शरद पवार क्यों नाराज हुये
बाईलाइन
शरद पवार क्यों नाराज हुये
एम जे
अकबर
ऐसे चार वाकये हैं, जब केंद्र सरकार कांग्रेस के समर्थन
वापस लेने के कारण गिरी है. वर्ष 1979 में इंदिरा गांधी ने जिस फुर्ती से चरण सिंह
को समर्थन दिया था, उसी फुर्ती से वापस भी ले लिया. इसके पीछे कोई वजह नहीं बतायी
गयी. 1991 में राजीव गांधी ने अपने घर के आसपास हरियाणा पुलिस की मौजूदगी को मुद्दा
बनाकर चंद्रशेखर सरकार गिरा दी. 1997 और 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी
ने एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार गिरा दी. मरते दम तक उन्होंने
इसका कारण नहीं बताया. पर सभी फैसलों का कोई कारण जरूर होता है.
इंदिरा गांधी ने उन झगड़ालू अभिमानी नेताओं के असली चेहरे को उजागर किया, जो यह
समझते थे कि उन्होंने इंदिरा को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है. केसरी ने
मूर्खतापूर्ण ढंग से यह सोचा कि वे चुनाव कराकर प्रधानमंत्री बन सकते हैं. इतिहास
से तुलना करें तो शरद पवार का कैबिनेट में बैठने की व्यवस्था के प्रति चिंतित होना
गंभीर और प्रासंगिक लगता है. यह सिर्फ सजावटी मामला नहीं, बल्कि गठबंधन में सत्ता
की फितरत का है. उन्होंने यूपीए गठबंधन में हलचल पैदा करने का यह वक्त कई कारणों से
चुना है.
प्रणब मुखर्जी की गैर मौजदूगी ही सरकार में असंतुलन को जन्म देने वाली एकमात्र वजह
नहीं है. राहुल गांधी की संभावित मौजूदगी भी इसका एक कारण है. कांग्रेस में कुछ
हफ्ते पहले से बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी. कैबिनेट कक्ष में राहुल कहां
बैठेंगे, यह कोई मुद्दा नहीं होगा. सत्ता का संतुलन पहले ही उनकी ओर मुड़ चुका है.
मनमोहन सिंह अपनी ही पार्टी द्वारा किनारे किये जा रहे हैं. प्रणब मुखर्जी ऐसे पहले
वरिष्ठ नेता थे, जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर ऐलान किया था कि वे राहुल गांधी के
अंदर काम नहीं करेंगे. उन्होंने यह ऐलान नम्रता और शिष्टता के साथ किया था, लेकिन
वे अपने फैसले के प्रति कायम भी रहे. वे अब इस देश के पहले नागरिक बनने जा रहे हैं.
जब बदलाव होगा तो स्वाभाविक तौर पर मनमोहन सिंह राजनीति से रिटायर हो जायेंगे. शरद
पवार ने राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया को कांग्रेस का नेता मानने से इनकार कर
दिया था और 2004 में उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना का भी विरोध किया था.
कांग्रेस ने स्पष्ट कह दिया है कि 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई राहुल
करेंगे और अगर कांग्रेस को बहुमत वाले गठबंधन का नेतृत्व करने का मौका मिलेगा तो
राहुल प्रधानमंत्री होंगे. पवार के लिए स्थिति साफ है. वे या तो खुद को बदल लें, या
अलग हो जायें. उनकी असहजता में हैरान होने वाली कोई बात नहीं. सोनिया और मनमोहन
पवार को मनाने की कोशिश सिर्फ इस कारण से कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें बदलाव पर सभी
सहयोगियों की मुहर की जरूरत है, न कि इसलिए कि पवार एक बेहतरीन नेता हैं.
पिछले आठ वर्षों से कांग्रेस ने सहयोगियों की कीमत पर अपनी ताकत बढ़ाने की पूरी
कोशिश की. कांग्रेस मुलायम सिंह यादव, मायावती और लालू प्रसाद का समर्थन उन्हें
बगैर कोई मंत्री पद दिये ही हासिल करती रही. सहयोगी दलों को कैबिनेट में दोयम दर्जा
दिया. पवार जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तब वर्तमान कैबिनेट के अधिकांश सदस्य
एमएलए की हैसियत भी नहीं रखते होंगे. उन्हें कृषि मंत्रालय का लॉलीपाप थमा दिया
गया. सहयोगी दलों को सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी नहीं दी गयी. सारे राज्यपाल
कांग्रेस की पसंद के हैं.
पवार न तो इस बात को भूले हैं कि 2004 में विधायकों की संख्या अधिक होने के बावजूद
उन्हें महाराष्ट्र में कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया.
पवार ने यह कदम अभी क्यों उठाया, इसका एक और जवाब है. इस कदम के लिए वक्त का चुनाव
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के व्यापक विश्लेषण के बाद किया गया है. जब तक कांग्रेस
चुनाव में वोट हासिल कर रही थी, तब तक सहयोगियों ने अपने सम्मान के साथ समझौता
किया. लेकिन अब जब यह तय हो चुका है कि कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा है तो दूसरे
विकल्पों और ठिकानों की तलाश शुरू हो गयी है.
इस हलचल का पहला असर महाराष्ट्र में महसूस किया जायेगा. कोई भी इसे सार्वजनिक तौर
पर नहीं कहेगा, लेकिन शिवसेना और कांग्रेस दोनों इस बात को लेकर चिंतित हैं कि पवार
अगले चुनाव में भाजपा के साथ परोक्ष या अपरोक्ष गठबंधन कर सकते हैं.
इस बदलाव का घातक पहलू यह है कि शिवसेना और कांग्रेस कभी सहयोगी नहीं हो सकते. इसी
संभावना को देखते हुए सेना पारिवारिक कलह को खत्म करने के लिए तेजी से कदम बढ़ा रही
है. क्या पवार ने इसके परिणामों पर विचार किया है? या यह केवल दिखावा है, जिसका
समाधान हो जायेगा?
पवार जैसे अनुभवी राजनेता बिना सोचे-विचारे कोई खतरा नहीं उठाते हैं. वे हवा का रुख
भांप लेते हैं. ममता बनजी भी जल्दी चुनाव चाहती है और वे अकेले लड़ेंगी. मुलायम
सिंह अपनी पार्टी को 2013 के लिए तैयार रहने का संदेश दे रहे हैं. धीरे-धीरे यूपीए
टोली बिखर रही है. अब व्यावहारिक राजनीति का समय आ गया है. जाहिर है, कुर्सी के
मामले में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं होता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के
संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
22.07.2012, 10.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित