राजनीति में ओलंपिक और..
बाईलाइन
राजनीति में ओलंपिक और..
एम जे
अकबर
लोग काफी अरसे से समाचार और मनोरंजन के बीच खत्म हो रहे
फासले की शिकायत करते रहे हैं. ऐसी बातें भ्रम के कारण उभरी हैं. समाचार राजनीति का
पर्यायवाची नहीं है. यह केवल किसी चीज के बारे में नयी जानकारी होती है, जिसे जानने
के लिए हम उत्सुक रहते हैं- सच्चाई यह है कि लोग ऐसी चीजों के प्रति उत्सुक रहते
हैं, जो उन्हें खुशी देती है. राजनीतिक झगड़े के बजाय यह फैशन से लेकर काल्पनिक
कहानी हो सकती है. लेकिन राजनीतिक कहानी हमेशा इस अंश को पाटने का काम करती है,
क्योंकि यह सहज तौर पर मनोरंजक होती है.इसके लिए सिर्फ आपको रुकना और सोचना होता
है. कभी-कभार सनसनीखेज खबर और व्यंग्य के बीच काफी बारीक फासला होता है.
उदाहरण के तौर पर, इन दिनों आंध्र में ऐसी खबरें तैर रही हैं कि कांग्रेस अपने सबसे
बड़े आलोचक पूर्व सीएम राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन को सीएम पद का वादा कर वापस
अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. जगन ने कांग्रेस के पैर के नीचे से आधार
खिसका दिया है, वे फिलहाल जेल में लेखन कार्य कर रहे हैं.
सीबीआइ ने जगन के खिलाफ सभी प्रकार के आर्थिक अपराध सामने लाने की कोशिश की है. ऐसे
में अगर यह कहानी कभी सही हुई तो कांग्रेस आंध्र के मतदाताओं को क्या कहेगी- लोगों,
इस लड़के को हमने जेल भेजा, क्योंकि हम जानते थे कि इसके पिता ने बेहिसाब पैसा
कमाया. हमें इसकी जानकारी कैसे मिली? क्योंकि यह पैसा इसने तब कमाया जब यह हमारे
बीच था, अब जब जगन कांग्रेस में वापस आ गया है, तो हम आपको आश्वस्त कर सकते हैं कि
वे सभी आरोप काल्पनिक थे?
और कांग्रेस उस हठी न्यायाधीश को क्या कहेगी जिसने सीबीआइ के आग्रह पर जगन को जमानत
के कानूनी अधिकार से वंचित किया- सॉरी, माननीय न्यायाधीश?
जगन के कार्यालय पर पड़े सभी छापे पहेली के समान थे, जैसे कठिन हालात से निकालने के
लिए बच्चों के साथ थोड़ी सख्ती बरतने की जरूरत होती है. उसी प्रकार वकील, जो अदालत
में जगन के खिलाफ जोरदार दलील पेश कर रहे थे, वे कहेंगे, माननीय न्यायाधीश जानते
हैं कि जब वकीलों को लिफाफे में कुछ अधिक दे दिया जाता है तो वे क्या बन सकते हैं?
उन्होंने हमसे संक्षिप्त सूचना लेकर इसे बड़ा मामला बना दिया. हा हा हा!
आह..! मजाक. ऐसा नहीं है कि कुछ राजनेता इसे पत्रकारों के कानों में पहुंचा देंगे,
लेकिन यह बिना सवालों के प्रचारित किया जा रहा है. पहला स्पष्ट तौर पर जाहिर है कि
क्या इस प्रकार की सौदेबाजी राजनीतिक तौर पर तर्कसंगत है? क्या वोटर जिसने दोनों
पक्षों की ओर से उग्र भाषण सुना है, इसे स्वीकार करेगा?
इस बारे में जगन की मां का क्या कहना है, अपने पिता की दुखद मौत के बाद जगन कम उम्र
में ही सीएम बनना चाहते थे. उनकी बात नहीं मानी गयी. वे इस पेशकश को स्वीकार कर
सकते थे, जब उनके बदले एक अनजान और नौसिखिये किरण रेड्डी को सीएम बना दिया गया.
लेकिन कांग्रेस हाइकमान ने जगन को निजी और राजनीतिक तौर पर दबाने के लिए अत्यधिक
कठोर तरीके अपना कर खुद के विकल्प को समाप्त कर दिया. यह प्रयास बुरी तरह असफल रहा.
आंध्र में कांग्रेस के पास बीता हुआ कल है और जगन के पास भविष्य है. फिर जगन बीते
हुए कल के साथ क्यों जायेंगे?
विडंबना है कि जहां भारतीय राजनीति मनोरंजन की ओर बढ़ रही है, वहीं भारतीय खेल, जो
राष्ट्र उत्थान कर सकते हैं, पूरी तरह से दबाव में है. ओलिंपिक में कांस्य पदक या
रजत पदक की जीत की खुशी किसी को शर्मिदा नहीं करती. भारत में खेल की गरीबी से सभी
वाकिफ हैं. भारत की बौद्धिक शक्ति वित्तीय रास्ते के सहारे आगे बढ़ने पर ध्यान
केंद्रित करती है, न कि शारीरिक प्रतिभा के सहारे.
एक खेल क्रिकेट, जिसमें हम अस्थिर क्षमता के साथ प्रतियोगिता करते हैं, उससे अगर
पैसा अलग कर दिया जाये तो वहां भी बुलबुला फूट जायेगा. अन्य खेलों में भी पुरस्कार
हैं, लेकिन शरीरिक असुविधा की कीमत बहुत अधिक है, और यही सोच हमारे युवाओं को असहज
बना देती है. अगर हमें आगे बढ़ना है तो हमें मोटे और पतले दोनों लड़कों के डांस पर
डांस करना चाहिए. लेकिन चीनी जिमनास्ट डांग डांग की अद्वितीय प्रतिभा तक पहुंचने के
लिए भारतीयों को लंबा वक्त लगेगा.
दूसरे भारतीयों की तरह मैं भी भारतीयों के अधिक से अधिक मेडल जीतने के बारे में
सोचता हूं, लेकिन जब हम बैडमिंटन या तीरंदाजी में हार जाते हैं, तो मुझे निराशा
नहीं होती है. लेकिन पेट में गुदगुदाहट तब होती है, जब नसीब से हमें मुंगफली के
समान मेडल मिलता है और हम खुशी से झूम उठते हैं. एक जापानी खिलाड़ी जिमनास्टिक
प्रतिस्पर्धा में कांस्य पदक जीत कर संतुष्ट नहीं थी. वह रो रही थी.
अगर हम भारतीय कांस्य पदक जीत लें, तो कॉरपोरेशन अगले दिन उसके सम्मान में पहले पेज
पर विज्ञापन प्रकाशित कर देता है. कोई भी भारतीयों को उस प्रकार धन्यवाद नहीं देता,
जैसा की भारतीय खुद को देते हैं. यह रोग है.
कोई ओलिंपिक देखता है और मैं राजनीति की खोज करता हूं. एक नजर राजनीति पर डालने के
बाद मैं ओलिंपिक की ओर मुड़ जाता हूं.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के
संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
05.08.2012, 13.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित