जायें तो कहां जायें आदिवासी
मुद्दा
जायें तो कहां जायें आदिवासी
कुमार कृष्णन
आदिवासियों एवं जंगलवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने और जंगल
पर अधिकारों को मान्यता देने के लिये लागू किये गये वन अधिकार कानून को पांच साल
होने जा रहे हैं लेकिन आदिवासियों एवं परंपरागत वनवासियों को एकल तथा सामुदायिक वन
अधिकार नहीं मिल पाया हैं. राज्य सरकारें आगे सर्वेक्षण नहीं कराना चाहती हैं और
इसके उलट बहुत बड़ी आबादी को वनों से वेदखल करना चाहती हैं. सरकारों की नीतियां इस
तरह बनाई जा रही हैं कि जंगलों को आसानी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया
जा सके. जगह-जगह वनवासियों और वन विभाग के बीच संघर्ष जारी है. लोगों का गुस्सा वन
विभाग के प्रति है. जंगल में रहने वाले हक के लिये फिर निणार्यक लड़ाई लड़ने की
तैयारी में हैं. एक बार फिर 2 अक्टूबर 2012 को एक लाख लोग ग्वालियर से दिल्ली तक की
जनसत्याग्रह 2012 में जाने की तैयारी कर रहे हैं.
पिछले माह जब मैं मध्यप्रदेश तथा गुजरात की यात्रा पर था तो जगह-जगह लोगों ने वन
विभाग के जंगल राज की दास्तान सुनाई. मध्यप्रदेश के सीधी जिले में बांधवगढ़
राष्ट्रीय उद्यान की आड़ में वनविभाग द्वारा आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है.
इस क्षेत्र में अब तक 300 बैगा और गौंड आदिवासी परिवारों पर वन्यजीव संरक्षण कानून
के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया है. इन इलाकों में वनाधिकार कानून के दायरे में
अदिवासियों के परंपरागत अधिकारों का व्यवस्थापन नहीं किया गया है.
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के नाम पर बफरजोन की आड़ में हजारों हेक्टेयर जमीन वन्यजीव
सुरक्षा और पर्यटन के नाम पर हस्तांतरित की जा रही है, जबकि विस्थापित होनेवाले
परिवारों के लिये पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं लागू की गयी है. इस उद्यान की
सुरक्षा के नाम पर सेवानिवृत सैनिकों की परोक्ष तौर पर नियुक्ति की गयी है. इससे
आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में इजाफा हुआ है. उमरिया जिले में बाघ परियोजना
के नाम पर लगभग 30 गांवों को विस्थापित किया जा रहा है. इनके पुनर्वास की व्यवस्था
अबतक नहीं की गयी है. दुर्भाग्य से वन्य जीवों के नाम पर लागू संरक्षणकारी
परियोजनाओं से सदियों तक वन्य जीवों के साथ रहनेवाले समाज को ही प्रताड़ित किया जा
रहा है.
इन क्षेत्रों मे आदिवासी सुरक्षा के लिये संसद द्वारा पारित पंचायत विस्तार उपवंध
अधिनियम के तहत ग्रामवासियों के अधिकार को भी मान्यता नहीं मिल पायी है. इस क्षेत्र
के मंझौली में परंपरागत वन आश्रित समाज के पास 1927 के पूर्व का रिकार्ड है किन्तु
जब इन परिवारों ने वनाधिकार के दावे दर्ज किये तो उन्हें निरस्त कर दिया गया.
वन विभाग का जंगल राज
एक ओर वनाधिकार कानून के द्वारा सामुदायिक अधिकारों की बहाली के लिये आदिवासियों और
वनाश्रित समाज के परंपरागत अधिकारों को वैधानिक मान्यता दी जा रही है तो दूसरी ओर
राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभ्यारण्य क्षेत्र में परंपरागत अधिकारों का उपयोग
करनेवाले आदिवासियों पर वन अपराध के मामले दर्ज किये जा रहे हैं, जो शासन की
नीतियों और कार्रवाही के बीच विरोधाभास का उदाहरण है. इस क्षेत्र में वन विभाग के
कर्मचारियों के द्वारा मारपीट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं.
शहडोल जिले के ग्राम सरवाही में वन विभाग के कर्मचारी वन सुरक्षा समिति के माध्यम
से विगत दस वर्षो से उनकी फसल उजाड़ रहे हैं. वन क्षेत्र में आदिवासियों के परिवहन
पर प्रत्यक्ष रुप से बंदिश लगा दी गयी है. वनोपज संग्रहण के एवज में वन कर्मचारियों
द्वारा दारू, मुर्गा तथा पैसे की मांग की जा रही है. हैरत की बात तो यह है कि
आदिवासियों द्वारा दर्ज शिकायत पर वन विभाग के किसी भी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई
नहीं की गई.
पपरेड़ी गांव की स्थिति तो यह है कि किसी भी आदिवासी परिवार को वनाधिकार के पट्टे
नहीं दिये गये हैं. पर्याप्त जानकारी के अभाव में 70 फीसदी से अधिक काबिज पात्र
आवेदन ही नहीं दर्ज कर पाये. ग्राम वसनगरी के 67 आदिवासी परिवारों ने वनाधिकार के
तहत दावा तो दर्ज किया और उसे वनाधिकार समिति ने अग्रसारित कर दिया लेकिन
जिलास्तरीय समिति ने आवेदनों को खारिज कर दिया. यहां तक कि सामुदायिक अधिकार के
दावे के लिये दर्ज किसी भी दावे पर कार्रवाई नहीं नहीं की गयी.
बैगा तथा गोंड जाति की बहुलता होने के बावजूद उमरिया में वनाधिकार कानून गंभीरता से
लागू नहीं किया गया. स्थानीय प्रशासन द्वारा अब तक मात्र 17 फीसदी मामलों का
निपटारा किया गया है. अधिकांश काबिजों को वन विभाग द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है.
इस क्षेत्र के एक व्यक्ति ने बताया कि वनाधिकार पत्रक के माध्यम से निर्धारित 10
एकड़ की जगह 50 डिसमल से एक एकड़ जमीन पर ही अधिकार दिया जा रहा है.
डिंडोरी के विधायक ओंकार सिंह मरकाम के मुताबिक वन अधिकार कानून का प्रचार प्रसार
अब तक ठीक ढंग से नहीं किया गया है. इसलिये इस कानून की भावना और उद्देश्यों से
सरकारी कर्मचारी पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं. वनाधिकार कानून का क्रियान्वयन पूरी तरह
से गैरजिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दिया गया है. सरकारी रिकार्ड के
मुताविक जिले में मात्र 6814 लोगों को वनाधिकार के पट्टे दिये गये हैं. जबकि अभी भी
50,000 से अधिक परिवार इन जंगलों में काबिज हैं, जिनका व्यवस्थापन नहीं हो पाया है.
इस क्षेत्र के ग्राम तीतराही के नान्हू बैगा का कहना है कि वन विभाग का रवैया पहले
से अधिक आक्रामक हो चुका है. आदिवासियों के खेतों में फसल उजाड़ने, उनकी कुल्हाड़ी,
हल, बैल जब्त करने की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. मंडला के घुघरी
क्षेत्र के नेवसा टोला के धर्मदास बैगा बताते हैं कि गांव के 26 आदिवासी परिवारों
ने फरवरी 2009 में दावा पेश किया था परंतु इस क्षेत्र के सात गांवों में से किसी भी
आदिवासी परिवार के दावे मंजूर नहीं किये गये.
कानून ठेंगे पर
एक ओर तो बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की जा रही है तो दूसरी ओर वनोपज पर जीविका
अर्जित करनेवाले किसी भी परिवार के प्रति प्रशासनिक संवेदनशीलता नहीं हैं. ग्राम
साजपानी के लोगों ने बताया कि 108 परिवारों ने वनाधिकार के तहत दावा पत्र प्रस्तुत
किया, जिसमें 64 परिवारों को वनाधिकार का पट्टा मिला. शेष 44 परिवारों को उनके दावे
स्वीकृत तथा अस्वीकृत होने तक की सूचना तक नहीं दी गयी. इस क्षेत्र के पनका, अहीर
तथा अन्य परंपरागत वनवासियों में किसी के दावे स्वीकार नहीं किये गये हैं.
आगे पढ़ें