दास्तां-ए-मानुष : कणसली
दास्तां-ए-मानुष
चार
वार्तालेख
पीयूष दईया
|
सन् 1999 में
उत्तराखंड के रांउलेक गांव,
ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए
भू-स्खलन से प्रभावित कमला देवी, शेरीलाल, नर्मदा देवी, चैता देवी, विनोद जमलोकी और
कुछ अन्य के विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुए थे.
कुछ और प्रभावितों के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में
हैं. |
गांव कणसळी में एक परिवार की जुबानी
28
मार्च सन् 1999 के दिन आए भूकम्प में यह गांव लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गया था.
उस रात घर के मुखिया व बुजुर्ग श्री चन्द्रसिंह अपने परिवार के साथ घर पर ही थे.
आपके परिवार में दो बेटे हैं. एक बेटा--कुंवर सिंह--बाहर दूसरे शहर में नौकरी करता
है और दूसरा बेटा--त्रिलोक--मानसिक रूप से हल्का-सा विक्षिप्त है. बहू जसमति देवी
है और बेटी का नाम गुड्डी और दो नाती है जिनमें से एक का नाम आशीष है.
जिस रात भूकम्प आया उस रात जसमति देवी घर की दूसरी मंज़िल पर सो रही थीं और भूकम्प
आते ही सबसे पहले वे अपने बच्चों को लेकर बाहर निकली और फिर उन्होंने पूरे परिवार
को बाहर आने के लिए तेज आवाज़ में पुकारना जारी रखा. चन्द्रसिंह अपने विक्षिप्त बेटे
को ज्यों ही खींचकर घर से बाहर लाए त्यों ही पूरा मकान भरभरा कर ढह गया.
जब हम इस परिवार से वार्ता करने के लिए उनके घर पहुंचे तो उनके बेटे कुंवर सिंह
दूसरे शहर से आए हुए थे और वार्ता शुरू हुई.
कुंवर सिंह
जाएं तो
जाएं कहां
भूकम्प की घटना के बाद गांव के सारे छोटे बच्चे लगभग एक-डेढ महीने तक बहुत डरे-सहमे
रहे. सदमे जैसी हालत में-न कोई आवाज़ न खेल न हंसी. बच्चे यह समझ नहीं पा रहे थे कि
जो हुआ वह क्या हुआ और कैसे हुआ. उन्हें संभलने व ठीक होने में बहुत दिन लग गये.
पूरा गांव जैसे खण्डहर में बदल गया था. चारों तरफ़ टैण्ट लगे थे--टैण्टों का गांव लग
रहा था. जिसके घर में जो सामान था वह सब बरबाद हो चुका था और न किसी के पास बरतन
बचे थे न सोने को बिस्तर. वह अनाज-पानी जिसका हमारे घरों में छ: छ: महीने का भण्डार
रहता है वह सब या तो खराब हो चुका था या फिर पूरी तरह नष्ट. ऐसे तो किसी के पास कुछ
खास बचा नहीं था लेकिन फिर भी जो थोड़ा बहुत था वह लगभग फ़ौरन ही खप गया. याद करने पर
आज भी यह ऊंगली रख कर कहना कठिन है कि हम सबका गुजारा कैसे चलता रहा.
हमारे गांव में कोई सरकारी नौकरी में नहीं है. सभी लोग निजी जगहों पर ही नौकरी करते
हैं. भूकम्प के बाद सूचना मिलने पर वे लोग भी गांव पहुंचे जो बाहर रह रहे थे और
उन्होंने अपने अपने परिवारों को सम्भाला. महीनों तक पूरा गांव अफरा-तफरी में सुधबुध
भूला ऐसे ही चलता रहा. उन घड़ियों में बिलकुल भी ऐसा महसूस नहीं हो सका था कि हमारा
गांव वापस से कभी फिर बस सकेगा. पूरा माहौल इतनी गहरी निराशा व दुख से भरा था कि
उसके बारे में बतला पाना बयान से बाहर है.
बाद में कपार्ट की ओर से सीडीआई के लोग आए और उन्होंने अस्थायी व्यवस्था के बतौर
हमें टिन-शेड बना कर दिए. यह व्यवस्था उन्होंने बहुत जल्दी व बहुत अच्छे से करके
दी. तब हम सुरक्षित हो सके.
