थाली में ज़हर | देविंदर शर्मा
मुद्दा
थाली में ज़हर
देविंदर शर्मा
चूहों, बकरियों,
भेड़ों और गायों के बाद अब आपकी बारी है. अगर जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी
कामयाब रही तो कुछ ही महीनों में पहली जैव संवर्धित सब्जी बीटी बैंगन आपकी थाली में
होंगे. चाहे लेबोरेट्री चूहे हों या और बड़े स्तनपायी जीव-पशु, वे आदमी से अधिक
संवेदनशील होते हैं. उनमें संभवत: छठी इंद्रिय होती है, जिसका मानव में अभाव है.
अन्यथा लेबोरेट्री चूहे हमेशा जैव संवर्धित भोजन को ठोकर नहीं मार देते.
जब चूहों को जबरन जैव संवर्धित भोजन खिलाया जाता है तो उनके शरीर में ट्यूमर निकल
आते हैं, अंग विद्रूप हो जाते हैं, इनमें किडनी और लीवर भी शामिल हैं. इसके अलावा
वे अन्य गंभीर रोगों की गिरफ्त में आ जाते हैं.
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परंपरागत तरीके से उपजा बैंगन
बाजार से गायब होने के बाद निश्चित रूप से टाइप-2 डायबिटीज से
लड़ने का एक कारगर घरेलू उपाय खत्म हो जाएगा. |
हमने बार-बार सुना है कि जब भेड़ों को बीटी काटन के खेतों में चराया गया तो उनकी मौत
हो गई. सबसे पहले आंध्र प्रदेश से ऐसी खबरें आईं और अब उड़ीसा से. राजस्थान, मध्य
प्रदेश और हरियाणा के बहुत से किसानों ने मुझे बताया कि जब गायों को बीटी काटन के
खेतों में चरने के लिए छोड़ा गया तो उन्होंने उसे खाने से परहेज किया.
बीटी कपास या बीटी मक्का में समाहित बीटी जीन मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया,
जिसे विज्ञान की भाषा में बीटी कहा जाता है, से अलग नहीं है. यही अब बैंगन में
समाहित किया जा रहा है. यह जीन पौधे के अंदर ऐसा विषैला तत्व छोड़ता है, जो फल में
लगने वाले कीड़ों को मार डालता है.
बीटी बैंगन पर शोधरत महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी का दावा है कि जैव संवर्धित
बैंगन का उपयोग मानव के लिए सुरक्षित है. मैं कभी कंपनियों के दावों के बहकावे में
नहीं आता. कई दशक पहले हमें बताया गया था कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक
नहीं है. इसी तरह ये दावे भी खुल कर किए गए कि रासायनिक कीटनाशक पूरी तरह सुरक्षित
हैं और चीनी मानव शरीर को कतई नुकसान नहीं पहुंचाती.
खतरनाक पदार्थों को नुकसानदेह नहीं बताए जाने वाले पदार्थों की सूची बहुत लंबी है.
दशकों बाद जब ये उत्पाद विश्व भर में मानव शरीर पर घातक दुष्प्रभाव डाल चुके हैं तो
क्रमबद्ध रूप में इन्हें प्रतिबंधित किया जा रहा है. जिस प्रकार चीनी आधारित खाद्य
पदार्थ बाजार में छा गए हैं और इन सबको सुरक्षित बताया जा रहा है, उससे डायबिटीज एक
महामारी का रूप लेती नजर आ रही है और यह तेज़ गति से बढ़ रही है.
परंपरागत तरीके से उपजा बैंगन बाजार से गायब होने के बाद निश्चित रूप से टाइप-2
डायबिटीज से लड़ने का एक कारगर घरेलू उपाय खत्म हो जाएगा. मैं भी टाइप-2 डायबिटीज से
पीड़ित हूं. यह हैरत की बात है कि कोई भी वैज्ञानिक संस्थान, इसमें जीईएसी भी शामिल
है, जीएम बैंगन को मुझ जैसे लोगों के लिए नुकसानरहित बताने को क्यों राजी नहीं है?
अब तो माताओं को डायबिटीज का डर है. गर्भवती महिलाएं गैस्टेशनल डायबिटीज की गिरफ्त
में आ रही हैं. यह एक प्रकार की अस्थायी डायबिटीज है. हाल के वर्षो में पूरी तरह से
डायबिटीज की पकड़ में आने वाली महिलाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है. इनमें से
करीब 25 प्रतिशत महिलाएं 15 वर्षो में टाइप-2 डायबिटीज से त्रस्त हो जाती हैं.
