पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

सेक्स, सिक्स और सट्टा

कहां है किसानों का पैसा

क्यों महंगा है इलाज

बलि का या निर्बली का बकरा?

काश, काटजू कम बोलते!

मराठवाड़ा: उम्मीद के सत्संग, मौत के खूंटे!

आइये लाइक करें ऊर्फ मुद्दा गायब

अफजल गुरु की याद में

धर्म की दीवार में औरतें

पेंशन बिल यानी कामगारों की तबाही

हिन्दू फांसी

कॉरपोरेट का होमसाइंस

क्यों महंगा है इलाज

कहां है किसानों का पैसा

सेक्स, सिक्स और सट्टा

एफडीआई: संघर्ष अभी बाकी है

नदियों को जोड़ने की नादानी

धोखे का आधार

जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >मध्यप्रदेश Print | Share This  

जायें तो कहां जायें आदिवासी

मुद्दा

 

जायें तो कहां जायें आदिवासी

कुमार कृष्णन

आदिवासी


आदिवासियों एवं जंगलवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने और जंगल पर अधिकारों को मान्यता देने के लिये लागू किये गये वन अधिकार कानून को पांच साल होने जा रहे हैं लेकिन आदिवासियों एवं परंपरागत वनवासियों को एकल तथा सामुदायिक वन अधिकार नहीं मिल पाया हैं. राज्य सरकारें आगे सर्वेक्षण नहीं कराना चाहती हैं और इसके उलट बहुत बड़ी आबादी को वनों से वेदखल करना चाहती हैं. सरकारों की नीतियां इस तरह बनाई जा रही हैं कि जंगलों को आसानी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया जा सके. जगह-जगह वनवासियों और वन विभाग के बीच संघर्ष जारी है. लोगों का गुस्सा वन विभाग के प्रति है. जंगल में रहने वाले हक के लिये फिर निणार्यक लड़ाई लड़ने की तैयारी में हैं. एक बार फिर 2 अक्टूबर 2012 को एक लाख लोग ग्वालियर से दिल्ली तक की जनसत्याग्रह 2012 में जाने की तैयारी कर रहे हैं.

पिछले माह जब मैं मध्यप्रदेश तथा गुजरात की यात्रा पर था तो जगह-जगह लोगों ने वन विभाग के जंगल राज की दास्तान सुनाई. मध्यप्रदेश के सीधी जिले में बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान की आड़ में वनविभाग द्वारा आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है. इस क्षेत्र में अब तक 300 बैगा और गौंड आदिवासी परिवारों पर वन्यजीव संरक्षण कानून के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया है. इन इलाकों में वनाधिकार कानून के दायरे में अदिवासियों के परंपरागत अधिकारों का व्यवस्थापन नहीं किया गया है.

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के नाम पर बफरजोन की आड़ में हजारों हेक्टेयर जमीन वन्यजीव सुरक्षा और पर्यटन के नाम पर हस्तांतरित की जा रही है, जबकि विस्थापित होनेवाले परिवारों के लिये पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं लागू की गयी है. इस उद्यान की सुरक्षा के नाम पर सेवानिवृत सैनिकों की परोक्ष तौर पर नियुक्ति की गयी है. इससे आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में इजाफा हुआ है. उमरिया जिले में बाघ परियोजना के नाम पर लगभग 30 गांवों को विस्थापित किया जा रहा है. इनके पुनर्वास की व्यवस्था अबतक नहीं की गयी है. दुर्भाग्य से वन्य जीवों के नाम पर लागू संरक्षणकारी परियोजनाओं से सदियों तक वन्य जीवों के साथ रहनेवाले समाज को ही प्रताड़ित किया जा रहा है.

इन क्षेत्रों मे आदिवासी सुरक्षा के लिये संसद द्वारा पारित पंचायत विस्तार उपवंध अधिनियम के तहत ग्रामवासियों के अधिकार को भी मान्यता नहीं मिल पायी है. इस क्षेत्र के मंझौली में परंपरागत वन आश्रित समाज के पास 1927 के पूर्व का रिकार्ड है किन्तु जब इन परिवारों ने वनाधिकार के दावे दर्ज किये तो उन्हें निरस्त कर दिया गया.

वन विभाग का जंगल राज
एक ओर वनाधिकार कानून के द्वारा सामुदायिक अधिकारों की बहाली के लिये आदिवासियों और वनाश्रित समाज के परंपरागत अधिकारों को वैधानिक मान्यता दी जा रही है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभ्यारण्य क्षेत्र में परंपरागत अधिकारों का उपयोग करनेवाले आदिवासियों पर वन अपराध के मामले दर्ज किये जा रहे हैं, जो शासन की नीतियों और कार्रवाही के बीच विरोधाभास का उदाहरण है. इस क्षेत्र में वन विभाग के कर्मचारियों के द्वारा मारपीट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं.

शहडोल जिले के ग्राम सरवाही में वन विभाग के कर्मचारी वन सुरक्षा समिति के माध्यम से विगत दस वर्षो से उनकी फसल उजाड़ रहे हैं. वन क्षेत्र में आदिवासियों के परिवहन पर प्रत्यक्ष रुप से बंदिश लगा दी गयी है. वनोपज संग्रहण के एवज में वन कर्मचारियों द्वारा दारू, मुर्गा तथा पैसे की मांग की जा रही है. हैरत की बात तो यह है कि आदिवासियों द्वारा दर्ज शिकायत पर वन विभाग के किसी भी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

पपरेड़ी गांव की स्थिति तो यह है कि किसी भी आदिवासी परिवार को वनाधिकार के पट्टे नहीं दिये गये हैं. पर्याप्त जानकारी के अभाव में 70 फीसदी से अधिक काबिज पात्र आवेदन ही नहीं दर्ज कर पाये. ग्राम वसनगरी के 67 आदिवासी परिवारों ने वनाधिकार के तहत दावा तो दर्ज किया और उसे वनाधिकार समिति ने अग्रसारित कर दिया लेकिन जिलास्तरीय समिति ने आवेदनों को खारिज कर दिया. यहां तक कि सामुदायिक अधिकार के दावे के लिये दर्ज किसी भी दावे पर कार्रवाई नहीं नहीं की गयी.

बैगा तथा गोंड जाति की बहुलता होने के बावजूद उमरिया में वनाधिकार कानून गंभीरता से लागू नहीं किया गया. स्थानीय प्रशासन द्वारा अब तक मात्र 17 फीसदी मामलों का निपटारा किया गया है. अधिकांश काबिजों को वन विभाग द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है. इस क्षेत्र के एक व्यक्ति ने बताया कि वनाधिकार पत्रक के माध्यम से निर्धारित 10 एकड़ की जगह 50 डिसमल से एक एकड़ जमीन पर ही अधिकार दिया जा रहा है.

डिंडोरी के विधायक ओंकार सिंह मरकाम के मुताबिक वन अधिकार कानून का प्रचार प्रसार अब तक ठीक ढंग से नहीं किया गया है. इसलिये इस कानून की भावना और उद्देश्यों से सरकारी कर्मचारी पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं. वनाधिकार कानून का क्रियान्वयन पूरी तरह से गैरजिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दिया गया है. सरकारी रिकार्ड के मुताविक जिले में मात्र 6814 लोगों को वनाधिकार के पट्टे दिये गये हैं. जबकि अभी भी 50,000 से अधिक परिवार इन जंगलों में काबिज हैं, जिनका व्यवस्थापन नहीं हो पाया है.

इस क्षेत्र के ग्राम तीतराही के नान्हू बैगा का कहना है कि वन विभाग का रवैया पहले से अधिक आक्रामक हो चुका है. आदिवासियों के खेतों में फसल उजाड़ने, उनकी कुल्हाड़ी, हल, बैल जब्त करने की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. मंडला के घुघरी क्षेत्र के नेवसा टोला के धर्मदास बैगा बताते हैं कि गांव के 26 आदिवासी परिवारों ने फरवरी 2009 में दावा पेश किया था परंतु इस क्षेत्र के सात गांवों में से किसी भी आदिवासी परिवार के दावे मंजूर नहीं किये गये.

कानून ठेंगे पर
एक ओर तो बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की जा रही है तो दूसरी ओर वनोपज पर जीविका अर्जित करनेवाले किसी भी परिवार के प्रति प्रशासनिक संवेदनशीलता नहीं हैं. ग्राम साजपानी के लोगों ने बताया कि 108 परिवारों ने वनाधिकार के तहत दावा पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें 64 परिवारों को वनाधिकार का पट्टा मिला. शेष 44 परिवारों को उनके दावे स्वीकृत तथा अस्वीकृत होने तक की सूचना तक नहीं दी गयी. इस क्षेत्र के पनका, अहीर तथा अन्य परंपरागत वनवासियों में किसी के दावे स्वीकार नहीं किये गये हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Shiwani Thakur [] Durgapur - 2013-02-16 05:26:16

 
  THE TRIBAL SHOULD GET JUSTICE 
   
 

H.Dayanand Singh [newworld444@yahoo.com] Imphal east - 2012-09-22 04:27:13

 
  The government in the state is not implementing Forest Rights Act properly which guarantees land rights to the tribals living in forest areas. 
   
 

Beena Sharma [beenasharmar50@gmail.comb] Meerut - 2012-09-19 08:33:48

 
  कानून में अन्याय से मुक्ति की बात कही गई है. आखिर सरकार के अमले हक देने में कोताही क्यों कर रहे हैं. 
   
 

Anurag Asthana [asthanaanurag200@gmail.com] jaunpur - 2012-09-13 02:25:55

 
  आखिर ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने के सरकार के वादे और प्रतिबद्धता को क्या हुआ. 
   
 

santosh m padwal [smpadwal@gmail.com] mumbai - 2012-09-11 04:29:13

 
  I will take part in jan satyagraha for justice of trible and poor people 
   
 

mala kumari [malakumarijmp@gmail.com] dehli - 2012-09-10 16:16:39

 
  हक के लिए एकजुट होना होगा. 
   
 

Shiv Shankar Singh Parijat [shivsingh.parijat@gmail.com] Bhagalpur - 2012-09-09 14:26:19

 
  To deprive tribals of the rights related with their lives and livelihood despite of bonafide laws enacted by govt on different pretext, is shameful. I support the campaign of Honourable P.V.Rajgopal Ji.  
   
 

sajjan kumar Garg [garg.sajjan @gmail.com] Munger - 2012-09-09 08:20:12

 
  आखिर कब तक चलेगी वन विभाग की दादागिरी. 
   
 

sanjay kumar [skkumar.sanjay@gmail.com] khagaria, Bihar - 2012-08-13 07:21:28

 
  ये हमारे देश की नीति नियंताओं की कारगुजारी का नतीजा है. जिसकी वजह से हमारे अपने बेगाने हो गए हैं और आपस में लड़-मर रहे हैं. 
   
 

Nirmal gorana [nirmalgorana@gmail.com] Bandhua Mukti Mrocha, 7 Jantar Mantar Road, New Delji-110001 - 2012-07-28 08:27:31

 
  We should support the Honorable P. V. Rajgopal Ji and we should campaign for the rights of our tribal civilians. We can go on strike to show support, in Delhi.  
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in