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दास्तां-ए-मानुष : कणसली

दास्तां-ए-मानुष चार

वार्तालेख


पीयूष दईया

 

सन् 1999 में उत्तराखंड के रांउलेक गांव, ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए भू-स्खलन से प्रभावित कमला देवी, शेरीलाल, नर्मदा देवी, चैता देवी, विनोद जमलोकी और कुछ अन्य के विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुए थे. कुछ और प्रभावितों के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में हैं.

 

 

गांव कणसळी में एक परिवार की जुबानी

 

28 मार्च सन् 1999 के दिन आए भूकम्प में यह गांव लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गया था.


उस रात घर के मुखिया व बुजुर्ग श्री चन्द्रसिंह अपने परिवार के साथ घर पर ही थे. आपके परिवार में दो बेटे हैं. एक बेटा--कुंवर सिंह--बाहर दूसरे शहर में नौकरी करता है और दूसरा बेटा--त्रिलोक--मानसिक रूप से हल्का-सा विक्षिप्त है. बहू जसमति देवी है और बेटी का नाम गुड्डी और दो नाती है जिनमें से एक का नाम आशीष है.


जिस रात भूकम्प आया उस रात जसमति देवी घर की दूसरी मंज़िल पर सो रही थीं और भूकम्प आते ही सबसे पहले वे अपने बच्चों को लेकर बाहर निकली और फिर उन्होंने पूरे परिवार को बाहर आने के लिए तेज आवाज़ में पुकारना जारी रखा. चन्द्रसिंह अपने विक्षिप्त बेटे को ज्यों ही खींचकर घर से बाहर लाए त्यों ही पूरा मकान भरभरा कर ढह गया.


जब हम इस परिवार से वार्ता करने के लिए उनके घर पहुंचे तो उनके बेटे कुंवर सिंह दूसरे शहर से आए हुए थे और वार्ता शुरू हुई.



कुंवर सिंह

uttarakhand

भूकम्प के बाद वाले महीनों में हमारे गांव के लिए लगभग 32 लाख रूपयों के आसपास सरकार ने मंजूर किए थे जिससे कि 25 मकान बनने थे. अब हुडको ने जो मकान बनाए, उन्हें आप स्वयं देख सकते हैं.

दास्तां-ए-मानुष का पहला भाग पढ़ें

दास्तां-ए-मानुष का दूसरा भाग पढ़ें

दास्तां-ए-मानुष का तीसरा भाग पढ़ें

जाएं तो जाएं कहा

भूकम्प की घटना के बाद गांव के सारे छोटे बच्चे लगभग एक-डेढ महीने तक बहुत डरे-सहमे रहे. सदमे जैसी हालत में-न कोई आवाज़ न खेल न हंसी. बच्चे यह समझ नहीं पा रहे थे कि जो हुआ वह क्या हुआ और कैसे हुआ. उन्हें संभलने व ठीक होने में बहुत दिन लग गये.


पूरा गांव जैसे खण्डहर में बदल गया था. चारों तरफ़ टैण्ट लगे थे--टैण्टों का गांव लग रहा था. जिसके घर में जो सामान था वह सब बरबाद हो चुका था और न किसी के पास बरतन बचे थे न सोने को बिस्तर. वह अनाज-पानी जिसका हमारे घरों में छ: छ: महीने का भण्डार रहता है वह सब या तो खराब हो चुका था या फिर पूरी तरह नष्ट. ऐसे तो किसी के पास कुछ खास बचा नहीं था लेकिन फिर भी जो थोड़ा बहुत था वह लगभग फ़ौरन ही खप गया. याद करने पर आज भी यह ऊंगली रख कर कहना कठिन है कि हम सबका गुजारा कैसे चलता रहा.


हमारे गांव में कोई सरकारी नौकरी में नहीं है. सभी लोग निजी जगहों पर ही नौकरी करते हैं. भूकम्प के बाद सूचना मिलने पर वे लोग भी गांव पहुंचे जो बाहर रह रहे थे और उन्होंने अपने अपने परिवारों को सम्भाला. महीनों तक पूरा गांव अफरा-तफरी में सुधबुध भूला ऐसे ही चलता रहा. उन घड़ियों में बिलकुल भी ऐसा महसूस नहीं हो सका था कि हमारा गांव वापस से कभी फिर बस सकेगा. पूरा माहौल इतनी गहरी निराशा व दुख से भरा था कि उसके बारे में बतला पाना बयान से बाहर है.


बाद में कपार्ट की ओर से सीडीआई के लोग आए और उन्होंने अस्थायी व्यवस्था के बतौर हमें टिन-शेड बना कर दिए. यह व्यवस्था उन्होंने बहुत जल्दी व बहुत अच्छे से करके दी. तब हम सुरक्षित हो सके.


लेकिन उन दिनों रात में जंगली व हिंसक जानवर जैसे चीते वगैरह गांव-बस्ती के बहुत नज़दीक आने लगे थे. एक तो हम पहले से उजड़े हुए थे उस पर इन हिंसक जानवरों के आने का ख़तरा बराबर मंडराता था सो हम रात में सो तक नहीं पाते थे. हमें अपने मवेशियों--गाय-भैंसों इत्यादि--की देखरेख करने में बहुत सजगता बरतनी पड़ती थी कि कहीं चीता आकर इन्हें खा न जाय. हम अपने मवेशियों को भी अपने अगल-बगल ही बांधे रखते थे. एक तरह से पूरा गांव अधजगी अवस्था में रहता था. कई बार तो रात में पूरा गांव का गांव इकठ्ठा हो मशालें जलाकर चीतों को भगाने में लग जाता था. हादसे होते होते बचे.


भूकम्प के कुछ दिनों तक हमारी ही तरह पशु भी थोड़ा भयभीत रहे लेकिन वे जल्दी ही सामान्य हो गये--उनके व्यवहार में हमें कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आया. वे जैसे पहले थे वैसे ही बने रहे.


भूकम्प के बाद लगभग एक हफ्ते तक तो झटके आते-लगते रहे. एक दफा तो झटका इतने जोर का था कि पडोस में शाम को जंगल में आग लग गयी. हम सब आग बुझाने चले गये और रात में करीब नौ बजे के आसपास जब थके हारे लौटे तो सब भूखे थे क्योंकि खाना तो कोई भी नहीं खा-बना पाया था कि तभी चीते/बाघ आ गये और जोर-जोर से दहाड़ने लगे. बाघ भूखे थे. सो पूरा गांव फिर से मशालें जलाकर उनको भगाने दूर तक चला गया. इस तरह रात में करीब ग्यारह बजे तक जाकर स्थिति ठीक हो सकी.


भूकम्प के बाद यह जो दिनों तक झटके आते रहे उसको लेकर सरकार ने चुप्पी साध ली थी. न तो सरकार की ओर से आकर किसी ने हमें कुछ कहा-समझाया न किसी ने कुछ उल्लेखनीय किया. आप कह सकते हैं कि हम आम गांव वालों को हमारे अपने हाल पर छोड़ दिया गया था--बिलकुल अनाथ.


ऐसी स्थिति महीने भर तक बनी रही.

अब हमारे घर-बार तो सब निकल गये थे, नष्ट हो गये थे और हम यह सोचने लगे थे कि छोटी-छोटी झोंपड़ियां बनाएंगे और वापस यहीं रहेंगे. सब को यह लग रहा था कि अपना गांव-घर छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे, यहीं रहेंगे--चाहे जीये चाहे मरें. एक मोटा कारण तो यह भी रहा होगा कि यहां ज्यादातर लोगों की अपनी थोड़ी खेतीबाडी भी है.


उस दौर में कुछ नेता लोग भी आए थे पर उन्होंने सिर्फ़ गांव का हाल-समाचार देखा और सीधे चले गए. उन्होंने इतना भर मानवीय रवैया तक नहीं रखा कि गांव में आश्वासन ही दे देते !

एक तरह से तो पुनर्वास की पहल भी हमीं लोगों द्वारा की गयी थी. ब्लॉक-प्रमुख व अन्य सत्तासीन लोग तो महज़ अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे थे. हम सभी गांववाले इकठ्ठा होकर रूद्रप्रयाग जाकर जिलाधिकारी से मिले. जुलूस बना कर गये और धरना दिया. यह मांग रखी कि सरकार की ओर से हमें कुछ स्थायी सहायता मिले. हम जिस कठिन व दयनीय हालत में थे उस हालत को दूर करने के लिए कुछ ठोस उपाय किये जाए. उस दिन एसडीएम ने हमें आश्वासन दिया कि हमारे लिए उपाय किये जाएंगे. आगे पढ़ें

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हिमांशु सिन्हा(patrakarhimanshu@gmail.com)

 
 बहुत मार्मिक लिख रहे हैं पीयूष दईया जी. जिस तरह उत्तराखंड के लोगों का दुख इन लेखों में उतरा है, वह हौसला भी देता है. 
   

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