खुदरा का खतरनाक खेल
मुद्दा
खुदरा का खतरनाक खेल
जे के कर
कुछ दिनों पहले प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन के एशियाई संस्करण ने प्रधानमंत्री मनमोहन
सिंह को अंडर एचीवर के रुप में प्रस्तुत किया था. उसके कुछ दिनों बाद ही
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से खबर आई कि भारत में सत्ता का केंद्र मनमोहन
सिंह नहीं हैं. फिर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्वयं मोर्चा संभाला और
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आर्थिक सुधार जारी रखने की नसीहत दे डाली. इस तरह
मनमोहन सिंह को आर्थिक सुधार जारी रखने के लिये चने के पौधे पर चढ़ाने की कोशिश की
जा रही है, उन्हें उकसाया जा रहा है.
दूसरी तरफ एक ताजा खबर आई है कि अमरीकी खुदरा व्यापार के महाकाय वॉल मार्ट ने भारत
में बहुब्रांड खुदरा व्यवसाय को विदेशियों के लिये खोलने के लिये अमरीका में लॉबिंग
तेज़ कर दी है. अमरीकी प्रशासन को प्रभावित करने के लिये वॉल मार्ट ने डेढ़ करोड़
डालर खर्च किये हैं. अमरीका में इस प्रकार की लॉबिंग वैध है और इसे छुपाया भी नहीं
जाता है.
पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से अमरीका के नेतृत्व में मनमोहन सिंह की सरकार पर यह
दबाव डाला जा रहा है कि बहुब्रांड खुदरा व्यापार में विदेशी खिलाड़ियों को प्रवेश
की अनुमति दी जाए. लेकिन पिछले वर्ष एक बार मुंह की खाने के बाद केंद्र सरकार
फूंक-फूंक कर कदम रखना चाह रही है. संभवतः सरकार की यही मंशा यही थी कि राष्ट्रपति
और उपराष्ट्रपति का चुनाव बिना किसी झमेले के निपट जाये. अब जबकि इन दोनों पदों के
चुनाव हो चुके हैं, आशंका व्यक्त की जा रही है कि केंद्र सरकार जल्दी ही अपने पत्ते
खोलेगी. पत्ते कैसे होंगे, इस पर तो फिलहाल केवल अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन यह
तय है कि ये पत्ते भारतीय खुदरा व्यवसाय को तहस-नहस करने के लिये काफी होंगे.
भारतीय खुदरा व्यवसाय में बहु ब्रांड वाली विदेशी नैगद कंपनियों को प्रवेश की इजाजत
भारत के खुदरा व्यवसाय को ही नहीं, वरन कृषि पर भी अपना प्रभाव डालेगा. स्वयं
अमरीका में ही खुदरा क्षेत्र की महाकाय कंपनी वॉल मार्ट के कारण जनरल इलेक्ट्रकल्स
तथा लेवी स्ट्रास को अपना उत्पादन अमरीका में बंद करके अपना रुख दूसरे देशों की तरफ
करना पड़ा. इस कारण कई हज़ार कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी क्योंकि वॉल
मार्ट को सस्ते में माल चाहिये था. इसलिये जनरल इलेक्ट्रानिक्स तथा लेवी स्ट्रास को
ऐसे देशों में जाना पड़ा, जहां सस्ते में श्रम उपलब्ध है.
वॉल मार्ट दूध से बनने वाले उत्पादों को डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड तथा नार्वे से
खरीदता है, जहां भारी सब्सिडी मिलती है. वह मांस जैसी चीजें आस्ट्रेलिया, ब्राजील
तथा अर्जेंनटेनिया से खरीदता है तो कंप्यूटर तथा उसके पूर्जे चीन से और
इलेक्ट्रानिक्स के सामान ताइवान से. इसी तरह सस्ता पैंट बांगलादेश से और शर्ट चीन
से खरीदता है. यह 63 देशों के 6000 सप्लायरों से सस्ते में माल खरीद कर उसका
व्यापार करता है. एक साल में विश्व भर के वॉल मार्ट की दुकानों में 530 करोड़
ग्राहक आते हैं, जबकि विश्व की जनसंख्या 700 करोड़ है. इस आंकड़े से आप ग्राहकों पर
वॉल मार्ट की मजबूत पकड़ का अनुमान लगा सकते हैं.
