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कोकराझाड़ के सवाल-जवाब

बहस

 

कोकराझाड़ के सवाल-जवाब

विनोद रिंगानिया

कोकराझाड़


असम अब दिल्ली से दूर नहीं रहा. अब तक जो मानसिक दूरी थी, वह लगता है खत्म होती जा रही है. यह बात पिछली दो घटनाओं से प्रमाणित हो गई. एक तो जीएस रोड कांड की अनुगूंज जिस तरह सारे देश में सुनाई दी उससे एक बार तो असम के लोग भौचक्के रह गए. आदत से मजबूर कुछ लोगों ने इसमें भी साजिश खोजने की कोशिश की. ऐसे लोगों ने अब तक सोशल नेटवर्किंग, यू ट्यूब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के द्वारा लाए गए परिवर्तन को आत्मसात नहीं किया है. दिल्ली का पत्रकार जब असम के बारे में बोलता है तो ऐसे लोगों को अटपटा लगता है. अभी आदत नहीं हुई है.

दूसरी घटना है- कोकराझाड़ की हिंसा. यह घटना तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंजी है. कोई यह सोचता है कि मरने वालों की संख्या के कारण मीडिया का ध्यान आकृष्ट हुआ है तो वह गलत है. क्योंकि बोड़ो इलाके में समय-समय पर हिंसा भड़कती रहती है. सबसे ताजा हिंसा 2008 में भड़की थी, तब अभी की तुलना में कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे. लेकिन राष्ट्रीय मीडिया ने इसका नोटिस ही नहीं लिया था. इन चार सालों में ऐसा क्या बदल गया है कि असम की घटनाओं पर मीडिया का पयाप्त ध्यान जाने लगा है. हमें लगता है कि यह इंटरनेट के प्रभाव के कारण है, हालांकि इस पर और अधिक चिंतन की गुंजाइश है.

जब बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन चला था, (1979 से 1985 तक, इसे असम आंदोलन कहा गया), तो आंदोलन के नेताओं को इस बात पर कोफ्त होती थी कि इतने बड़े-व्यापक आंदोलन के बारे में, असम के बाहर कोई जानता तक नहीं. पिछले साल अन्ना के आंदोलन को जो जनसमर्थन मिला था उससे कई गुना ज्यादा समर्थन उस आंदोलन को मिला था. तब आंदोलन के नेताओं ने छोटी-छोटी टीमें बनाईं, जिनमें हिंदी और अंग्रेजी जानने वाले लोगों को रखा गया. इन टीमों का काम था राज्य के बाहर जाकर पत्रकारों से बातचीत कर उन्हें असम में होने वाली बांग्लादेशी घुसपैठ के बारे में बताना, तथा यह भी साफ करना कि असम आंदोलन अन्य राज्यों से आए भारतवासियों के खिलाफ नहीं है.

एक तरह से असम से बाहर असम के बारे में फैले अज्ञान के कारण भी असम के लोगों में यह भावना भर गई कि हमें तो कोई पूछता ही नहीं. जो भी हो, हम इस तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जिस बांग्लादेशी घुसपैठ पर असमवासियों ने बाकी देशवासियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इतनी ज्यादा मेहनत की थी, वह मुद्दा इस बार कोकराझाड़ की हिंसा के बाद एकाएक चर्चा का विषय बन गया.

राष्ट्रीय मीडिया पर बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर आज भी चर्चा हो रही है, लेकिन इस चर्चा में गहराई नहीं है. ज्यादातर यह चर्चा मुस्लिम विद्वेष से ग्रसित है. कहीं अति सरलीकरण की शिकार है. बोड़ो नेता काफी हद तक मीडिया से इस मायने में फायदा उठाने में कामयाब रहे कि उन्होंने ताजा हिंसा को बांग्लादेशी बनाम बोड़ो हिंसा का जामा पहना दिया और ज्यादातर लोग इसे इसी नजरिए से देखने लग गए. राज्य से बाहर के लोग सोचते हैं कि बांग्लादेश से लोग सीमा पार कर आ रहे हैं और बोड़ो इलाकों में बस रहे हैं, इसके कारण वहां लोगों में गुस्सा और असंतोष फैल रहा था, जो 21 जुलाई से शुरू हुई हिंसा का कारण बना.

जबकि उन लोगों को पता नहीं है कि इससे पहले संथाल लोगों को भी इसी तरह बोड़ो इलाकों से भगाया गया था. उन पर तो बांग्लादेशी घुसपैठिया होने का ठप्पा नहीं लगा था. कोकराझाड़ की हिंसा को बोड़ो बनाम बांग्लादेशी का रूप देकर बोड़ो नेतृत्व एक तरह से हिंसा को वैधता प्रदान करने में कामयाब हो गया है.

कोकराझाड़ हिंसा के कारण ही सही जब बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है तो हमें इस अवसर का लाभ उठाते हुए इस पर सुचिंतित तरीके से विचार-विमर्श करना चाहिए और देखना चाहिए कि इसके क्या-क्या संभावित समाधान हो सकते हैं.

1.विदेशी घुसपैठियों की पहचान की जाए, उन्हें वापस सीमा के पार भेजा जाए, इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि नए आने वाले घुसपैठियों को रोका जाए. इसके लिए कोई नया चिंतन, नई बातचीत करने की जरूरत नहीं है. सभी पक्षों के बीच सहमति है कि सीमा पर बाड़ का काम पूरा होना चाहिए. बाड़ लगाने का ज्यादातर काम पूरा हो चुका है और थोड़ा-सा ही काम बचा है. भारत में सरकारी काम किस तरह होता है, उसका एक नमूना है सीमा को सील करने का यह काम.

कुछ मित्र बाड़ लगाने के काम के महत्व को यह कहकर कम करना चाहते हैं कि एक दस रुपए के कटर से आप बाड़ काटकर अंदर प्रवेश कर सकते हैं. लेकिन यह सही तर्क नहीं है. हर बाड़ को काटा जा सकता है, हर दीवार में सेंध लगाई जा सकती है, लेकिन फिर भी बाड़ और दीवार के बिना किसी इलाके की चौकीदारी करना और बाड़ या दीवार से घिरे इलाके की चौकीदारी करने में अंतर है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नागेन्द्र शर्मा [nagendra.ghy@gmail.com] गुवाहाटी - 2012-09-05 20:29:59

 
  दैनिक पूर्वोदय (गुवाहाटी,असम से प्रकाशित) के संपादन विभाग मे सलाहकार संपादक के पद पर कार्यरत श्री विनोद रिंगानिया असम सहित पूरे पूर्वोत्तर राज्यों के हर घटना क्रम पर गरुड़-चक्षु रखते हैं। उनकी रचनाओं को प्रकाशित कर देश का ध्यान इन राज्यों की ओर आकर्षित करने की दिशा मे रविवार एक बड़ी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। असम की समस्याओं को समझने के संदर्भ मे रिंगानियां के लेखन से अन्य कोई कारगर दस्तावेज शायद ही कहीं उपलब्ध हो, कम से कम हिन्दी मे। हम असम वासियों की ओर से रविवार को धन्यवाद।  
   
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