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7 साल का पुलिस वाला

मुद्दा

 

7 साल का पुलिस वाला

सुनील शर्मा बिलासपुर से


सात साल के अनिमेष भारद्वाज को पुलिस की वर्दी पहनना अच्छा नहीं लगता लेकिन अनिमेष की मां उसे समझा-बुझा कर वर्दी पहनाती हैं और फिर ड्यूटी पर भेजती हैं. अनिमेष को भी मालूम है कि वह अगर पुलिस की नौकरी नहीं करेगा तो उसका घर नहीं चल पाएगा. आखिर अपने पिता की मौत के बाद वही तो पूरे परिवार का सहारा है !

अनिमेष भारद्वाज
अनिमेष बाल पुलिस है


छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में अनिमेष अकेला बच्चा नहीं है, जो पुलिस की नौकरी में है. उसके जैसे सैकड़ों बच्चे इस विभाग में काम कर रहे हैं. किसी के जिम्मे फाइलों को लाना-ले जाना है तो किसी के जिम्मे साफ-सफाई. कोई चाय-पानी लाने का काम करता है तो किसी के जिम्मे महकमे के दूसरे काम हैं.

इन सैकड़ों बच्चों की त्रासदी एक जैसी है- पुलिस विभाग में काम करने वाले इनके पिता की मौत और उसके बाद अनुकंपा नियुक्ति के तौर पर 5-6 साल की उम्र में ही पुलिस की वर्दी का बोझ. इन बच्चों को हर दूसरे दिन अपनी ड्यूटी पर जाना होता है.

अब जैसे बिलासपुर के सौरभ नागवंशी को ही लें. सौरभ के पिता रामकुमार नागवंशी जीआरपी में थे. मुंगेली के जमकोर गांव के निवासी रामकुमार नागवंशी के असमय निधन के बाद परिवार के सामने गुजारे का संकट आ खड़ा हुआ. विभाग ने परिवार के सामने रामकुमार नागवंशी की जगह किसी और को अनुकंपा नियुक्ति का प्रस्ताव रखा. रामकुमार नागवंशी की पत्नी ने इसके लिये अपने बेटे सौरभ का नाम सुझाया और विभाग ने तुरंत ही उसे बाल पुलिस के तौर पर विभाग में नौकरी दे दी.

जिस समय सौरभ पहली बार अपने दफ्तर गया था, उस समय उसकी उम्र केवल 5 साल थी. अब इस बात को आठ साल हो गये हैं. जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार होते हैं, सौरभ नागवंशी को ट्रेन पकड़ने की जल्दी होती है. बिलासपुर के रेल्वे कॉलोनी में रहने वाले सौरभ नागवंशी को 110 किलोमीटर दूर रायपुर के जीआरपी कार्यालय में सुबह दस बजे तक पहुंचकर हाजिरी देनी होती है. पिछले आठ सालों से यही उसकी दिनचर्या है. शाम को लौटते वक्त वह इतना थक जाता है कि उसकी पढ़ने की इच्छा नहीं होती.

बिलासपुर में जीआरपी कार्यालय नहीं होने के कारण उसे अनुकंपा नियुक्ति के तहत रायपुर में काम करना पड़ता है. जब वह वर्दी पहनकर ट्रेन में बैठता है तो लोग उसे अजीब निगाह से घूरते हैं और कानाफूसी करते हैं. इससे उसे बुरा लगता है. आजकल वह सामान्य कपड़ों में जाता है और वहां जाकर वर्दी पहन लेता है.

सौरभ नागवंशी
सौरभ 5 साल की उम्र से ड्यूटी पर जा रहे हैं


मासूम सौरभ को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि इतनी कम उम्र में वह इतनी बड़ी जिम्मेदार निभाता होगा. उसकी दो बड़ी बहनें ज्योति और आरती कक्षा 11वीं और 12 में पढ़ती हैं. उनके विवाह की चिंता भी सौरभ को है.

सौरभ कहता है—''अब मैं समझदार हो गया हूं और मुझे अपनी दोनों बड़ी बहनों के विवाह की चिंता भी सता रही है. हालांकि अभी वे पढ़ रही हैं लेकिन उनके लिए अच्छा लड़का भी देखना होगा,जो उन्हें खुश रखें.'' महज तेरह साल के सौरभ के मुंह से यह बातें सुनकर यकीन नहीं होता.

सौरभ की मां ईश्वरी देवी नागवंशी कहती है—''वक्त और हालात ने सौरभ को समझदार बना दिया है. नहीं तो वह तो बिल्कुल बुद्धु था.”

हालांकि उन्हें सौरभ की पढ़ाई को लेकर चिंता रहती है. सौरभ बिलासपुर के भारत माता स्कूल में पढ़ता है. लेकिन रायपुर-बिलासपुर की यात्रा और नौकरी के बाद उसे घर के भी कामकाज करने होते हैं. जाहिर है, इसके बाद वह इस कदर थक जाता है कि पढ़ाई कर पाना उसके लिये संभव नहीं होते.

एक जैसा दर्द
बिलासपुर की पुलिस लाइन की एक टपकती छत के नीचे रहने वाले भारद्वाज परिवार का आर्थिक बोझ सात साल के मासूम अनिमेश के छोटे-छोटे कंधों पर है. उसे तो पिता गिरधर भारद्वाज की मौत की बात याद भी नहीं और यह भी नहीं पता कि कैसे और कब पुलिस विभाग ने उसे अनुकंपा नियुक्ति दी. मां के कहने पर वह दूरसंचार पुलिस विभाग ड्यूटी पर जाता है लेकिन वहां उसका मन नहीं लगता. उसकी उम्र का वहां कोई भी नहीं है, वह किसके साथ खेले. उपर से वहां उसे काम भी करना होता है.

करीब ढाई साल पहले अनिमेष के पिता की मौत एक दुर्घटना में हो गई थी. उसके बाद से ही दूरसंचार पुलिस अधीक्षक कार्यालय में वह ड्यूटी पर जाता है और इसके बदले उसे हर महीने साढ़े पांच हजार रुपए मिलते है लेकिन इससे उसे कोई मतलब नही है. उसे तो शिकायत इस बात की है कि उसे खेलने को नहीं मिलता. स्कूल,दफ्तर,ट्यूशन बस इतने में ही उसकी जिंदगी सिमट कर रह गई है.

उसे साइकिल चलाना अच्छा लगता है और सिक्के जमा करने का शौक है. वह एक अंग्रेजी स्कूल में जरूर पढ़ता है लेकिन पढ़ाई में कमजोर है. कम उम्र में वह आफिस और पढ़ाई दोनों साथ-साथ नहीं कर पाता.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

surya [] chicago,USA - 2012-10-01 04:55:17

 
  Looks like Raviwar has many stories which are beyond to comprehend.Are we living on same planet? what is right and what is wrong? Accidentally I opened Raviwar. What a refreshing, eye opening thoughtful change from Pornful Times of India.keep it up. 
   
 

पद्मनाभ [pmishra_geo@yahoo.co.in] आलंग, अरुणाचल प्रदेश - 2012-09-28 04:10:56

 
  मन दुख गया, पुलिस विभाग को बच्चे के 18 वर्ष का होने तक, बाल आरक्षक से सप्ताह मे केवल एक दिन सांकेतिक उपस्थिति दर्ज करवानी चाहिए या फिर उसके बालिग होने तक तक बच्चे की माँ को एक दिन छोड़ कर नौकरी पर बुलाना चाहिए।  
   
 

monty rajpoot [montyrajpoot9@gmail.com] raipur - 2012-08-16 07:21:21

 
  पुलिस विभाग का भी एनजीओ गठित करना चाहिए व बच्चों के बजाय उनके माता या उनके पालक जिन पर वो आश्रित हों को सशर्त नौकरी में रखना चाहिए के वे उन बच्चों का सही प्रकार से शिक्षा दिलाएं और पालन करेंगे. 
   
 

देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2012-08-04 22:06:25

 
  बहुत शानदार स्टोरी। फाईल पंहुचाने से लेकर दस्तावेज की फोटोकापी तक इन्हीं के जिम्मे है। और संबोधन भी बाल आरक्षक। कभी कभी ऐसा लगता है कि इन्हें नौकरी देकर संभावनांओ को मारा जा रहा है। क्या पता आदित्य तिवारी, आकाश निषाद, रविराज पांडेय, किशन, कुलदीप, आशीष बंजारे, मनोज ध्रुव....सहित कई बाल आरक्षक आज जिन एसपी के केबीन में चाय पानी पंहुचाते हैं। एसपी के कुर्सी पर बैठ जाते। लेकिन परिस्थितियां बालपन को खा रही हैं साथ में संभावनांओं को मार भी रही हैं। सब कुछ खत्म हो जाने जैसा ही है संभावनांओ का मर जाना जब वो निर्माण की दिशा में हो। आपने इस विषय पर ध्यान खिंचा इसके लिए आपका आभार  
   
 

पुष्यमित्र [pushymitr@gmail.com] - 2012-08-03 12:40:53

 
  बालिग होने से पहले अनुकम्पा नियुक्ति के प्रावधान नहीं होना चाहिए. बदले में पारिवारिक पेंशन दिया जाना चाहिए, जैसा दूसरे इलाकों में होता है. 
   
 

anand [anant7akash@gmail.com] jaipur - 2012-08-02 15:28:10

 
  बाल श्रम कानून कहां है? 
   
 

मनोज् शर्मा [] जम्मू - 2012-08-02 06:39:23

 
  बेहद चौंकाने वाली स्टोरी है ! 
   
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