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डायन कोसी

रिपोर्ताज़

 

डायन कोसी

फणीश्वरनाथ रेणु

रेणु रिपोर्ट


फणीश्वरनाथ रेणु की 60 साल पहले लिखी गई यह रिपोर्ताज कोसी और बाढ़ के कई पहलू को समझने में मदद करती है.
हिमालय की किसी चोटी की बर्फ पिघली या किसी तराई में घनघोर वर्षा हुई और कोसी की निर्मल धारा में गंदले पानी की हल्की रेखा छा गई. ‘कोसी मैया’ का मन मैला हो गया. कोसी के किनारे रहने वाले इंसान ‘मैया’ के मन की बात नहीं समझते, लेकिन कोसी के किनारे चरने वाले जानवर पानी पीने के समय सब कुछ सूंघ लेते हैं. नथुने फुला कर वे सूंघते, ‘फों-फों’ करते और मानो किसी डरावनी छाया को देख कर पूंछ उठाकर भाग खड़े होते. चरवाहे हैरान होते. फिर एक नंग-धड़ग लड़का पानी की परीक्षा करके घोषणा कर देता -‘गेरुआ पानी !’

‘गेरुआ पानी ?’

मूक पशुओं की आंखों में भयानक भविष्य की तस्वीर उतर आती है.

गेरुआ पानी. खतरे की घंटी. धुंधला भविष्य. मौत की छाया.

आस-पास के गाँवों से दिन-रात लकड़ी और बांस काटने की आवाजें आतीं. घर-घर में खूंटे गड़ते, मचान बनते और घर की पुरानी ‘टाटियों’ की मरम्मत होने लगती, मानो किसी अखिल भारतीय संस्था के कॉन्फ्रेंस की तैयारी हो रही हो.

गेरुआ पानी ! गर्भवती औरतों के लिए मौत का पैगाम ! कोसी मैया गर्भवती औरतों को बर्दाश्त नहीं करती, पहले वेग में गर्भवतियों को ही समेटती है. हालांकि सैकड़ों निन्यानबे कोखें उन्हीं की मनौती के बाद भरती हैं. इसलिए ‘मैया’ के कोप को शांत करने के लिए इलाके के ‘सिद्ध ओझा, प्रसिद्ध गुणी’ चक्र सजा कर दिन-रात मंत्र जाप करते हैं. धूप-दीप, अड़हुल के फूल, सामने सजा हुआ ‘चक्र’, चक्र के चारों ओर बैठी हुई पीली-पीली गर्भवतियां. भक्तमंडली झांझ-मृदंग बजा कर गाती, ‘पहले बंदनियां बंदौ तोहरी चरनवां हे ! कोसी मैया !’

प्राइमरी स्कूल के पंडितजी पत्रकारिता का परिचय देते हैं. इस बार उनके संवाद को अवश्य स्थान मिलेगा, संपादकजी ! कोसी अंचल की त्रस्त जनता की पुकार. भीषण बाढ़ की आशंका. सरकार शीघ्र ध्यान दे.

लेकिन जानवरों का नथुना फुला कर फों-फों करना, नंग-धड़ंग चरवाहे की घोषणा, सिद्ध ओझा जी का चक्र-पूजन और पंडितजी के भीषण त्रस्त आशंकापूर्ण संवाद का कोई शुभ फल नहीं निकलता. न कोसी का कोप शांत होता और न अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर मोटी सुर्खियां ही लगतीं. और कोसी मैया के मन का मैल बढ़ता ही जाता. सबसे पहले किनारे का ठूंठा बबूल, फिर झरबेर की झाड़ी पानी में डूब जाती. इठलाती हुई लहरें खेतों और खलिहानों में खेलने लग जातीं. युगों से किनारे पर खड़ा ‘पुराना पीपल’ पानी मापता. कुदरती मीटर. लोग ताज्जुब करते हैं, पिछले साल दोनों ओर के कछार कट कर पानी में गिर गए, बूढ़ा बरगद और इमली के तीनों पेड़ कट कर बह गए, मगर पुराना पीपल आज भी खड़ा है. पुराना पीपल पहले भुताहा समझा जाता था. भुताहा, जिसकी डाल-डाल पर भूतों का बसेरा था, जिसके पत्ते-पत्ते पर प्रेतनियां नाचती थीं. अब यह ‘देवहा’ समझा जाता है. कोसी मैया भी जिसे नष्ट नहीं कर सकी. इसलिए पुराने पीपल के पत्तों पर मंत्र लिखकर ओझाजी ने जंत्र बना कर गाँव में बांट दिया है.