सुरक्षा के जो भी दावे किए जा रहे हों, सच्चाई यह है कि अब तक ऐसे चिकित्सकीय
परीक्षण नहीं किए गए जिनसे यह पता चल पाए कि जैव संवर्धन के बाद सामान्य बैंगन के
गुणधर्मों में कोई परिवर्तन नहीं होगा.
अगर आप डायबिटीज से पीड़ित नहीं भी हैं तो भी यह न सोचें कि सुरक्षित हैं. अब तक आप
यह विश्वास करते थे कि बैंगन को अच्छी तरह धोने से नुकसानदायक कीटनाशकों के
दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे. अब यह कारगर नहीं रह जाएगा. बीटी बैंगन के आपकी
रसोई में प्रवेश करने के बाद आप इसके विषैले तत्वों को धोने में सफल नहीं रहेंगे,
क्योंकि ये तत्व तो बैंगन के अंदर समाए होंगे.
साल्क इंस्टीट्यूट आफ बायोलोजिकल स्टडीज, केलिफोर्निया के प्रो. डेव शुबर्ट की बातों
पर गौर फरमाएं- “ बीटी छिड़काव ही इस्तेमाल के लिए सुरक्षित नहीं है. फिर बीटी फसलों
में निकलने वाला विषैला तत्व बीटी छिड़काव के मुकाबले तो एक हजार गुना अधिक सघन है.”
डा. शुबर्ट की मानें तो बीटी बैंगन के पौधे और इस पर लगने वाले बैंगनों में ऐसा
विषैला तत्व होता है जो कीड़े-मकोड़े मारने वाले कीटनाशकों से भी हजार गुना घातक होता
है. क्या इससे रीढ़ की हड्डी में सिहरन नहीं दौड़ जाती?
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एक बार बीटी बैंगन के बाजार में पहुंच जाने
पर इसमें और साधारण बैंगन में अंतर करना संभव नहीं रह जाएगा. |
समस्या यह है कि एक बार बीटी बैंगन के बाजार में पहुंच जाने पर इसमें और साधारण
बैंगन में अंतर करना संभव नहीं रह जाएगा. इसके अलावा एक बार जैव प्रौद्योगिकी का
जिन्न बाहर निकल आएगा तो इसको वापस भेजने का कोई रास्ता नहीं है. हालात बदतर करने
के लिए जीईएसी ने कर्नाटक की बैंगन की प्रसिद्ध प्रजाति गुल्ला पर अनेक स्थानों पर
परीक्षण की अनुमति दे दी.
कर्नाटक के एक उत्सव' में कृष्णजी को विशेष स्वाद और अद्भुत महक वाली इस प्रजाति के
बैंगन का भोग लगाया जाता है. विडंबना यह है कि बैंगन की जिस किस्म के भौगोलिक लक्षणों
की मांग कर्नाटक सरकार ने की थी, वह किस्म अब जैविक लूट का शिकार हो गई है. जीवीके
यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर, साइंस एंड टेक्नोलाजी, बेंगलूर का प्रयास गुल्ला नस्ल
में बीटी जैव संवर्धन करना है. इस प्रकार वह परंपरागत किस्म के जैविक स्वरूप को
नष्ट कर देना चाहती है.
गुल्ला किस्म की यह अनोखी विशिष्टता स्थानीय किसान चार हजार साल से संजो रहे हैं.
कृषि जैव प्रौद्योगिकी के हाथों इसका क्षरण शुरू होने वाला है. कुछ लोग कह सकते हैं
कि बीटी बैंगन के संबंध में चिंता की क्या बात है? क्या उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने
के उपाय नहीं किए जाने चाहिए? सबसे पहले तो यह बताना जरूरी है कि बैंगन की लेशमात्र
भी कमी नहीं है. न ही बीटी बैंगन उत्पादकता और उत्पादन बढ़ाता है. बीटी बैंगन का
मकसद तो आपके खाने की मेज पर भारत का पहला जैव परिवर्तित खाद्य पदार्थ पेश करना है.
इससे पहले कि देर हो जाए, आपको जागना होगा.
05.09.2008,
02.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित