राहुल गांधी का पद, कद और हद
बात पते की
राहुल गांधी का पद, कद और हद
कनक तिवारी
अखबारी सुर्खियों में बने या बनाए रखने की तकनीक बहुत पुरानी लेकिन उपयोगी है.
सुर्खीबाज़ व्यक्ति स्वप्रचार में बेहद ज़हीन होता है जैसे नरेन्द्र मोदी. वे खुद को
भगवान कृष्ण से लेकर हमनाम नरेन्द्रनाथ दत्त अर्थात स्वामी विवेकानन्द के समकक्ष
प्रसारित कराते रहते हैं.
पी. ए. संगमा ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़कर अखबारी सुर्खियां बटोरीं. मुलायम सिंह
यादव ने उत्तरप्रदेश का चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी के साथ वायदाखिलाफी की और
सुर्खियों में आ गए. डॉ. मनमोहन सिंह के खैरख्वाह उन्हें अमरीकी और ब्रिटिश पत्र
पत्रिकाओं में नाकाबिल घोषित करवाते हैं, जिससे भारत में उनके लिए राष्ट्रवादी
संप्रभुता की नस्ल की सहानुभूति प्राप्त हो सके.
यही हाल उत्तरप्रदेश की राजनीति से संबद्धता रखने वाले कांग्रेस के तीन कद्दावर
नेताओं की हालिया बयानबाजी का है. पहले सलमान खुर्शीद, फिर दिग्विजय सिंह और पीछे
पीछे जनार्दन द्विवेदी ने ऐलानेआम किया है कि राहुल गांधी देश से ज़्यादा कांग्रेस
के हित में कोई बड़ी भूमिका का निर्वाह करने वाले हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया
गांधी ने साफ कहा कि इसका फैसला खुद राहुल गांधी को करना है. राहुल गांधी ने संशोधन
किया कि बड़ी भूमिका तो उन्हें अदा करनी ही है. उसकी तिथि का फैसला कांग्रेस अध्यक्ष
और प्रधानमंत्री को करना है.
क्या होती है बड़ी भूमिका? क्या अब तक राहुल गांधी बड़ी भूमिका अदा नहीं कर रहे थे?
चारों ओर कांग्रेस के बड़े से बड़े पदाधिकारी और केन्द्रीय मंत्री सहायकों की तरह
चलें वह क्या बड़ी भूमिका का परिचायक नहीं है? कांग्रेस अध्यक्ष की अनुपस्थिति में
उन्हें चुनिंदा नेताओं की टीम में ज़रूरी फैसलों के लिए नामज़द भी किया जाता है. बड़ी
भूमिका का अर्थ यदि बड़ी कुर्सी से है तो या तो उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनना है
अथवा देश का प्रधानमंत्री.
कांग्रेस के चखचखबाज़ार में अफवाह गर्म है कि उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष
अथवा उपाध्यक्ष बनाया जा सकता है. उपाध्यक्ष पद पर कमलापति त्रिपाठी, अर्जुन सिंह
और जितेन्द्र प्रसाद पहले ही बैठ चुके हैं. इन सबका राजनीतिक हश्र पार्टी नेतृत्व
द्वारा की गई सार्वजनिक छीछालेदर में हुआ. हेमवतीनंदन बहुगुणा को कांग्रेस सविधान
में संशोधन के जरिए पार्टी का राष्ट्रीय सेक्रेटरी जनरल अथवा मुख्य महासचिव बनाया
गया. बहुगुणा में दमखम था, इसलिए उनसे पार्टी नेतृत्व को समझौता करना पड़ा. इसलिए
शायद कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से ही बड़ी भूमिका के संकेत कांग्रेसियों के उन
विज्ञापनों में उलकने तैयार बैठे हैं जिसके शुभ संकेत की उम्मीद में उनकी आंखें फड़क
रही होंगी.
यह भी खबर है कि शायद राहुल गांधी को केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया जाए.
इससे तो उनकी पार्टी में तीसरे नंबर की जगह सुनिश्चित होगी, जिसे राहुल को प्रोन्नत
करना नहीं कहा जा सकता. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अपनी तीसरी पारी खेलने की यदि
इच्छा व्यक्त करेंगे तो सबसे ज़्यादा कठिनाई तो राहुल गांधी को ही होगी.
मंत्रिपरिषद का एक मंत्री बाकी विभागों के मंत्रियों से सवाल जवाब किस तरह कर सकेगा
जो कि राहुल गांधी पार्टी महासचिव की हैसियत में कर सकते हैं.
2014 के लोकसभा चुनाव तक केन्द्रीय मंत्री के रूप में क्या राहुल की ट्रेनिंग
ताबड़तोड़ हो सकती है, जिससे वे लोकसभा में कांग्रेस पार्टी की अगुआई कर सकें? उन्हें
सरकार में शामिल करने की सलाह देने वाले क्या असल में डॉ. मनमोहन सिंह के पैरोकार
नहीं हैं?
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भयानक हार के बाद राहुल गांधी का राष्ट्रीय नेता के
रूप में चेहरा दरक गया है. उत्तरप्रदेश के प्रभारी नेताओं दिग्विजय सिंह, सलमान
खुर्शीद, बेनीप्रसाद वर्मा और श्रीप्रकाश जायसवाल वगैरह पहले ही कबाड़ा कर चुके हैं.
24 अकबर रोड के कांग्रेस कार्यालय में कोई विचारक भी है?
पार्टी के सबसे बड़े संकटमोचक तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी थे. उनकी गैर मौज़ूदगी
में चिदंबरम, कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद की तिकड़ी कांग्रेस-विचारक है. सरकारी
नुमाइंदे उद्योगपति, सामंतवादी सूबेदार और चाटुकारों के साथ मिलकर कांग्रेस को
संभाल रहे हैं.
नेहरू देश के सबसे युवा कांग्रेस अध्यक्ष बने. रावी नदी के तट पर उनके ही सभापतित्व
में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का नारा बुलंद किया था. सुभाष बोस ने 42 वर्ष की उम्र
में पहले हरिपुरा और फिर त्रिपुरी में कांग्रेस अध्यक्ष का पद लड़कर हथियाया था. इसी
उम्र में पार्टी अध्यक्ष बनीं इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्री पिता से अलग हटकर
फैसले किए थे. जवाहरलाल तीसरी दुनिया के निर्माता थे. पर इंदिरा गांधी ने अपनी
मर्दानगी के दम पर पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनवा दिया.
संजय गांधी ने पार्टी को अपनी मुट्ठी में रखा लेकिन जनता पार्टी के शासनकाल में सड़क
पर आकर परचम थामा. हादसे के कारण प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने अपने सोच के आधार
पर देश को तक्नालॉजी मिशन, शिक्षा मिशन, स्वास्थ्य मिशन और दलबदल विरोधी कानून
वगैरह से जोड़ा.
असल सवाल यह है कि राहुल गांधी की सोच क्या है? विदेशी बीमा कंपनियां, बैंक, वकील,
पूंजी निवेशक, मीडिया मुगल, हथियारों के स्मगलर, जहरीली दवाइयां सब हिन्दुस्तान चले
आ रहे हैं. देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जा रहे हैं. किसानों और आदिवासियों
की ज़मीनों पर डकैती की जा रही है. गंगा समेत सभी नदियों को प्रदूषित किया जा रहा
है. खेती की धरती सिकुड़ रही है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं. नक्सलवाद और आतंकवाद
की फुफकार से पूरे देश में ज़हर फैल रहा है. अंबानी की अट्टालिका के मुकाबले ज़मीदोज़
किसानों के शव हैं. महंगाई डॉ. मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को नियंत्रित कर रही है.
काले धन के धारक उजले कपड़ों में हैं. योग के गुरु भोग की दुनिया में हस्तक्षेप कर
रहे हैं. विधायिकाओं में अशिष्टों को तरजीह दी जा रही है अथवा हंसोड़ों को.
इस राष्ट्रीय परिदृश्य में राहुल गांधी के हाथ में कौन सी नकेल है? कांग्रेस के
प्रचार विभाग से कितनी पुस्तिकाएं राहुल गांधी की लिखी अवाम के लिए बांटी जा रही
हैं? कांग्रेस के संविधान की पोथी कितने कांग्रेसियों के पास है? जवाहरलाल की नकल
में कांग्रेसी चूड़ीदार पाजामा शेरवानी और टोपी धारण करते रहते थे. संजय और राजीव
गांधी की पोशाक-शैली की नकल करने से कांग्रेस में बढ़ोतरी के रास्ते खोजे जाते थे.
मौजूदा युवक कांग्रेसी तो राहुल की शैली के कुरते पाजामे भी नहीं पहनते. जब देह पर
राहुल गांधीनुमा वस्त्र ही नहीं तो उनके ज़ेहन में कितने राहुल गांधी होंगे.
इसमें कोई शक नहीं कि नेहरू गांधी परिवार ही कांग्रेस की धुरी है. इस परिवार के
सहसा हट जाने से बाकी कांग्रेसियों में राष्ट्रीय नेतृत्व की क्षमता तलाशना या
तराशना कठिन होगा. उत्तरप्रदेश के मतदाता ने शहरी किस्म के चिकने चुपड़े, इत्र फुलेल
में गमकते, महंगी पोशाकों, सिगरेटों, शराबों और मोटर कारों से लैस वर्ग को नकार
दिया है. राहुल गांधी को कांग्रेस में उन धरतीपुत्रों की तलाश और व्यवस्था करनी
होगी जो पिछले सौ वर्षों से अधिक से कांग्रेस का पर्याय हैं.
कांग्रेस पार्टी और उसके आसपास साजिशों की कमी नहीं रही. चीनी आक्रमण को लेकर नेहरू
पर दोष लगाए गए. इंदिरा गांधी से आपातकाल लगवाया गया. शाहबानो और राम मंदिर प्रकरण
में राजीव गांधी से गलत फैसले करवाए गए. मोंटेक सिंह अहलूवालिया देश में शहरी और
ग्रामीण गरीबी तय कर रहे हों. प्रवक्ता मनीष तिवारी अन्ना हजारे को अपशब्द कह रहे
हों. राजीव शुक्ला प्रधानमंत्री कार्यालय का मस्तिष्क हों. संजय निरुपम लोकसभा में
कांग्रेस की बागडोर संभालें. जर्नादन द्विवेदी पर कांग्रेस पार्टी का भार हो.
दिग्विजय सिंह के बयान पार्टी लाइन के ऊपर इस कदर तैर रहे हों जैसे छाछ के ऊपर
मक्खन. वहां राहुल गांधी को अपने उच्च राजनीतिक कुल की वंश परंपरा को आगे बढ़ाना है.
संकोच, शालीनता, मितभाषिता, अल्पभाषिता वगैरह सज्जन व्यक्ति के गुण हैं जो राहुल
गांधी हैं. राजनीति कर्मठता, चपलगति, प्रहार, जनवादी विचार और स्वतंत्र विवेक का
आव्हान करती हैं. इसके बिना राष्ट्रीय नेतृत्व उपलब्ध नहीं होता. जब देश में
नरेन्द्र मोदी, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, जयललिता, नवीन पटनायक, येदियुरप्पा
जैसे क्षत्रप उग रहे हों, तब राहुल गांधी को सोचना होगा कि भीड़ में बैसाखी पर चढ़कर
नहीं, लोगों के कंधों तक पर चढ़कर जगह तलाश लेने से गंतव्य तक कैसे पहुंचा जा सकता
है.
26.07.2012, 13.16
(GMT+05:30) पर प्रकाशित