रात के सन्नाटे में छिन्नमस्ता कोसी अपने असली रूप में गरजती हुई आती हैं. आ गई .... मैया आ गई. जय, कोसी महारानी की जय .... विक्षुब्ध उत्ताल तरंगों और लहरों का तांडव नृत्य ..., मैया की जय-जयकार हाहाकार में बदल जाती है. इंसान, पशु, पक्षियों का सह रुदन. कोसी की गड़गड़ाहट, डूबते और बहते हुए प्राणियों की दर्द भरी पुकार रफ्ता-रफ्ता तेज होती जाती है मगर आसमान बच्चों का बैलून नहीं जो यूं ही बात-बात में फट जाए. सुबह को पुराने पीपल की फुनगी पर बैठा हुआ ‘राजगिद्ध’ अपनी व्यापक दृश्टि से देखता है और पैमाइश करता है. पानी ... पानी ... पानी. ओर, इस बार तो सबसे ऊँचा गांव बलुआटोली भी डूब गया. उंह. पीपल की फुनगी पर बैठ कर जल के फैलाव का अंदाज लगाना असंभव. राजगिद्ध पंखों को तौल कर उड़ता है. चक्कर काटता हुआ आसमान में बहुत दूर चला जाता है, फिर चक्कर काटने लगता है, मानो कोई रिपोर्टर कोसी की विभीषिका का आँखों देखा हाल ब्रॉडकास्ट करने के लिए हवाई जहाज में उड़ रहा है. पानी... पानी ..... जहां तक निगाहें जाती हैं, पानी ही पानी. हम अभी सहरसा जिले के उत्तरी छोर पर उड़ रहे हैं. नीचे धरती पर कहीं भी हरियाली नजर नहीं आती. हां वह धब्बा.. धब्बा नहीं ... आम का बाग है जो यहां से ‘चिड़िया का नहला’ सा मालूम होता है. हम और नीचे जा रहे हैं ... और नीचे ... पेड़ों पर भी लोग लदे-फदे नजर आ रहे हैं. कुछ किश्तियां ... शायद रिलीफ की हैं.. और वहां रेंगता हुआ क्या आगे बढ़ रहा है ... अजगर... नहीं, पानी बढ़ रहा है ... हां ... पानी ही है ... बांध पर लोगों को बड़ा भरोसा था शायद. अभी गांव में भगदड़ मची हुई है ... सांप को देखकर चिड़ियों की जो हालत होती हैं ... सुखसर नदी का पानी अब गांवों में घुस रहा है ... वह डूबा .. गांव.... हरे भरे खेत सफेद हो गए... अब हम पूर्णिया और सहरसा जिले के बॉर्डर पर हैं ... पानी-पानी-पानी... बहते हुए झोंपड़े... और वह ?... शायद लाशें हैं... तो अब मुर्दे फूल कर पानी पर तैरने लगे...!
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

surya [] chicago - 2012-10-01 04:30:09

 
  What a wonderful,truthful article. Not only feels sorry for these affected people, but also opens eyes to natural calamities which comes every year. Great work Renu ji. 
   
 

pradeep [pradeeptshama@rediffmail.com] bilaspur - 2012-08-06 08:00:09

 
  great reporting ... A reporting of several centuries ...may be called a piece of literature..
 
   
 

neha markand [neha_2282113@yahoo.co.in] nagpur - 2012-08-04 22:11:07

 
  रेणु जी ने क्या लिखा है.... क्या हिम्मत है अंतिम शब्द- डायन. रेणु जी ने दुखी लोगों को जुबान दी. 
   
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