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विदेश, परदेस और देश

बाईलाइन

 

विदेश, परदेस और देश

एम जे अकबर

विदेश


विदेश का क्या मतलब है? विदेशी देशों का विदेशपन क्या है? इसका जवाब दिया जा सकता है- जो दूर हो. लेकिन, दूरी भ्रामक होती है. भारतीय मध्यवर्ग पाकिस्तान के मुकाबले अमरीका को अपने ज्यादा नजदीक पाता है. दिल्ली से त्रिवेंद्रम के मुकाबले ताशकंद पहुंचने में कम वक्त लगता है, लेकिन हमें पता है कि इनमें से कौन विदेशी शहर है.

जब तक बंटवारे ने दिल और दिमाग को जख्म नहीं दिया था, दिल्ली में रहने वाले पंजाबी के लिए पेशावर मनोवैज्ञानिक घर हुआ करता, जबकि एक मलयाली इतना दूर था कि उसे मद्रासी कहा जाता था. आज पेशावर या तो पारिवारिक रूमानियत की जगह है या एक दु:स्वपन्न और केरल प्रमुख पर्यटन ठिकाना.

क्या आज के इंटरनेट के युग में सचमुच विदेश नाम की कोई चीज मौजूद है? इसका ईमानदार उत्तर आज भी हां होगा, लेकिन आपको दूसरे जवाब भी मिल सकते हैं. क्या प्रकृति अंतर लाने वाला कारक है?

मैं वैंकुवर की गर्मी की सुबह में यह लिख रहा हूं. सूर्य ने आहिस्ता-आहिस्ता जंगलों और चमक खोते बर्फ से ढ़के पहाड़ों की ओर बढना शुरू किया है. चमकता हुआ पूरा क्षितिज लहराता हुआ दिख रहा है. इसके नीचे जहाज यात्रियों को द्वीपों पर लाते-जाते दिखाई पड़ रहे हैं. बड़े मालवाहक जहाजों से पार पाते छोटे जहाज आलसी समुद्री चिड़िया जैसे दिख रहे हैं, फिर वे ओझल हो जाते हैं.

प्रकृति सभी जगह शानदार और चौंका देने वाली होती है. हिमालय एक अलग दुनिया है, राजस्थान की मरूभूमि दूसरी और केरल के वर्षा वन की अलग ही दुनिया है. लेकिन ये एक दूसरे से अजनबी नहीं हैं. ये मानव द्वारा किये गये विभाजनों से परे हैं. मानव स्वभाव पृथ्वी को टुकड़ों में विभाजित करने का होता है. वह कभी इसे व्यापक बनाने के औचित्य पर विचार नहीं करता है. यात्रा इन विभाजनों को पाटने का अस्थायी रास्ता है, लेकिन क्या आप कोई अंतर खोज पाते हैं?

इंसान सभी जगह एक जैसा होता है. अलास्का या मंगोलियाई लोगों की आंखों में थोड़ा फर्क हो सकता है. अफ्रीका में चमड़ी का रंग दूसरों से अलग होता है. लेकिन सबके पास एक ही अंग होते हैं, जिसका प्रयोग एक ही प्रयोजन के लिए किया जाता है. ऐसे में यात्रा का मकसद है, संस्कृति को समझना.

संस्कृति का सबसे रोमांचक प्रदर्शन समूह के स्तर पर होता है, जो कि लोगों की हंसी में या सड़कों पर चलते-फिरते या घर में लोगों के लालच में दिखाई देता है. टेलीविजन ने दोनों को एक कर दिया है और फिर उसे बड़े स्तर पर बाजार में उतार दिया है. समाज की भावना को लाभदायी उत्पाद में तब्दील कर इसे घरेलू उपभोग की चीज बना दिया है. रियलिटी शो की सफलता के पीछे के तथ्यों पर गौर करने के लिए पारखी दिमाग चाहिये.

हकीकत में किसी फॉमरूले की तरह टीवी रियलिटी शो भी फर्जी होते हैं. जब अमरीका में जेरी स्प्रिंगर जैसे आइकॉन रोजाना नशीले दृश्य देने के लिए तैयार होते हैं, तो वे युवाओं के बीच धोखा, सेक्स, प्रतिस्पर्धा, हिंसा जैसी मौलिक चीजों को नहीं बदलते हैं.

खिलाड़ियों की तरह दर्शकों के लिए भी योजनाबद्ध चीजें होती हैं और मेरा मतलब सिर्फ स्टूडियो के दर्शकों से नहीं है. सुबह का शो देखने वाले सभी दर्शकों के लिए चीजें पूर्वनिर्धारित होती हैं. लेकिन यह केवल ऐसी संस्कृति के अनुकूल जगह पर ही काम कर सकती है. दूसरे समाज के नजरिये से यह पूरी तरह बेकार की चीज हो सकती है. इस शो के भावी दर्शकों के लिए यह रेसलिंग की तरह मनोरंजक होता है, जो वास्तविकता में सही नहीं होता. यह काम करता है. इससे पैसा आता है. पूंजीवाद का मूल आधार बहुत परिष्कृत नहीं है.

बाजार की सबसे बड़ी शक्ति निर्माताओं की प्रचार के जरिये आप तक पहुंचने की क्षमता में निहित है. ऐसा लगता है कि जैसे वे आप पर कृपा कर रहे हैं. एक सफल उद्यमी खरीददार की मनोवृत्ति को समझता है. बैंलेंस शीट तर्को के सहारे भला-चंगा नहीं रहता है. पिट्सबर्ग में अमेरिकी बिलबोर्ड कम कपड़े वाली मॉडलों के सहारे कपड़े बेचते हैं.

इसका तर्क दूसरा है. अगर आप कपड़ा खरीदना चाहते हैं तो हम उनकी मौजूदगी की उम्मीद करते हैं, न की उनके गैरहाजिरी की. लेकिन जब आपकी सोच में यह बात घुस जाती है तो कम भी अधिक लगने लगता है. यही सोच आपको दुकान नाम की जेल पहुंचा देती है. एक बार इस जेल में आप पहुंच गये, तो आपको चाबी के लिए कीमत चुकानी होगी और वह आपको सच्चई लौटा देगी.

समाजवाद के साथ समस्या और खासकर क्यों यह विफल हुआ की वजह कपड़ों की कमी होना नहीं बल्कि सोचने की शक्ति कम होना है. आदमी केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रहता और न ही महिलाएं. यात्रा करने के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए. सभी जगह लोगों की हड्डियां एक जैसी होती है, लेकिन जीवन हर जगह अलग-अलग होता है.

यात्रा को उपदेशात्मक नहीं बनाएं. नैतिकता की खोज या फिर इसकी कमी आपमें हीनभावना पैदा कर देगी. विदेश यात्रा को यादगार लम्हों के तौर पर घर ले आयें न कि सबक के तौर पर. हम सभी अलग-अलग तरीके से हंसते हैं और ईश्वर को कृपा के लिए धन्यवाद देते हैं.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
15.07.2012, 17.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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