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तेल युद्ध कर्जा ईराक और अमरीका

मुद्दा

 

तेल युद्ध कर्जा ईराक और अमरीका

जे के कर

ईराक


अमरीकी सेना की आखिरी टुकड़ी भी ईराक से वापस लौट आयी है. जमीन के नीचे स्थित तेल के अकूत भंडार पर अमरीकी तथा ब्रिटेन की तेल कंपनियों का आधिपत्य स्थापित कर जमीन के ऊपर उनका विरोध करने वाला का खात्मा कर, वे वापस लौट चले. ईराकी राजनैतिक व्यवस्था जिसने अमरीकी तेल कंपनियों को देश से बाहर खदेड़ दिया था; को नेस्तनाबूद कर लोकतंत्र की रक्षक अमरीकी सेना अपने वतन वापस लौट चली.

सवाल यह उठता है कि इस युद्ध से किसने पाया और किसने खोया? इस युद्ध का खर्चा किसने उठाया ? किसे जन हानि हुईं? यदि आप गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि दीवाल पर लिखा है- अमरीकी प्रशासन ने अमरीकी कर दाताओं के पैसे से ईराक पर कब्जा जमाया एवं अमरीकी तेल कंपनियों को फायदा पहुचाया. ये खरबों डालर आम अमरीकी जनता की गाढी कमाई से आया है लेकिन इनका युद्ध में निवेश कर तेल कंपनियां खरबों डालर कमा रही हैं.

1972 में ईराक ने सभी तेल के कुओं का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. जिसने अमरीका सहित ब्रिटेन की तेल कंपनियों को देश के बाहर खदेड़ दिया. इससे पहले इनका तीन चौथाई तेल पर कब्जा था. 80 एवं 90 के दशक मे ईराक ने फ्रांस, रुस, जापान एवं चीन की कंपनियो को तेल निकालने की अनुमति दी. इसके पश्चात ही अमरीकी तेल कंपनियो ने तेल का खेल प्रारंभ कर दिया. एक बिना नियमों का खेल. जिसके नियम वह स्वयं तय करता है और जिसमें खेलने वाले हर खिलाड़ी की हार निश्यित है तथा ताकतवर की जीत पहले से ही घोषित है. इस खेल में संयुक्त राष्ट्र संघ को भी मोहरा बनाया गया.

फ्रांस, रुस, जापान तथा चीन को प्रतियोगिता से बाहर करने के लिये अमरीका के दबाव में तथा ब्रिटेन के सहयोग से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन 1990 में ईराक पर प्रतिबंध लगा दिया गया. यह प्रतिबंध 2003 में ईराक पर कब्जे के पश्चात ही उठाया गया ताकि शेर अपना हिस्सा झपट सके.

सऊदी अरब के ईराक में तेल का उच्च कोटि का दूसरा सबसे बड़ा भंडार है. ईराकी तेल निकाल कर बेचना भी अत्यंत लाभकारी है. एक अनुमान के अनुसार ईराक में 112 बिलियन बैरल तेल का सुरक्षित भंडार है. लेकिन अमरीकी ऊर्जा विभाग के अनुसार यह 300 से 400 बिलियन बैरल का है. लीजिये अब अमरीकी ऊर्जा मंत्रालय भी अपने मालिक की सेवा में उतर आया.

22 मई 2002 को ईराक के वरिष्ठ उप तेल मंत्री ने एक साक्षात्कार में बताया कि यदि तेल के सभी भंडारो का दोहन किया जाये तो करीब 300 बिलियन बैरल तेल मिलेगा. 2002 में ईराकी कुओं से तेल निकालने पर प्रति बैरल केवल 1 अमरीकी डालर का खर्च आता था. यदि इन तेलों को निकाला जाए तथा 40 प्रतिशत की रायल्टी भी दी जाये तो प्रतिवर्ष ईराक 80 से 90 बिलियन अमरीका डालर कमा सकता है. यदि कोई कंपनी दशकों तक इनका व्यापार करे तो वह 4 से 5 ट्रिलियन (खरब) डालर कमा सकता है.

यही कारण है कि 1998 में जब बिल क्लिंटन अमरीका के राष्ट्रपति थे, तेल कंपनियों ने अपनी लॉबिंग शुरू कर दी. अब उनके निशाने पर थे सद्दाम हुसैन, जो मुनाफाखोरी के मार्ग के सबसे बड़े रोड़ा थे. 2001 में जार्ज डब्लू बुश के अमरीकी राष्ट्रपति बनते ही तेल के खेल में तेजी आयी. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की पहली बैठक में ही ईराक पर हमले की तैयारी शुरू कर दी गई. यह हम नहीं कह रहे है वरन् तत्कालीन अमरीकी ट्रेजरी सचिव पाल ओ नील ने इसका राज खोला है. आखिरकार मार्च 2003 में ईराक पर हमले शुरू कर दिये गये.

अमरीका फौजे अपने सहयोगियों के साय ईराक में बलात प्रवेश कर गईं. तुरंत ही तेल के कुओं तथा शोधन कारखानों पर कब्जा कर लिया गया. तेल मंत्रालय को छोड़कर शहर के कई हिस्सों को आग के हवाले कर दिया गया. बल्कि तेल मंत्रालय की सुरक्षा कड़ी कर दी गई ताकि भविष्य के व्यापार में कोई अड़चन न आये. 22 मई 2003 को राष्ट्रपति बुश ने पूर्व अमरीका तेल कंपनी के उच्चधिकारी फिल कैरोल को तेल पर कब्जे के लिये अधिकृत कर दिया तथा इसी दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ ने ईराक पर लगे प्रतिबंध को उठा दिया. इसके बाद यह कहने-बताने की ज़रुरत नहीं है कि यह युद्ध असल में तेल पर कब्जे के लिये ही लड़ा गया था.

2003 में अमरीकी तेल कंपनी एक्शोन मोबिल का व्यापार 247 बिलियन डालर का हुआ. जो कि विश्व प्रसिद्ध कंपनी वाल्ट डिज्नी तथा कोका-कोला से कई गुना ज्यादा था. यहां पर इस बात का उल्लेख करना नाजायज नहीं होगा कि अमरीकी सरकार तेल कंपनियों को कई छूटें देती हैं. जिसमें तेल रिक्तीकरण भत्ता, अमूर्त खुदाई लागत शामिल है. इसके अलावा तेल कंपनियों द्वारा विदेशों में टैक्स भरने पर अपने देश मे टैक्स में छूट दी जाती है. अमरीकी महाकाय तेल कंपनी एक्शोन मोबिल ने इन वर्षो में अकूत मुनाफा कमाया. हम पहले ही बता चुके हैं कि ईराक में तेल बहुतायत में उपलब्ध है तथा यदि इनका 80 प्रतिशत भी निकाला जाये तो तेल कंपनियो को 30 खबर डालर का मुनाफा होगा.

तेल के इस खेल में अमरीका ने जो युद्ध का आडंबर खड़ा किया, उसमें अमरीकी खर्चे के आंकड़ों को देखना-जानना भी दिलचस्प है. अमरीकी कांग्रेस में की गई एक रिपोर्टिंग के अनुसार ईराक युद्ध में अमरीका ने प्रतिदिन 430 मिलियन डालर का खर्च किया. अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के अनुसार प्रतिमाह 9.5 बिलियन डालर का खर्च हुआ. जबकि अर्थशास्त्रियो के अनुसार यह खर्च 25 बिलियन डालर प्रतिमाह का हुआ.

अमरीका के ही ब्राउन यूनिर्वसिटी के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने स्वयं 757.8 बिलियन डालर खर्च किये लेकिन पुनर्वास तथा ब्याज के खर्चों तथा नष्ट हुए हथियारों तथा वाहनों पर करीब अलग से एक खरब डालर खर्च हुए. विश्व बैंक के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार तथा नोबल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टीगलिज के अनुसार ईराक युद्ध से अमरीकी अर्थव्यवस्था पर 3 खरब डालर का अतिरिक्त बोझ पड़ा.

ये सभी खर्चे अमरीका सरकार ने किये जनता द्वारा भरे गये टैक्स के पैसों से, जनसंहार तथा रसायनिक हथियारों की खोज के नाम पर. उन्हें जमीन के ऊपर कुछ नहीं मिला, जिसका ढोल पीटा जा रहा था. मिला जमीन के नीचे का तेल, वह भी तेल कंपनियो को. यह है इस अमरीकी व्यवस्था, अमरीकी लोकतंत्र, अमरीकी जनतंत्र का असली चेहरा.

आज अमरीका का कुल राष्ट्रीय कर्ज 15 खरब डालर के बराबर है. यदि अमरीका प्रतिदिन एक मिलियन डालर का कर्ज भी चुकता करे तो उसे 2600 साल लगेंगे इसे चुकता करने में. अमरीका के ही राजकोषीय उत्तरदायित्व और सुधार पर राष्ट्रीय आयोग की गणना के अनुसार अमरीका को 2020 में प्रतिवर्ष 1 खरब डालर केवल सूद के रूप में ही चुकाने पड़ेंगे.

युद्ध तथा अन्य गैर जरूरी खर्चों ने अमरीका को विश्व का सबसे बड़ा कर्जदार बना दिया है. उसकी पूरी अर्थव्यवस्था कर्ज पर आधारित है. इस कारण दिन-प्रतिदिन नागरिकों को दी जाने वाली पेंशन तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को कम किया जा रहा है. उन पर टैक्स बढ़ाया जा रहा है. दूसरी तरफ नैगम घराने दिन प्रतिदिन और अमीर होते जा रहे हैं. यदि चन्द्रमा या मंगल ग्रह पर तेल मिल जाये तो ये कंपनिया वहां भी जनता के खर्च पर मुनाफा कमाने के लिये पहुंच जाएंगी. मुनाफा कमाने वाली तेल कंपनियों और अमरीकी सरकार ने जो कहर ढाया है, उसका शिकार ईराक हुआ और उसे अब अमरीका की जनता को भी चुकाना है.

03.08.2012, 20.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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