कुल्फी खाओ, शिवांबु पिओ!
बात पते की
कुल्फी खाओ, शिवांबु पिओ!
कनक तिवारी
चार तरह की सत्ता-प्रजातियां इन दिनों लोकप्रियता के सेंसेक्स पर उछल रही हैं.
क्रिकेट सितारे हैं, जो अपने पेट और प्रतिष्ठा के लिए करोड़ों कमाते हैं. खेल से
ज़्यादा विज्ञापन का धंधा करते हैं. फिर भी अजीर्ण नहीं होता तो मैच की फिक्सिंग
करते हैं.
फिल्मी सितारे हैं, जो साहित्य के स्थायी भाव की तरह लोकप्रियता के कीर्तिमान रचते
चलते हैं. काला धन, काला बाज़ार और काला जादू वगैरह भी उनके जीवन से जुड़े होते हैं.
बीच बीच में सामाजिक सेवक बनकर राजनीति पर हाथ साफ करते चलते हैं.
साधु-संत-महात्मा हैं, जो अपने अपने अखाड़े बनाकर शुद्ध जातिवादी आधार पर भी करोड़ों
की मिल्कियत हड़प कर स्थितप्रज्ञ और विदेहराज बने घूमते हैं. फिल्मी तारिकाओं को
चेलियां बनाते हैं. बच्चों के वध करने के आरोप उन पर लगते हैं और अत्यंत गरीब वर्ग
में लोटे थालियां बांटकर भगदड़ मचाते हैं. इनमें से कई राजनीतिक मुद्दों की हांडी
में मुंह मारते रहते हैं.
इधर एक नया वर्ग अचानक शक्तिशाली और कब्जेदार हो गया है. इसमें चिकने चुपड़े, वाचाल,
संभ्रात और करोड़ों में खेलने वाले वकील हैं, जो इतनी बड़ी संख्या में कभी भी राजनीति
के तख्तेताउस पर नहीं बैठ पाए थे. उनकी वजह से राजनीति उद्योग जगत की प्रवक्ता बनती
जा रही है क्योंकि इनका पेशा सिर चढ़कर जो बोलता है.
तेज़ तर्रार वकील, अरबपति, कुलीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने हाल में बड़ी मासूमियत के
साथ यही तो कह दिया है कि हम लोग बीस-पच्चीस रुपए की आइसक्रीम खाने और पंद्रह रुपए
की पानी की बोतल खरीदने में गुरेज़ नहीं करते लेकिन चावल और गेहूं के दाम यदि एक
रुपए किलो भी बढ़ जाएं तो हायतौबा मचाते हैं. कितना निष्कलंक वाक्य है यह !
एक सौ बाईस करोड़ के मुल्क में वे कौन से ‘हम लोग’ हैं, जो अमूमन आइसक्रीम खाते रहते
हैं या कि पानी की बोतल खरीदते रहते हैं. वे दूसरे या वही कौन से ‘हम लोग’ हैं, जो
चावल और गेहूं खाते हैं.
‘हम लोग’ शब्द का अधिकृत इस्तेमाल तो भारत के संविधान की उद्देशिका में है, जिसके
अनुसार हम भारत के लोगों ने अपना संविधान बनाकर खुद को सौंपा है.
चिदंबरम अपनी ओढ़ी हुई मानसिकता में यह भूल गए कि इस देश में लाखों बच्चे ऐसे हैं,
जो विवाह समारोहों और जन्मदिन की पार्टियों में भोजन और आइसक्रीम की जूठी पत्तलें
भी चाटने को अभिशप्त हैं. वे कबाड़ खंगालने का राष्ट्रीय रोजगार करते हैं. टूटे-फूटे
कनस्तर और डिब्बे, बोतलें, अधजले सिगरेट और बीड़ी के टुकड़े, लोहा-लंगड़ और फटे-पुराने
कपड़े वगैरह उनके लिए भानुमती का पिटारा होते हैं. यह बीनने पर ही उन्हें बिना सब्जी
की रोटी मिलना नसीब होता है. पानी की प्लास्टिक की बोतलें खरीदने के लिए इस देश के
यात्री मजबूर हैं. रेलवे प्लैटफॉर्म, बस स्टैंड और सरकारी कार्यालय यात्रियों और
जनता को मुहावरे की भाषा में तो पानी पिलाते हैं लेकिन भारतीय संविधान में हलफ
उठाकर भी सरकारें नागरिकों को सुरक्षा और गरिमा की ज़िंदगी कहां जीने दे रही हैं.
लंबी यात्राओं में तो पानी का खर्च, भोजन और रेलवे टिकट से भी ज़्यादा हो जाने का
अंदेशा होता है क्योंकि कई बार तो गुसलखाने में पानी ही नहीं होता.
अनाज का उपभोक्ता द्वारा चुकाया जा रहा मूल्य किसान को मिलने वाली कीमत से कहीं
ज़्यादा बिचैलियों, दलालों और आढ़तियों के कमीशन से लदाफंदा होता है. बाजार के स्थिर
मूल्य का कोई एक तिहाई हिस्सा किसान की जेब तक पहुंचता है. दो तिहाई हिस्से पर
व्यवस्था का डाका होता है.
यदि एक रुपए किलो अनाज के दाम बढ़ भी गए तो क्या देश के गृहममंत्री घर घर जाकर किसान
को वह बढ़ा हुआ रुपया वापस दिलवाएंगे. ऐसे में चिदंबरम का वक्तव्य मासूमियत से भरा
नहीं लगता है. कथित एक रुपया प्रति किलो की दर से दलालों की आय में अलबत्त इज़ाफा हो
सकता है. सभी राजनीतिक पार्टियों ने सही आलोचना की.
इधर एक नए वैचारिक पैगंबर अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए यह कहते पाए गए कि यदि
मोटरकारों, रेफ्रिजिरेटरों तथा विलासिता की अन्य वस्तुओं में कीमत की बढ़ोतरी होती
है तो लोग चुप रहते हैं. उन्हें चिदंबरम के तर्क के अनुसार चावल और गेहूं के दाम
में एक रुपए किलो की बढ़ोतरी स्वागत योग्य लगती है. डॉ. लोहिया के शिष्यों का पतन
भारतीय राजनीति में एक अविस्मरणीय घटना है.
एक स्वयंभू साधु छत्तीसगढ़ में जन्मे. आंध्रप्रदेश के मूल स्थान से आए. दिल्ली में
स्थापित हुए हरियाणा की सरकार में भी रहे. देश में कोई घटना हो उनकी टिप्पणी तत्काल
चस्पा होती है. अन्ना आंदोलन में उनकी विदूषकनुमा खलनायकी रंगे हाथों पकड़ी गई.
नक्सलवाद उनका प्रिय शोशा है. टेलीविजन चैनलों पर छाए रहने से उनके भगवा जीवन को
संतोष मिलता है.
शांति निकेतन की एक बच्ची को छात्रावास अधीक्षिका ने अपने बिस्तर और कपड़ों में
बीमारी के कारण हो गई पेशाब को चाटने पर मजबूर किया. ठीक उस तरह जैसे कुत्ते बिल्ली
चाटते हैं. मनुष्य के प्रति घृणा का यह घिनौना उदाहरण है. पूरे देश में बावेला मचा.
केन्द्र सरकार और विश्वभारती प्रशासन ने लचर सही लेकिन फौरी कार्यवाही की. अग्निवेश
के लिए यह भी एक सुनहरा मौका हाथ आया. उन्होंने छात्रावास अधीक्षिका का पक्ष लिया.
खुद का उदाहरण देते हुए स्वमूत्रपान कराए जाने को सामान्य आचरण कहा.
स्वमूत्रपान के प्रस्तोता, प्रवक्ता और प्रयोगकर्ता मोरारजी देसाई रहे हैं. उनका
दीर्घ जीवन इस कारण भी रहा, कहा जाता है. अग्निवेश सहित सबको स्वमूत्रपान करने का
अधिकार है. लेकिन क्या एक कुदरती लक्षण के कारण यदि कोई बच्ची ऐसी बीमारी का शिकार
हो तो उसे सबके सामने ज़लील करते हुए सबके सामने जानवर बना दिया जाए. यह स्वमूत्रपान
आंदोलन का उदाहरण है अथवा मानव अधिकारों पर बलात्कार का?
इस देश में ऐसे विचारक, वकील और राजनेता हैं, जिन्हें गरीब मनुष्य उसके पसीने,
किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों का शोषण, दलितों द्वारा सिर पर मैला उठाने,
शराबखोरी के खिलाफ महिलाओं की जागृति, काले धन को वापस लाने की मुहिम, भ्रष्टाचार
के खिलाफ ज़ेहाद वगैरह से इस तरह परहेज़ है कि वे आततायी के बदले पीड़ित के खिलाफ
लामबंद हो जाते हैं.
चिदंबरम, कपिल सिब्बल, रामजेठमलानी, अभिषेक मनु सिंघवी, अरुण जेटली, रविशंकर
प्रसाद, अश्विनी कुमार, मनीष तिवारी जैसे कई चेहरे हैं जिन्होंने समय समय पर देश के
खलनायकों के मुकदमे लड़ कर करोड़ों कमाए हैं. वे बता नहीं सकते कि उन्होंने गरीबों के
कितने मुकदमे लड़े हैं या जनहित याचिकाएं दायर की हैं. आज भी उनके व्यापारिक हित
रहस्य की परतों के नीचे हैं. ऐसे लोग यदि देश की गरीब, मेहनतकश और पसीना बहाती हुई
जनता या अपनी कुदरती कमज़ोरियों से जूझती बच्चियों के प्रति नफरत पर दार्शनिक
मुलम्मा चढ़ाते हैं तो ऐसे नकली दर्शनशास्त्र का मुंह नोचा जाना चाहिए.
12.07.2012, 11.57
(GMT+05:30) पर प्रकाशित