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लेकिन जिम्मेदार चंद्रमोहन है...

बहस

 

लेकिन जिम्मेदार चंद्रमोहन है...

मनीषा भल्ला

अनुराधा बाली चंद्रमोहन


फिजा ऊर्फ अनुराधा बाली की मौत से एक प्रेम कहानी का अंत हो गया. एक ऐसी प्रेम कहानी, जो दर्दनाक कहानी ही थी, उसमें प्रेम नहीं था. फिजा ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई जो भी हुआ, इसके जिम्मेदार उनके पूर्व प्रेमी और पति हरियाणा के उपमुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन ऊर्फ चांद मोहम्मद ही हैं. फिजा की उसके मोहाली वाले घर में चार दिन पुरानी सड़ी हुई लाश बताती है कि चांद मोहम्मद जैसे नेताओं के झांसे में आने का नतीजा यही होता है. हमेशा की तरह फिजा की मौत को भी मीडिया ने तमाशे की तरह दिखाया लेकिन किसी ने चंद्रमोहन से सवाल तक नहीं किया. कभी भी सवालों की कटार चंद्रमोहन पर नहीं चलाई गई.

चांद मोहम्मद हरियाणा के कद्दावर नेता रहे भजनलाल के बड़े बेटे हैं. वर्ष 2008 में वह अचानक गायब हो गए. सामने आए तो वह चांद मोहम्मद बन चुके थे. पत्नी सीमा और दो बच्चों के होते हुए उन्होंने हरियाणा की असिस्टेंट एडवोकेट जनरल अनुराधा बाली से निकाह कर लिया. धर्म परिवर्तन कर वह चंद्रमोहन से चांद मोहम्मद हो गए और अनुराधा बाली फिजा हो गईं.

मात्र 40 दिन बाद अचानक चांद मोहम्मद दोबारा गायब हो गए. उन्हें अपनी पहली पत्नी सीमा की याद सताने लगी. लंदन जाकर चांद मोहम्मद ने फिजा को फोन पर तीन दफा तलाक कह पल्ला झाड़ दिया. चांद मोहम्मद के प्यार में पागल फिजा ने उसके खिलाफ कई प्रेस कॉन्फ्रेंस की. वह सड़कों पर पागलाना हरकतें करने लगी. कभी वह पार्क में खेल रहे बच्चों की पिटाई कर देती तो कभी अपनी मांग में सिंदूर भरकर कहती कि उसने भारत से शादी कर ली है.

फिजा मीडिया के सामने रोई, आंसू भी बहाए कि चांद मोहम्मद उसे छोड़ कर चला गया है. लेकिन मीडिया ने कभी भी चांद मोहम्मद को कटघरे मे खड़ा नहीं किया. धर्म से धंधे पर उतारू मीडिया ने हमेशा फिजा का मखौल उड़ाया.

फिजा मीडिया के लिए एक तमाशा थी. तमाशे की ही तरह उसे टीवी पर पेश किया जाता. लेकिन उसके अंदर रिस रहे उस जख्म को देखा ही नहीं जो चांद मोहम्मद ने उसे दिए थे. फिजा अपने को ठगा और छला महसूस करती कि एक आदमी उसे खा-पीकर अपना उल्लू सीधा करके चलता बना और वह कुछ भी नहीं कर सकी. चांद मोहम्मद तो गंगाजल से नहाकर दोबारा चंद्रमोहन बन गया और लेकिन फिजा का क्या हुआ ??

चांद मोहम्मद ने तो धर्म को भी तमाशा बना दिया. जब चाहा मुस्लिम बन किसी से निकाह कर लिया, जब चाहे तीन दफा तलाक कह दिया. जब चाहा गंगाजल से नहाकर पहली पत्नी के पास चले गए. जब-जब फिजा मीडिया के सामने रोई किसी पत्रकार ने चांद मोहम्मद को दोषी नहीं ठहराया. बीते महीने पड़ोस के बच्चों की पिटाई करने पर उसके पड़ोसियों ने उसे इतनी बुरी तरह पीटा की उसके सिर का ऑपरेशन तक करना पड़ा. कुछ महीने पहले अपनी मां की मौत के बाद वह बहुत ज्यादा डिप्रेशन में चली गई थी.

फिजा भजनलाल परिवार के खिलाफ चुनावी मैदान में भी उतरी. उसने अपनी राजनीतिक पार्टी तक बनाई. चांद मोहम्मद ने फिजा से कभी प्यार किया ही नहीं था. उसने फिजा से निकाह क्यों किया इसके कई कारण बताए जाते हैं. फिजा भजनलाल परिवार की राजनीतिक तरक्की में हमेशा के लिए एक बाधा थी. आने वाले चुनावों में भी वह इस परिवार के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने वाली थी.

उधर हरियाणा में भजनलाल के छोटे बेटे और उनकी राजनीतिक विरासत के मालिक कुलदीप बिश्नोई तेजी से हरियाणा में अपनी खोई राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. चंद्रमोहन भी अब छोटे भाई कुलदीप के साथ उनकी पार्टी में आ गए हैं. फिजा इस परिवार के राजनीतिक लक्ष्यों की बड़ी रुकावट थी. हमेशा के लिए. जिसका राजनैतिक कारणों की वजह से खत्म होना भजनलाल परिवार के पक्ष में है.

काफी हद तक फिजा भी अपनी इस हालत के ले जिम्मेदार है. महत्वकांक्षाओं की उड़ान उसे उसकी मौत तक ले गई. कहते हैं भगवान ने औरतों को एक तीसरी दृष्टि दी है, जिससे उसे सामने वाले की नीयत का पता लग जाता है. लेकिन वकील साहिबा फिजा, चांद मोहम्मद की नीयत नहीं पहचान पाई और दलदल में धंसती चली गई. चांद मोहम्मद द्वारा छोड़े जाने के बाद पागल हो चुकी फिजा की कहानी का अंत उसकी मौत से हुआ.

एयरहोस्टेस गीतिका शर्मा, शिवानी भटनागर, मधुमिता, शेहला मसूद, भंवरी देवी या फिर रुचिका क्यों न हो. नेताओं और बड़े अधिकारियों के फेर में पड़ने से सभी का हश्र लगभग एक जैसा ही हुआ. नेता या अधिकारी इन महिलाओं को खा-पीकर सफेद कुर्ता पहनकर चलते बनते हैं. लड़कियां नेताओं की रंगरलियों को प्रेम मान सपने संजोने लगती हैं. वहां तक चली जाती हैं, जहां से वापस आना मुमकिन नहीं होता. जब इन लड़कियों का पागलपन नेताओं या अधिकारियों के गले की फांस बन जाता है तो इनका हश्र फिजा, गीतिका, मधुमिता, शेहला मसूद जैसा ही होता है. कोई मार दी जाती है या कोई मरी पाई जाती है.

08.08.2012, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Satyendra singh [] Bareilly - 2012-08-14 20:35:34

 
  Both were equally involved , girls like Fiza never love a poor man and people like Chandramohan never commit their commitments. Both were adults , enjoyed and depart. Sad ending of a overambitious lady , who knowingly involved with a married person.  
   
 

satyabhama awasthi [satyabhama2000@yahoo.com] bilaspur - 2012-08-13 18:30:35

 
  लेख काफी अच्छा बन पड़ा है, पर पड़ताल की जरुरत ये भी है कि हम औरतों के दिमाग में शॉर्ट कट की बात कैसे और कब समां जाती है. समाज की ये सोच कि कुछ लेकर ही कुछ देना है, और वो लेना भी क्या होता है. जरुरत है स्त्री को भी इन्सान समझा जाये. उसे देह से उपर भी सोचना होगा, एक सामाजिक सोच में बदलाव लेन की जरुरत है. 
   
 

Anand Tiwari [] Chandigarh - 2012-08-11 03:18:04

 
  आपने बहुत शिद्दत से मुद्दे को उठाया है और दोनों पक्ष की बातें सामने रखी हैं. परेशानी वाली बात ये है कि हमारी पुरुष प्रधान मानसिकता फिजा को दोषी बताने के लिये अपनी एड़ी-चोटी एक किये हुए है. चंद्रमोहन ने फिजा को फांसा और फिर मंझधार में छोड़ गया, इस पर विचार करने के बजाये ये बातें हो रही हैं कि फिजा को तो पता था कि फलां-फलां-फलां....चंद्रमोहन ने क्या किया, उस पर बात करने में लोगों का ब्लड प्रेशर लो क्यों हो जाता है? याज्ञवल्क्य नामक सज्जन में धैर्य होना चाहिये कि वह कम से कम आलेख को पूरा पढ़ तो लें. लेकिन अपने पुरुष होने का उतावलापन उन्हें यह बर्दाश्त नहीं करने देता कि चंद्रमोहन को इस मामले में थोड़ा भी जिम्मेवार ठहराया जाये. 
   
 

janrdan yadav [jyadav71@gmail.com] NEW DELHI - 2012-08-10 12:06:00

 
  *देह को दयनीय बनाकर देहरी लांघती महिलाओं * का जिक्र मनीषा ने किया हैं। वो सरासर एक पक्षीय भर्त्सना करने का असफल प्रयास भर हैं। पुरुष के कुंठा का रोना शायद महिला लेखिकाओं की नियति बन कर रह गई हैं। मनीषा भी इसी की शिकार हैं,तभी तो कहीं भी अति-महत्वाकांक्षी फिजा की गलती नज़र नहीं आती।  
   
 

Arjun Sharma [journalistarjun@gmail.com] Jalandhar - 2012-08-10 07:13:59

 
  निजी जिंदगी में चंद्र मोहन आये। खुशियां लेकर आये। खुशियां तो चार दिन की आईं पर उन खुशियों के पीछे का कड़वा सच अनुराधा ने भुला दिया कि चंद्रमोहन कुंवारे नहीं बल्कि शादीशुदा व साहब-ए-औलाद हैं। उन बच्चों के हिस्से के प्रेम पर डाका डालते समय, हाथों में हाथ डाल कर कैटवाक करके टीवी वालों को मसाला देने में हीरोईन बन कर अभद्र खेल का अंजाम क्या हुआ? चांद मोहम्मद पलट गया। उसे अपनी पुरानी बीबी और असली बच्चे याद आने लगे। अब बताईये इसे क्या कहेंगे? जिसके नतीजे में मिला तनाव, डिप्रैशन,अकेलापन और कड़वाहट। इसे क्या कहेंगे? चंद्र मोहन उर्फ चांद मोहम्मद की गद्दारी या फिर अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा की कम-अक्ली जो चांद से अलग होने के बाद अपनी भूल को सुधारने के बजाए उसी भूल में जीती रही? कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो कमजोरी रही फिज़ा की। और अंत? हर किसी के मुंह से यही निकला होगा, ऐसी दर्दनाक मौत, हे ईश्वर किसी को न देना।
मात्र तीन साल की नजदीकियों में एक एअर होस्टेस एक कीमती फ्लैट और एक कीमती कार की मालकिन बन जाती है। कैसे? एक एअर होस्टेस तीन साल की नौकरी में ही कंपनी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बना दी जाती है। कैसे? जब कीमती फ्लैट और कार मिलती है? जब रुतबा मिलता है तो उसका उपयोग करते समय किए गए समझौते क्या कोई समाज को बताता है?
 
   
 

prathmesh [prathmeshmishra@indiatimes.com] bilaspur - 2012-08-09 19:23:37

 
  कौन किससे क्या संबंध रखता है ये उसका निजी मामला है परंतु इसमें अपराध होने पर अपराधी को सामाजिक और कानूनी दोनो सजा होनी चाहिए और ऐसे अपराधी अपनी हैसियत का लाभ न ले सकें इसीलिए ऐसे लोगों के लिए विशेष कोर्ट होना चाहिए. 
   
 

मनोज शर्मा [] जम्मू - 2012-08-09 06:23:13

 
  नारीवादी संगठनों को इस विषय पर counseling के लिए गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि झांसे में आने वाली अधिकांश महिलाएं समाज में कोई न कोई रूतबा रखती हैं. कोई निपट गंवारू नहीं ही होतीं ! 
   
 

Manisha Bhalla [manisha.bhalla@gmail.com] - 2012-08-08 17:17:39

 
  आप जो भी हैं आपने शायद मेरे लेख का आखिरी हिस्सा नहीं पढ़ा है। गौर से पढ़ें।  
   
 

याज्ञवल्‍क्‍य [yagnyawalky@gmail.com] सरगुजा - 2012-08-08 14:51:14

 
  मैं सहमत नही हूं, आपके कहने का लब्‍बोलुबाब यह है कि, जो किया चंद्रमोहन ने किया, और आपने अपने आलेख में एक प्रकार से घोषणा ठोक डाली है कि, अनुराधा बाली की मौत की वजह हत्‍या है। यूं भावावेश में मिसाईल दागने का क्‍या मतलब। अनुराधा बाली हो या फिर कोई और जिनके आपने जिक्र किए हैं, वे सब दूध पीती बच्‍चीयां थीं क्‍या, शॉर्टकट से उंचे जाने का खेल अक्‍सर नीचे गिराता है, दिक्‍कत क्‍या है, किस के लिए यह मर्सिया पढा जाए और क्‍यों ? 
   
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