ओपरा विनफ्रे पैर से खाती हैं ?
बाईलाइन
ओपरा विनफ्रे पैर से खाती हैं ?
एम जे अकबर
ऐसा लगता है कि भारतीयों को हाथ से खाता देखकर समकालीन रीति-रिवाज की अपरिहार्य
आइकॉन ओपरा विनफ्रे को गहरी और दम घुटने वाली घृणा हो गयी है. काफी अमीर और अति
सभ्य ओपरा अपने पैरों से खाती होंगी.
हम सभी अपनी अंगुलियों से ही खाते हैं. इसके लिए कुछ लोगों को अंगुलियों से पकड़ने
के लिए धातु या लकड़ी के चम्मच की जरूरत महसूस होती है. हरेक की अपनी इच्छा है,
छुरी-कांटे वाले सोचते हैं कि चम्मच और कांटा स्वच्छता की विशेषता हैं. यह तर्क
निरर्थक और संदेहास्पद लगता है. कम से कम आपकी अंगुलियां आपकी हैं. कांटा-चम्मच
नहीं. क्या आप यह जानना चाहते हैं कि किसने रेस्टोरेंट में आपसे पहले इसे मुंह में
डाला था? आप वहां ऐसे सवालों को दिमाग में रखकर नहीं जाना चाहते हैं.
परंपरा प्रत्यक्ष तौर पर बाधा बन सकती है. जो चम्मच से खाना खाने में विश्वास नहीं
रखते, वे आमतौर पर अपने हाथ और अंगुलियां साफ रखते हैं. खाना खाने से पहले वे हाथ
धोते हैं. इसके अलावा भारतीय मौसम नहाने के अनुकूल है और यहां नहाने को विशेष आयोजन
नहीं माना जाता. इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि अपने दौर के शक्तिशाली सामाजिक
व्यवहारों का निर्धारण करते हैं.
ताकत का आकलन आर्थिक विकास और सैन्य प्रभुत्व के आधार पर किया जाता है और यह चक्रीय
होता है. मिश्र, ग्रीस, भारत, चीन, मेक्सिको, मेसोपोटामिया, फारस, रोम, तुर्की,
मंगोलिया, कंबोडिया, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अमरीका सभी की बारी आ चुकी
है. सफलता ही उपयोग और व्यवहार के पैमाने का निर्धारण करती है.
डेरियस के शासनकाल में फारसी दाढ़ी के अलग ही जलवे थे. बर्नाड लुइस ने
व्यंग्यपूर्वक लिखा कि काहिरा के लोगों ने 13 वीं सदी के मध्य में बगदाद की बर्बादी
के बाद मंगोल आक्रमण से बचने के लिए चंगेज खान की तरह लटकती हुई मूंछ रखने की
तैयारी शुरू कर दी थी.
मुगल शासनकाल के दौरान हेरात से रंगून तक दक्षिण एशिया में अदालत और लोगों के कपड़े
पर मुगल पहनावे का प्रभाव था और चमकदार लाल तुर्की टोपी 1950 के दशक तक हॉलीवुड
फिल्मों में मुसलिम पहचान का निर्धारक दृश्य हुआ करता था. जब तक कि तुर्की में
सुधारवादी मुस्तफा कमाल पाशा ने इसे मध्यकालीन अतीत का प्रतीक मानते हुए बंद नहीं
कर दिया.
ब्रिटिश ने हमें पैंट दिया, जिसके लिए मैं खासकर उनका शुक्रगुजार हूं. यह मेरे
पूर्वजों की धोती और लुंगी के मुकाबले काफी आरामदायक है, हालांकि अब मैं एक पीड़ित
की तरह बात कर रहा हूं.
ब्रिटिश ने अपने साम्राज्य और बड़े भू-भाग को ड्रेस कोड दिया. अमरीका ने भोजन दिया.
यह फास्ट था, लेकिन फूड था. यह लोकतंत्र और धनतंत्र के बीच अंतर की तरह पूरी तरह
वाजिब है. ऐसा ही ब्रिटेन अपने साम्राज्यवादी दौर के समय था. ब्रिटिश खाने को
विरोधाभासी कह भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन यह पेट के लिए डिजाइन किया गया था, ना
कि स्वाद के लिए. दूसरी ओर अमरीकी कपड़े के महत्व को नहीं समझते. जींस को अमरीका का
योगदान करार देना इस बात का प्रसार करना है. लेकिन अमरीका ने अपने दौर में मोटापे
के लिए दुनिया पर कब्जा करने के लिए मैकडोनाल्ड बर्गर बनाया. आप यह बर्गर बीजिंग
में पार्टी की बैठक या मक्का में हज के बाद या इलाहाबाद में गंगा स्नान के बाद खा
सकते हैं. आप जहां भी जायें मैकडोनाल्ड आपका पीछा करता है.
आप भाग्य या सृजनात्मक उपायों से अमेरिकी सेना से बचे रह सकते हैं, लेकिन आप अमरीकन
मैकडोनाल्ड से नहीं बच सकते. पूंजीवाद का कानून अचल है- कोई सेना बाजार की शक्ति को
नहीं हरा सकती. कोई भी जायज सुपरपावर स्टाइल और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है,
लेकिन जब वह संस्कृति में घुसपैठ करने की कोशिश करता है तो उसके प्रयास रुकने लगते
हैं.
स्टाइल की कीमत है, इसे खरीदा जा सकता है. इसी तर्ज पर संस्कृति अनमोल है. संस्कृति
मौजूदा आधुनिक जरूरतों, मजबूरियों या आकर्षणों से अधिक गहरी है. इसे एक उदाहरण से
खत्म करता हूं और यह उदाहरण और कोई नहीं भारत है.
हमने ब्रिटिश शासन से अंगरेजी हासिल की और इसे सत्ता वर्ग की भाषा में बदल दिया.
शासन की भाषा भी अंगरेजी है. हम बैंलेसशीट अंग्रेजी में लिखते हैं. हालांकि समाचार
सभी भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन प्रिंट और टेलीविजन में अंग्रेजी भाषा को विज्ञापन
और प्रभाव दोनों में फायदा हासिल है. अंगरेजी में सभी कुछ है, लेकिन अंग्रेजी में
टेलीविजन सोप ओपेरा नहीं है. क्यों? क्योंकि हम अभी भी हिंदी या उर्दू या बंगाली या
तमिल या भोजपुरी में हंसते और रोते हैं.
समाचार के लिए हम बीबीसी या सीएनएन देख लेते हैं, लेकिन ओपरा विनफ्रे भारत में
टेलीविजन पर फ्लॉप हो जायेंगी. इसलिए नहीं कि वे अच्छी हैं या खराब, इसलिए कि वे
अलग संस्कृति की आवाज हैं. वे सोचती हैं कि अंगुली स्वादहीन होती है, पर हम अंगुली
चाटने को सराहना के तौर पर समझते हैं. कोई भी सही नहीं है और न ही कोई गलत. हम केवल
अलग हैं और इस अलगाव की उम्र लंबी हो.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
29.07.2012, 08.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित