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18 अगेन की यह हिंसा

बहस

 

18 अगेन की यह हिंसा

मृणाल वल्लरी

"18 अगेन...!" बाजार में पेश यह नया उत्पाद है, उन महिलाओं के लिए जो पच्चीस-तीस-पैंतीस या शायद उसके ज्यादा उम्र की हो चुकी हैं. इस उत्पाद के प्रचार के लिए दो रूपकों का इस्तेमाल हो रहा है. पूरे पन्ने के अखबारी विज्ञापन में एक पूरा खिला गुलाब और (इसके इस्तेमाल के बाद) नीचे गुलाब की "सख्त" कली. यह क्रीम "पूरे खिले गुलाब" को "कली" बनाती है. सीधे और साफ शब्दों में कहें तो यह क्रीम आई है महिलाओं के जननांग के ढीलेपन को खत्म करने के लिए. टीवी पर इसके विज्ञापन में एक महिला गाना गाती है- "आई एम 18 अगेन, फीलिंग वर्जिन अगेन."

18 अगेन

यानी अपनी "वर्जिनिटी गंवा चुकी" महिलाओं के लिए "वर्जिनिटी" की वापसी का इंतजाम. महिलाओं की अस्मिता के खिलाफ बाजार का यह नया और बेहद बर्बर मजाक है. अव्वल तो किसी भी समाज में "वर्जिनिटी" की अवधारणा ही स्त्री-विरोधी है. अरब से लेकर यूरोप तक इसी "कौमार्य" को बचाए रखने के लिए सदियों से महिलाओं को सींखचों में कसा गया है, उन्हें सिर्फ एक देह बनने के लिए मजबूर किया गया है. यह सामंती कुंठा आज के कथित आधुनिक युग में इस तरह सामने आई है, जो सारे नारी आंदोलनों, स्त्री को देह नहीं मानने वाले संवेदनशील और चेतन समुदाय को मुंह चिढ़ा रही है.

अभी महिलाओं के जननांगों को गोरा बनाने वाली क्रीम ने बाजार में पांव रखे ही थे कि अब उसके "ढीलेपन" को खत्म करने का भी डंका बज गया. टीवी पर मॉडल गाने गा रही हैं, अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन है जो खिले गुलाब को कली बनाने की वकालत करता और "भरोसा" दिलाता है. इसका मूल स्वर यह है कि "चलो...! अपने पार्टनर के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजार चुकी महिलाओं, अब तुम हीन भावना से ग्रस्त हो जाओ, क्योंकि "वर्जिन" होना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है, एक पैंतालीस साल का पुरुष अपनी पत्नी से मांग कर सकता है कि वह फिर से कली बन जाए. उम्र का जो असर उस पर आया है, अब वह स्वीकार्य नहीं है.

"अब" इसलिए कि जब "कली" का विकल्प उपलब्ध होने के सपने दिखाए जा रहे हैं तो "गुलाब" सरीखी महिलाएं क्यों स्वीकार की जाएं! "गुलाब" से "कली" की ओर वापसी नहीं करने वाली महिलाओं को यह विज्ञापन, उसके उत्पादक यह संदेश (धमकी) देते हैं कि अब अगर "कली" नहीं बनीं तो अपने पार्टनर से खारिज होने को तैयार रहो. जो क्रीम "फूल" से "कली" बनाने के फर्जी दावे करे, कुदरत का उलटा चक्र चलाए, वह महिला के शरीर के साथ-साथ उसके समूचे मानसिक ढांचे पर कितना खतरनाक असर डालेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन मर्दों की कुंठा के आगे महिलाओं की अस्मिता की क्या, उनकी सेहत तक की परवाह न अब तक की गई है और न की जाएगी. व्यवस्था हमेशा सत्ताधारी वर्गों की, सत्ताधारी वर्गों द्वारा और सत्ताधारी वर्गों के लिए होती है. शासित उसके लिए महज उपभोग की वस्तु हैं.

जननांगों को गोरा बनाने की क्रीम के खिलाफ कुछ महिला संगठनों ने विरोध भी जताया था. कई अखबारों और वेबसाइटों पर छपे लेखों में गुस्सा भी जाहिर किया गया. लेकिन अब तो लगता है कि इस तरह के उत्पादों की कंपनियां चाहती ही यही हैं कि उनके उत्पादों पर हो-हल्ला हो, खबरिया चैनलों पर बहस हो, ताकि औपचारिक विज्ञापनों के इतर भी उत्पाद का प्रचार हो. इधर देखा गया है कि ऐसे उत्पादों की उत्पादक कंपनियों से जुड़ी विज्ञापन एजेसियां पत्रकारों को प्रेरित करती हैं, उन्हें इसके लिए अच्छा-खासा लाभ मुहैया कराती हैं कि अच्छी या बुरी, इसकी खबर बनाओ और इस पर चर्चा चलाओ. पक्ष या विपक्ष, किसी भी तरह इसे चर्चा के केंद्र में लाओ.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mydbrao [mydvrao@gmail.com ] dilhi - 2012-09-15 17:05:10

 
  जिन लोगों के पास जीवन में कुछ करने का चेलेंज ना हो या यूं कहिए जिनको दुनियादारी में कड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ी हो और उसके पास धन दौलत का ढेर लगा हो उसके दिमाग में और जीवन में ऐसी ही कुराफ़ात आते रहते हें। वरना कर्मठ व्यक्ति को जीवन में एक ही पत्नी हर उम्र में अच्छी लगेगी और बच्चे की जिम्मेदारियां खुशी से निभाएंगे। 
   
 

Rajiv [] - 2012-09-06 14:34:29

 
  जनाब पुरु, आपने जिन पंक्तियों का संदर्भ देकर यह पूछा है कि आपने ये लेख किसके कहने पर लिखा, क्या आपको पूरा लेख पढ़ना जरूरी नहीं लगा? आपने जिन पंक्तियों को लिखा है, उसके ठीक बाद ही यह भी लिखा है मृणाल वल्लरी ने- `अब इन पर खूब `चर्चा` होती है, इसके नकारात्मक पहलुओं की बात की जाती है, लेकिन ऐसे उत्पादों और उनके विज्ञापनों के खिलाफ कोई कानून नहीं बनता है.` और किसी के कहने पर ही लिखने की जरूरत होती तो उन्हें इस बात का खुलासा करने की क्या जरूरत थी? थोड़ा सोच भी लिया कीजिए...  
   
 

rahul [] ranchi - 2012-08-30 13:35:45

 
  वल्लरी जी का सवाल मौजूं हैं लेकिन सोचना होगा कि आप वस्तु बनने की मन:स्थिति से उबरें! 
   
 

sunil pandey [sunilbom2011@gmail.com] mumbai - 2012-08-29 15:14:43

 
  भारतीय समाज को न जाने क्या हो गया हैं | लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं | 
   
 

Dilip sikarwar [dsikarwar71@gmail.com] bhopal - 2012-08-29 07:34:38

 
  शायद इन कंपनी वालों को नारीशक्ति का अंदाजा नहीं है. वे ऐसी पूजा करेंगी, तब कोई क्रीम काम नहीं आएगी. 
   
 

Ranjit [ranjitkoshi1@gmail.com ] Ranchi - 2012-08-28 06:35:03

 
  अच्छा और जरूरी लेख. हर हाल में और हर कीमत पर पैसा बनाने के इस दौर में ऐसा मजाक अप्रत्याशित नहीं है. ये पैसावादी सभ्यता का तकाज़ा है. ये अब एक universal trend बन गया है. समाज के हर वर्ग कुछ अपवाद को छोड़कर इस खेल में शामिल हैं, अपने अपने औजारों के साथ.  
   
 

समर [samaranarya@gmail.com] हांग कांग - 2012-08-27 16:20:57

 
  स्त्रीद्वेशी समाजों के सच पर करारा प्रहार है यह लेख. सलाम मृणाल वल्लरी को.  
   
 

shamim [] lukhnow - 2012-08-27 07:08:17

 
  मृणाल बल्लरी जी का यह लेख बहूत जरुरी सवाल उठाता है। लोगों को सोचना चाहिए कि चुपचाप हम किस तरह की पिछड़ी हुई सामंती मानसिकता का शिकार हो रहे हैं। आगे बढ़ता हुआ समाज इससे मुक्त होना चाहेगा।  
   
 

Rajiv [rajeevranjan199@gmail.com] patna - 2012-08-27 06:56:49

 
  मुझे लगता है कि धर्म ने पितृसत्ता को अपना अस्त्र बनाया क्योंकि पितृसत्ता के कायम रहने और उसके भीतर के शासित रहने वाली स्त्री के उसके गुलाम की अवस्था में रहने से ही धर्म का महल बचा रह सकता है. इसलिए धर्म पितृसत्ता की हर पहल को मजबूत करता है. बाजार में भी धर्म का संचालन करने वाले लोग या उसी मानसिकता से संचालित होने वाले लोग भरे पड़े हैं. उनके दिमाग में भी वही घूमता है जो धर्म के तंत्र में घूमता है. वे बाजार में मुनाफा कमाते हैं. लेकिन इस रास्ते धर्म के रचाव को और मजबूत करते हैं. इस तरह के क्रीम स्त्री के भीतर हीन भाव पैदा करेगी. मृणाल जी ने बिल्कुल सही पकड़ा है. अब सोचिए कि जो महिला अठारह जैसा प्रभाव अपने पति को नहीं देगी उसके मन में कैसी कुंठा पैदा हो सकती है. इसका एक मतलब तो यह भी हो सकता है कि वर्जिन की स्थिति से आगे निकल गई औरतों को और पच्चीस तीस या पैंतीस चालीस की उम्र को औरतों को जीने का हक नहीं है. अगर उसे जीना है तो उसे धर्म के मूल निकली इस तरह की क्रीमों को खरीद कर पुरुष समाज को खुश करना होगा. यह अन्यायपूर्ण व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास है.  
   
 

Rachna Verma [rverma.almora@gmail.com] Noida - 2012-08-26 18:25:50

 
  भारतीय समाज में एक महिला के शरीर को हौव्वा बना कर रखा है, उनके खिलाफ कोई अपराध हो या उनकी कोई भी उपलब्धी सब में केवल और केवल एक महिला बनाकर पेश किया जाता है, उदाहरण के लिए गीतिका-कांडा केस को ही लें मीडिया में ये बातें चीख चीख कर कहीं कि उसके कांडा से शारिरिक संबंध थे और उसका कई बार गर्भपात करवाया गया, क्या कभी किसी पुरुष के खिलाफ अपराध होने पर मीडिया ये लिखता है कि उसने कितनी बार शारिरिक संबंध बनाए. फिर महिला के मामले में ये Point Out करना क्यों जरूरी है, इस खुलासे में भी भारतीय जनमानस में गीतिका को एक गलक लड़की के रूप में पेश नहीं किया गया क्या? 
   
 

Jaiaish Dalmanpariyat Koka [Jdkoka@gmail.com] Tokyo, Japan - 2012-08-26 09:14:10

 
  बहुत ही बुरा, मगर स्त्री को कुछ अपना भी समझना चाहेये . इस सब का एक आम पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं है. 
   
 

Priyanka Singh [rustic.fervor@gmail.com] Delhi - 2012-08-26 08:15:57

 
  बहुत बढ़िया विश्लेषण. ऐसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां स्त्रियों को सिर्फ उपभोग की वस्तु के रूप में पेश करती है लेकिन ज्यादा दुख की बात ये है कि आज के तथाकथित विकसित मानसिकता वाले समाज में भी स्त्री खुद को शोषित होने का मौका दे रही है. ये सिर्फ कुछ कुठिंत पुरुषों की कुंठा के लिए उपजा उत्पाद हो सकता है लेकिन कितनी महिलाएं है जो ऐसे उत्पादों को सिरे से नकारेंगी और इसे स्त्रीत्व पर हमले जैसा देखेगी... क्या स्त्रियों का एक बड़ा समूह खुद के पुरुष के नजरों से नहीं देखता और गाहेबगाहे ऐसे उत्पादों को स्वीकार कर उनकी सफलता सुनिश्चित नहीं करतीं? और जब तक ऐसी स्त्रियों ऐसे उत्पादों के लिए बाजार बनाए रखेंगी तब तक कंपनियां भी अपने मुनाफे के लिए ऐसे उत्पाद लाती रहेंगी, यही तो बाजारवाद का मूल है. 
   
 

Puru [] Delhi - 2012-08-26 06:22:55

 
  बहुत अच्छा और विचारोत्तेजक लेख. लेकिन लेख की इस पंक्ति ने सवाल खड़े किए कि आपने ये लेख किसके कहने पर लिखा? `इधर देखा गया है कि ऐसे उत्पादों की उत्पादक कंपनियों से जुड़ी विज्ञापन एजेसियां पत्रकारों को प्रेरित करती हैं, उन्हें इसके लिए अच्छा-खासा लाभ मुहैया कराती हैं कि अच्छी या बुरी, इसकी खबर बनाओ और इस पर चर्चा चलाओ. पक्ष या विपक्ष, किसी भी तरह इसे चर्चा के केंद्र में लाओ.` 
   
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