन की अनुगूंज सुनाई जा
सकती है.
मध्यप्रदेश के बंटवारे के वक्त अच्छे प्रशासनिक अधिकारियों की छत्तीसगढ़ में आवंटन
प्रक्रिया को लेकर बहुत कतरब्यौंत की गई थी. अब भी उच्च स्तर पर अधिकारियों की कमी
है. कुछ अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय तक ने नियमविरुद्ध ढंग से अपने यहां
अटका रखा है और छत्तीसगढ़ सरकार के अनुरोध की अनसुनी कर रहा है.
पहले सचिवालय नामक शब्द था. अब उसे मंत्रालय कहा जाता है. पहले ऐसे विधायक होते थे,
जो कलेक्टर की बैठकों में सरकारी आंकड़ों को अपनी स्मरणशक्ति और जानकारी के दम पर
झुठला देते थे. अब तो साहबों की जी हुजूरी करने वाले विधायकों का हुजूम है. हर तरफ
गिरावट है. प्रशासन के फिसलते पायदान पर जय और वीरू के लिए सरकारी विकास गाड़ी पर
ब्रेक लगाना ज़्यादा ज़रूरी है बजाय एक्सीलरेटर पर पैर रखने के.
ऐसे भी वीरू हैं जो खुद सरकारी नियमों को धता बताकर गब्बर की गिरफ्त में आ जाते
हैं. वे रातों रात राष्ट्रीय हीरो बन जाते हैं. उनकी जान बचाने के लिए सरकार को
समझौते की बदनामी झेलनी पड़ती है. बीहड़ों के गब्बर इसके बावजूद सैकड़ों निर्देशों का
कत्लेआम भी करते हैं. बहुत से जय आत्महत्या करते हैं. एक दूसरे से उलझते हैं और
खाकी वर्दी के रोब से मुक्त होकर उन कामों को अंजाम नहीं दे पाते, जिनके लिए वे
नियुक्त हुए हैं. छोटे मोटे गिरहकट चोर या उचक्के को पकड़कर पत्रकार वार्ताएं आयोजित
होती हैं. लेकिन जो सफेदपोश सूचीबद्ध डाकू हैं उनके बगलगीर होने में जय और वीरू को
संकोच नहीं होता. यहां तक कि अब तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी उनके साथ लंच
करते हैं.
‘शोले‘ हिट हुई. उसमें वास्तविक जीवन का सही चित्रण हुआ था. संजीव कुमार के मन में
दुष्टों से बदला लेने के शोले दहकते रहे. रामगढ़ की कथा यथार्थ से भी ज़्यादा सच्ची
लगती है. छत्तीसगढ़ में उससे आगे बढ़कर नक्सली गब्बरों की गिरफ्त में वे भोले-भाले
लाखों आदिवासी हैं, जो ज़्यादा बुरी हालत में हैं. उनकी आंखों में व्यवस्था के
विरुद्ध शोले नहीं ओले दहक रहे हैं क्योंकि वे निरक्षर, गरीब, वंचित लेकिन कुलीन
हैं.
जय और वीरू तो बहादुरों की तरह शेर दिखते गब्बर की मांद में घुस गए थे. ठाकुर बलदेव
सिंह को उन पर गर्व था. आज के कई जय और वीरू नक्सली मांद में जाने से कतराते हैं.
राजनीतिक दबाव, हाईकोर्ट और मेडिकल सर्टिफिकेट की आड़ में वे तथाकथित शहरी इलाकों
में रहकर जनसंपर्क मजबूत करते रहते हैं. कुछ बहादुर अधिकारी अब भी हैं, जो इन
इलाकों से हटना नहीं चाहते और अपनी जान को जोखिम में डालते हैं. बेहतर होता कि जय
और वीरू की तुलना करने के साथ-साथ मुख्यमंत्री इन अधिकारियों को समरण शक्ति को तेज़
करने के लिए ‘शोले‘ फिल्म एक बार फिर दिखा देते.
08.07.2012, 16.50
(GMT+05:30) पर प्रकाशित