लेकिन उन दिनों रात में जंगली व हिंसक जानवर जैसे चीते वगैरह गांव-बस्ती के बहुत
नज़दीक आने लगे थे. एक तो हम पहले से उजड़े हुए थे उस पर इन हिंसक जानवरों के आने का
ख़तरा बराबर मंडराता था सो हम रात में सो तक नहीं पाते थे. हमें अपने
मवेशियों--गाय-भैंसों इत्यादि--की देखरेख करने में बहुत सजगता बरतनी पड़ती थी कि
कहीं चीता आकर इन्हें खा न जाय. हम अपने मवेशियों को भी अपने अगल-बगल ही बांधे रखते
थे. एक तरह से पूरा गांव अधजगी अवस्था में रहता था. कई बार तो रात में पूरा गांव का
गांव इकठ्ठा हो मशालें जलाकर चीतों को भगाने में लग जाता था. हादसे होते होते बचे.
भूकम्प के कुछ दिनों तक हमारी ही तरह पशु भी थोड़ा भयभीत रहे लेकिन वे जल्दी ही
सामान्य हो गये--उनके व्यवहार में हमें कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आया. वे जैसे पहले थे
वैसे ही बने रहे.
भूकम्प के बाद लगभग एक हफ्ते तक तो झटके आते-लगते रहे. एक दफा तो झटका इतने जोर का
था कि पडोस में शाम को जंगल में आग लग गयी. हम सब आग बुझाने चले गये और रात में
करीब नौ बजे के आसपास जब थके हारे लौटे तो सब भूखे थे क्योंकि खाना तो कोई भी नहीं
खा-बना पाया था कि तभी चीते/बाघ आ गये और जोर-जोर से दहाड़ने लगे. बाघ भूखे थे. सो
पूरा गांव फिर से मशालें जलाकर उनको भगाने दूर तक चला गया. इस तरह रात में करीब
ग्यारह बजे तक जाकर स्थिति ठीक हो सकी.
भूकम्प के बाद यह जो दिनों तक झटके आते रहे उसको लेकर सरकार ने चुप्पी साध ली थी. न
तो सरकार की ओर से आकर किसी ने हमें कुछ कहा-समझाया न किसी ने कुछ उल्लेखनीय किया.
आप कह सकते हैं कि हम आम गांव वालों को हमारे अपने हाल पर छोड़ दिया गया था--बिलकुल
अनाथ.
ऐसी स्थिति महीने भर तक बनी रही.
अब हमारे घर-बार तो सब निकल गये थे, नष्ट हो गये थे और हम यह सोचने लगे थे कि
छोटी-छोटी झोंपड़ियां बनाएंगे और वापस यहीं रहेंगे. सब को यह लग रहा था कि अपना
गांव-घर छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे, यहीं रहेंगे--चाहे जीये चाहे मरें. एक मोटा कारण
तो यह भी रहा होगा कि यहां ज्यादातर लोगों की अपनी थोड़ी खेतीबाडी भी है.
उस दौर में कुछ नेता लोग भी आए थे पर उन्होंने सिर्फ़ गांव का हाल-समाचार देखा और
सीधे चले गए. उन्होंने इतना भर मानवीय रवैया तक नहीं रखा कि गांव में आश्वासन ही दे
देते !
एक तरह से तो पुनर्वास की पहल भी हमीं लोगों द्वारा की गयी थी. ब्लॉक-प्रमुख व अन्य
सत्तासीन लोग तो महज़ अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे थे. हम सभी गांववाले इकठ्ठा होकर
रूद्रप्रयाग जाकर जिलाधिकारी से मिले. जुलूस बना कर गये और धरना दिया. यह मांग रखी
कि सरकार की ओर से हमें कुछ स्थायी सहायता मिले. हम जिस कठिन व दयनीय हालत में थे
उस हालत को दूर करने के लिए कुछ ठोस उपाय किये जाए. उस दिन एसडीएम ने हमें आश्वासन
दिया कि हमारे लिए उपाय किये जाएंगे.
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सच तो यह है कि हमारा गांव इतना गरीब है कि हम कहीं आगे जाकर अपने हक़ों की लड़ाई तक
नहीं लड़ सकते थे और न कहीं ओर जा कर बस सकते थे.
मुझे नहीं लगता कि हम लोग किसी दूसरे क्षेत्र में जाकर बसने के लिए तैयार हो सकते
हैं. अपनी जन्मभूमि छोड़ कर भला कोई कहीं और कैसे जा सकता है. हमारा तो जीना भी यही
है, मरना भी यही.
बाद के सालों में लोगों से पता तो चला था कि आपदाओं से बचने के लिए प्रशिक्षण दिया
जाएगा. हर गांव से एक-एक, दो-दो पुरूष व महिला सीखने के लिए गये भी थे लेकिन वे सब
सीख नहीं सके--उन्हें यह पता ही नहीं लगा और न वे समझ सके कि अगलों ने यानि
प्रशिक्षकों ने उन्हें बोला-बताया क्या है सो आज हममें से कोई यह नहीं जानता कि
आपदाओं के आने पर हमें उनसे किन तरहों से बचाव करना चाहिए. दरअसल वे लोग जो
प्रशिक्षण लेने गये थे उन्हें ठीक ढंग से और हमारे हिसाब व विस्तार से यह बताया ही
नहीं गया था कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. हालत तो अब भी पहले जैसी
ही है. हमारे पास कोई नयी जानकारी नहीं है सो आपदा आ गयी तो वही करेंगे जो पहले
किया था या जो सबक हमने पहले की घटना से सीखे हैं--अपने विवेक व जीवन से.
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गांव की ओर से सीधा प्रतिरोध इसलिए नहीं हो
सका क्योंकि यह गांव बेहद गरीब है और हमारे पास सिवाय इसके कोई और चारा नहीं बचा रह
गया था कि हम यह सब अपनी आंखों के सामने होता देखते रहे. |
भूकम्प के बाद वाले महीनों में हमारे गांव के लिए लगभग 32 लाख रूपयों के आसपास
सरकार ने मंजूर किए थे जिससे कि 25 मकान बनने थे. अब हुडको ने जो मकान बनाए, उन्हें
आप स्वयं देख सकते हैं-वे मकान अपनी कहानी स्वयं ही बता देंगे. कहने का तात्पर्य
यह कि हुडको ने सारे मकान अपने मनमाने ढंग से इस तरह बनाए कि उनमें हमारे
हिसाब-किताब से कुछ भी ठीक नहीं है. इन मकानों में जो पत्थर जुड़े वे भी हमने ही दिए
थे और दरवाज़ों व खिड़कियों की लकड़ियां भी. हुडको का तो सिर्फ़ नाम ही था वरना तो सारा
काम ठेकेदारी की प्रथा से ही हुआ है. जैसे कि ठेकेदारों की छवि है-उन्होंने रूपया
दिया-लिया और सिर्फ़ लीपापोती करके चले गये. बात तो यह हुई थी कि जिन मकानों के लिए
हमने पत्थर दिए हैं उनके बदले में हमें दस हज़ार रूपये दिए जाएंगे लेकिन हकीक़त में
ऐसा कुछ घटा नहीं.
एक कमरे का कुल ख़र्च लगभग 80 हज़ार के आसपास का मंजूर करवाया गया
था लेकिन सचाई तो यह है कि उन्होंने बमुश्किल 30-40 हज़ार रूपये एक कमरे पर ख़र्च किए
होंगे. किसी भी चीज़ का न तो सही बजट बन सका न योजना. उन्होंने हमें जो मकान बना कर
दिए हैं उनके प्रति हम सबमें गहरा असंतोष है. हमने उन्हें कई बार बाकायदा यह समझाने
कि कोशिश की कि वे जो नक्शा बना रहे हैं वह यहां के भूगोल व परिवेश के हिसाब से
नहीं है. लेकिन जब वे दिल्ली के इंजीनियरों का हवाला देने लगे तब भी हमने उनसे
अनुरोध किया कि उत्तरांचल दिल्ली नहीं है और यहां का मसला अलग है पर काश उन्होंने
हमारी सुनी होती. हम लगातार उनसे यह आग्रह करते रहे कि हमें रूपया मत दो पर हमें
अपने साथ रखो--मकान हम खुद बनवाते हैं और साथ में लग कर काम करते हैं--आप हमें
सिर्फ़ तकनीक व सुविधा उपलब्ध करवा देवें ताकि मकान इस ढंग से बन सके कि हम उनमें
खुशहाल तरह से रह-जी सके.
उन्होंने वैसे भी नहीं माना, ऐसे भी नहीं माना. बस, अपनी
मनमानी करते रहे. जबकि पहले बात तो यह भी हुई थी बलिक उन्होंने ही यह प्रस्ताव दिया
था कि हम खुद अपने मकान पर/में काम करेंगे और वे हमें इसकी दिहाड़ी के रूप में
रोजगार भी मुहैया करवाएंगे पर ऐसा कुछ हो न सका. जब डीएम से इस सन्दर्भ में चर्चा
की तो उनका रवैया भी उदासीन ही रहा.
गांव प्रधान की ज़िम्मेदारी मुख्य थी पर उसने भी
अपनी साठ-गांठ इस तरह बनाई कि हमारे यहां प्राइमरी तक का जो एक विद्यालय है उसका एक
कमरा बनाने का ठेका उसी को मिल गया. प्रधान ने आकर कभी यह जानना नहीं चाहा कि यह जो
मकान बन रहे हैं वे कैसे बन रहे हैं या कैसे बनने चाहिए-उसने मुंह तक नहीं खोला.
गांव की ओर से सीधा प्रतिरोध इसलिए नहीं हो सका क्योंकि यह गांव बेहद गरीब है और
हमारे पास सिवाय इसके कोई और चारा नहीं बचा रह गया था कि हम यह सब अपनी आंखों के
सामने होता देखते रहे. फिर एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिसे भूकम्परोधी तकनीक
कहा जाता है, उस हिसाब पर यह मकान खरे नहीं उतरते. घरों की छत और सीढ़ियों से अब भी
पानी गिरता रहता है.
भूकम्प के समय जब दीवार में चार इंच से अधिक दबी बल्ली तक छिटक
गयी थी तो इन मकानों में तो सिर्फ़ दो इंच की ही है. आप कह सकते हैं कि पहले बनाए
मकानों से तो हम किसी तरह से बच गये थे लेकिन इनके द्वारा बनाए गए मकानों से तो
यकीनन नहीं बच सकेंगे पर क्या करे--जाएं भी तो कहां जाए, करे भी तो क्या करे.
चन्द्र सिंह
कूडी खंद्वार हो गयी
बहुत बरस बीत गये हैं न सो उस मनहूस घटना के बारे में अब इतना साफ याद तो नहीं है
लेकिन हम में से किसी को जरा भी यह आभास तक नहीं था कि क्या होगा. जान बचाते हुए जब
घर से बाहर निकले तो घर अपनी आंखों के सामने टूटा--कूडी खंद्वार हो गयी. (मकान
खण्डहर हो गया) पूरा वजूद व मन अपने बस में नहीं रहा, सोचते रह गये कि यह क्या
अंधेर हो गया और क्यों.
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बाल बाल बचे थे. अंधेरा था सो कुछ नज़र भी नहीं आ रहा था:
चारों ओर अफरातफरी का आलम था. गौशाला भी भरभरा गयी थी. किसी तरह से हम अपने बैलों को
बचा सके-बहुत मुश्किल से. कुछ दिनों तक तो बैल भी वापस अन्दर जाने से डरते रहे.
घटना वाली रात मैं अपने बेटे व बेटी के साथ दूसरी मंज़िल पर सोया हुआ था कि अचानक
लगा कि मकान हिल रहा है और हर ओर से झटके लगने लगे. छत की बल्लियां (दार बांसे)
धरधरा कर नीचे गिरने लगी. मैंने बिना वक्त खोए अपने लड़के का हाथ पकड़ उसे बाहर की ओर
खींचना शुरू किया. नहीं जानता कि अन्तत: हम खोली--मुख्यद्वार--से बाहर कैसे पहुंचे.
अब सोचता हूं तो लगता है कि मुझे तो सीढियों से गिर जाना चाहिए था पर भगवान का
शुक्र है कि गिरा नहीं. चारोंओर रोने-चिल्लाने की आवाज़ें थी.
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चंद्र सिंह के बेटे भूकम्प के
बाद से लगभग विक्षिप्त हालत में हैं. |
जरा होश सम्भलने पर जब देखा तो पाया कि पूरा का पूरा गांव खण्डहर में बदल गया है.
ऐसा लग रहा था मानो किसी ने गांव पर पाटा चलाया (पाटा--जोळ--खेत को समतल करने के
लिए जैसे गेहूं आदि की बुवाई के बाद चलाया जाता है) हो.
बड़ा बेटा जो उस रोज मेरे साथ था वह हल्का विक्षिप्त तो पहले से ही था. पहले
गाय-भैंसों का काम देख लेता था और घर के छोटे-मोटे काम कर लेता था पर उस दिन के बाद
उसने यह भी करना बंद कर दिया. रह-रह कर चिल्लाता रहता था. बार बार स्वर करता
कि-''ऐ ऐ इधर आओ--सब गांववाले आ गये हैं.''
जिन दिनों हम टिन-शेड में रह रहे थे उन
दिनों में एक बार यह बहुत चिल्लाया और उसके बाद से इसकी स्थिति इतनी खराब हो गयी कि
आज तक भी ठीक नहीं हुआ है. उस दिन यह बार बार कह रहा था--''कि मैं खा लिया, मैं खा
लिया.''
कई दिनों तक फिर यह बोलता रहा कि-''वो मुझे खाने आ रहा है, वो मुझे खाने आ
रहा है.'' यह पूछने पर कि कौन खाने आ रहा है तो कहता--''वो देखो, वो देखो, वो आ रहा
है.'' बस वह दिन है और यह दिन है, लगा रहता है रह-रह कर चिल्लाने में. हमने तमाम
तरह के इलाज करवाए--डॉक्टर के पास ले गये, पूजा-पाठ करवाया, बकरे की बलि चढ़ाई पर
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.
आशीष
गायब हंसी का जीवन
आशीष आज अठारह बरस के है और भूकम्प के समय आपकी उम्र दस वर्ष की थी. उन दिनों के
बारे में बात करने से वे आज भी कतराते हैं पर थोड़ा बहुत फिर भी वे बोल सके.
भूकम्प के बाद कुछ दिनों तक तो हम सब बच्चे इतना डरे-सहमे रहते थे कि हमारे जीवन से
मानो हंसी ही ग़ायब हो गयी थी. फिर सारे बड़े लोग भी अलग तरह से बरताव कर रहे थे. कुछ
दिनों बाद खेलने का मन करने लगा पर डर लगता था कि कहीं धरती हिल न जाय-हमारे खेलने
से.
ज्यों ही दोस्तों के साथ इधर-उधर जाने की कोशिश करते त्यों ही मां बुला लेती.
फिर जब राहत वाले व अन्य लोग बाहर से आते तो उनके पास कैमरे वगैरह होते और इन्हें
देखने हम दौड़ पड़ते. वे लोग हमारी तस्वीरें खींचते, हमें कपड़े व खाने की चीज़ें देते
और ये चीजें देते वक्त अलग से और हमारी तस्वीर लेते. इन कारणों से हम सड़क तक भाग कर
चले जाते थे.
उस वक्त इतने छोटे थे कि यह नहीं पता था कि ये लोग हमारी तस्वीरें
क्यों खींचते हैं, हमें तो बस मज़ा आता था. क्योंकि हमारा गांव सड़क के पास ही है सो
बहुत बार तो हम राहत वालों के ट्रकों के पीछे भी भागते रहते थे.
पिछले दो-तीन सालों में सीडीआई के लोग हमारे विद्यालय में आए थे और उन्होंने हमें
आपदाओं व भूकम्प के बारे में जानकारी दी. कई बातें बताई और भूकम्प पर एक
प्रतियोगिता भी विद्यालय में की.
जसमति देवी
अपनी जमीन पर
भूकम्प आने पर नींद तो खुल गयी थी और हल्के हल्के झटके महसूस होने लगे थे लेकिन इस
तरह के झटके तो पहले भी आते रहे थे इसलिए मुझे यह पता नहीं चल सका था कि ऐसा हो
जाएगा. लेकिन झटकों का आना थमा नहीं और वे तेज होने लगे. मैंने देखा कि दीवारों से
मिट्टी और पत्थर छटकने लगे हैं तब मैं जाग्रत हुई और दरवाजा खोला. बड़ा बेटा अन्दर
ही सोया रहा पर छोटेवाला मेरे साथ बाहर आ गया था. तब मैं झटके से दौड़ती हुई अन्दर
गई और बड़कू को उठा कर लाने लगी लेकिन तभी दीवार टूट कर गिर गयी. थोड़ा बहुत हमारे
ऊपर भी गिरा पर हम ज्यादा चोटें लगने से बच गये.
मैं औरों को आवाज़ें देने लगीं--पुकारा-चिल्लाया पर तब तक मकान के छत की स्लेटें
चारोंओर से इधर-उधर गिरने लगी थीं. अब पलट कर ध्यान आता है तो आश्चर्य होता है कि
हम बच कैसे गये क्योंकि जिस ढंग से छत के पत्थर गिर रहे थे उस हिसाब से तो हमारा
बचना एक चमत्कार ही रहा.
जब तक हम सभी लोग घर से बाहर तक आए तब तक पूरे गांव के लोग भी अपने अपने घरों से
बाहर आ गये थे. चांदनी रात थी और रात में हल्का उजास था. चारों
ओर से रोने-चिल्लाने
के स्वर सुनाई पड़ रहे थे. भूकम्प के दौरान जब हम किसी तरह से अपने घर के बाहर तक
ज़िंदा बच कर आ गये तब यह सोचा कि शायद हमारा ही मकान टूटा है पर जब देखा कि पूरा
गांव ही ख़त्म हो गया है तो कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह हो क्या रहा है. डर व
घबराहट से प्राण अटके अटके थे.
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हमारा एक कमरा सुरक्षित बच गया था सो आसपास के सभी लोग यह सोच कर यहां आ गए कि यहां
पर हम सभी सुरक्षित रह सकेंगे. जिन लोगों के परिवार के सदस्य मकानों तले दब गये थे
वे मदद के लिए रो-पुकार रहे थे. कान सुन रहे थे, आंखें देख रही थी पर यह होश नहीं
बचा था कि हम सांस ले रहे हैं और कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि कितने मर गये हैं और
कितने जिंदा बचे हैं.
चारों तरफ़ अफरातफरी का माहौल था-भागदौड़ मची थी. धीरे धीरे
दबे हुए लोगों को बाहर निकालने व बचाने के प्रयास शुरू हो गए. दबे हुए लोगों को
निकालने का काम सारी रात चलता रहा. हम सभी डरे-सहमे खुले आसमान के नीचे सुबह होने
का इंतज़ार कर रहे थे. एक बच्चा जो अपनी मां की गोदी में था वह ख़त्म हो गया--मां उसे
बचाने में लगी थी पर उसने मां के सीने के दबाव तले घुटन से दम तोड़ दिया.
सब लोगों को लगा कि हमारे मकान के चौक व खेत वाली जगहों पर शायद पत्थर नहीं आएंगे
इसलिए वे सब इधर इकठ्ठे हो गये. सुबह गांव की नंगी तबाही को देखकर यह विश्वास नहीं
हो पा रहा था कि यह खण्डहर कल तक एक गांव था पर आज सब बेघर थे. कुछ दिनों तक तो
प्लास्टिक आदि के टुकड़ों से छप्पर बना कर रहे फिर बाद में संस्थाओं वालों ने आकर
टिन-छत बनाई. हर वक्त इतना डर बना रहता था कि बच्चों तक को हम इधर-उधर खेलने के लिए
नहीं जाने देते थे. खेतों में भी अकेले नहीं जाते थे--तीन-चार महिलाएं मिलकर ही
घास-चारे के लिए खेतों तक जातीं थीं. डरे हुए इतने थे कि जंगल तक तो फिर भी नहीं
जाते थे.
पहले हमारे घरों में खाने के लिए तो पर्याप्त अनाज का भण्डार रहता था पर भूकम्प के
चलते सब नष्ट हो गया था और जब कभी कभी पडोस से उधार लेना पड़ता था तो बहुत शर्म आती
थी. फिर जब बाहर से लोग आए और हमारे लिए खाना भी लाए तो उनसे भी लेने में बहुत शर्म
आती थी. लगता था मानो हम भिखारी हो. जब भी राहत आती तो हम कभी नहीं जाते--पुरूषों व
बच्चों को ही भेजते थे.
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जीवन में पहली बार पता चला कि असली डर क्या होता है. उन घड़ियों में हम स्वयं डर में
बदल गये-से थे.
उसके बाद से अब कभी हल्के झटके भी आते हैं तो हम सतर्क हो जाते हैं. |
शुरू के दो-तीन दिन तक सारी व्यवस्थाएं सामूहिक रूप से ही की गयी
थी--खाना-पीना-रहना सब.
उस दौरान गेहूं की फसल थी पर उधर कोई लाभ-लोभ नहीं गया. न तो खेतों पर जाने का मन
करता न कोई और काम करने का. उसके कुछ समय बाद धान की फसल बोयी जानी थी पर मन ही
नहीं बन पाता था. किसी तरह अपने को समझाते और बोझिल मन से पैडी के लिए कुछ लोगों के
साथ मिलकर क्यारियां बनाते.
भूकम्प के दौरान मेरा ध्यान सबसे पहले अपने बच्चों की तरफ़ गया था. मुझे लगा कि कोई
बचे या मरे मुझे तो अपने बच्चे बचाने हैं. इस ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया कि अगर मैं
अन्दर जाऊंगी तो दब कर मर सकती हूं. जब बच्चों को सुरक्षित निकाल सकी तब दूसरी
मंज़िल पर सोये हुए ससुर, ननद आदि का खयाल आया कि मकान तो टूट रहा है कि कहीं वे दब
न गये हो. मैं ऊंची आवाज़ में उन्हें पुकारने लगी पर शायद डर के चलते उन्होंने जवाब
नहीं दिया. एकबारगी तो लगा कि वे दब गये हैं वरना जवाब तो देते.
जीवन में पहली बार पता चला कि असली डर क्या होता है. उन घड़ियों में हम स्वयं डर में
बदल गये-से थे.
उसके बाद से अब कभी हल्के झटके भी आते हैं तो हम सतर्क हो जाते हैं. फिर अगर ऐसा
भूकम्प आया तो मैं सीधे घर से बाहर निकल आऊंगी- नींद खुले न खुले.
मैं कभी इस तरह से नहीं सोच पाती कि हमें यहां से बाहर कहीं और जाकर बस जाना चाहिए.
अपना गांव, अपना क्षेत्र ही अच्छा-भला लगता है. पता नहीं कहां से यह शक्ति व भरोसा
जग जाता है कि ईश्वर हमारे गांव में फिर से भूकम्प नहीं लाएगा लेकिन डर तब भी बना
रहता है कि कहीं ऊपर फिर से पत्थर गिरने लगेंगे तो इस बार बचना मुश्किल है.
किसी दूसरी जगह हमारे पुनर्वास की बात भी मुझे नहीं जंचती. पता नहीं दूसरी जगह क्या
रोजगार होगा, कैसा माहौल व ज़मीन होगी, कैसे लोग बरताव करेंगे. पर तब भी यह बात
व्यावहारिक लगती है कि अगर दूसरी जगह सबकुछ अच्छा मिल-बस सके तो हमें चले जाना
चाहिए. लेकिन फिर भीतरी मन कहता है कि यहां तो अपना घर-बार और अपनी खेती-बाडी
बना-जमा रखी है, अपने नाते-रिश्तेदार भी हैं तो भला यह सब छोड़ कर कैसे चले जाय ? कह
नहीं सकती लेकिन यह सोचा जा सकता है कि अगर अच्छा मिल जाए तो यहां से जाया भी जा
सकता है क्योंकि यहां पर लगातार ख़तरा तो बना ही रहता है. लेकिन आप ही बताइए कि अगर
दूसरी जगह पहुंचने पर यह पता चले कि एक-दो कमरे ही रहने को मिले हैं और इलाक़ा भी
नया होगा और अगर कोई अन्य साधन व संसाधन नहीं मिले तो अपनी जगह छोड़ कर ऐसी जगह से
बदल कैसे करे ? तब क्या करना वहां जाकर.
जारी...
31.07.2008, 02.48 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | हिमांशु सिन्हा(patrakarhimanshu@gmail.com) | |
| | बहुत मार्मिक लिख रहे हैं पीयूष दईया जी. जिस तरह उत्तराखंड के लोगों का दुख इन लेखों में उतरा है, वह हौसला भी देता है. | |
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