सन 2011 में वॉल मार्ट ने 20,94,760 करोड़ रुपयों का व्यापार किया. इसकी तुलना में
भारत का 2012-13 का केंद्रीय बजट केवल 14,90,925 करोड़ रुपयों का है. इतनी विशाल है
यह अकेली वॉल मार्ट कंपनी. एक बार बहु-ब्रांड खुदरा व्यापार को समुद्रपारीय
व्यापारियों के लिये खोलने के पश्चात तो ब्रिटेन की टेस्को, जर्मनी की मेट्रो तथा
फ्रांस की कार्फू जैसी कंपनियों की होड़ लग जाएगी, जो जाने कब से अपनी तैयारी कर के
बैठे हुये हैं.
वॉल मार्ट तीन प्रकार की दुकानें खोलता है. पहला है ‘वॉल मार्ट पड़ोस की दुकान’ जो
42,000 वर्गफीट क्षेत्र में बना होता है. दूसरा है ‘वॉल मार्ट डिस्काउंट दुकान’, जो
51,000 से लेकर 2,24,000 वर्गफीट का होता है. तीसरे तरह की दुकान का नाम है वॉल
मार्ट सुपर सेंटर. यह दुकान 98,000 से लेकर 2,61,000 वर्गफीट में बना होता है.
दुकान की विशालता से इनके व्यापार का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. एक बार अगर ऐसी
महामारी को आने की इजाजत दे दी गई तो उन भारतीय खुदरा व्यवसायियों का क्या होगा जो
दस गुणा दस वर्गफीट के कमरे में अपना व्यापार करते हैं !
भारत में वर्तमान खुदरा व्यवसाय 29.50 लाख करोड़ रुपयों का है, जो देश के सकल घरेलू
उत्पाद का करीब 33 प्रतिशत है. अब यदि यह हिस्सा विदेशी धन्ना सेठों के हाथ चला गया
तो जितना पैसा मुनाफे के रुप में विदेश चला जाएगा, उससे देश में आयात-निर्यात का
संतुलन बिगड़ना तय है. भारत में छोटे और मंझौले खुदरा दुकानों की संख्या 1 करोड़ 20
लाख के आसपास है. इन दुकानों में करीब 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है. ऐसे में
सवाल पूछने का मन होता है कि अगर इन 4 करोड़ लोगों के बजाये 4 या 5 धन्ना कंपनियों
को रोजगार दे दिया जाएगा तो क्या इससे देश का भला होगा ?
भारत में अगर एक बार इन महाकाय कंपनियों को खुदरा के क्षेत्र में प्रवेश दे दिया
गया तो ये कंपनियां दिखा देंगी कि लूट पर टिकी हुई अमानवीय व्यापार की परिभाषा क्या
होती है ! इन दुकानों के सस्ते माल और तरह-तरह के लुभावने स्कीम के कारण भारतीय
दुकानों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा. जब इन कंपनियों का एकाधिकार कायम
हो जाएगा, उसके बाद ये अपने असली रुप को सामने लाएंगी.
वॉल मार्ट की दुकानों में 40 फीसदी सामान वॉल मार्ट कंपनी के ही ब्रांड होते हैं.
यह किसानों तथा उत्पादकों से अपनी शर्त पर माल खरीदती है. एक बार एकाधिकार होने के
बाद ये कंपनियां किसानों को मजबूर कर देंगी कि वे फलां-फलां कंपनियों के खाद व बीज
खरीदें. बाज़ार में एकमात्र खरीदार होने के कारण वॉल मार्ट उत्पादकों तथा किसानों
को अत्यंत कम कीमत पर अपने उत्पाद बेचने के लिये बाध्य कर देता है.
भारतीय खुदरा व्यवसाय में विदेशी कंपनियों को इजाजत देने की कोई भी कोशिश देश की
अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाली साबित होगी. ऐसे में सरकार के इस निर्णय के खिलाफ
उठने वाली हर आवाज़ ही देश का भविष्य निर्धारित करेगी.
08.08.2012, 15.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशित