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अल्ला रसूल और मणिमाला चित्रकारः शंपा शाह

अल्ला रसूल और मणिमाला चित्रकार की दुनिया

शंपा शाह

भोपाल से

 

 

manimala

 

 

“ मणिमाला, आज सत्यवान सावित्री नहीं और सत्यवादी हरिशचंद्र भी नहीं, आज अपनी कहानी सुनाओ. बचपन से लेकर आज तक की पूरी कहानी.”

वह हँस पड़ी. एक ऐसी हँसी जो अपना वृत्त पूरा करती उसके पहले ही उसमें दरारें पड़ गईं. “ मेरी कहानी सुनेंगी दीदी तो आपका कलेजा फट जायेगा. सुनेंगी ऐसी कहानी?”

मेरे हाँ में सिर हिलाने के बाद वह कुछ देर के लिए बिल्कुल चुप हो गई. उसका चेहरा किसी प्राचीन पहाड़ में बदल गया जिस पर उसके बीते हुए जीवन की परछाइयाँ झुण्ड की झुण्ड आ-जा रही थीं. वह अपने उलझे हुए जीवन के ढेर में से कोई सिरा खोज रही थी, जहाँ से अपनी कहानी को सिलसिलेवार शुरू कर सके. जीवन का सूत बेहद उलझा हुआ और जगह-जगह से टूटा हुआ था. वह अपनी कहानी कहाँ से शुरू करे? अपनी कहानी के मुहाने पर खड़ी वह सोच में पड़ी थी कि किस धारा में छलाँग लगाये कि जो उसे उसके उद्गम तक ले जायेगी.

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के एक छोटे से गाँव ‘नया’ की मणिमाला चित्रकार, जिसके चित्रों में आकृतियाँ आपस में गुंथी हुई, एक-दूसरे में विलीन होती-सी मालूम देती हैं. जिसके चित्रों में हर रंग एक श्यामल कलौंछ लिये, सुबह पौ फटने के पहले के आसमान की गहराई और आभा का एक साथ अहसास कराता है. जिसकी मुक्त कंठ से गाती आवाज़ वह जहाँ भी हो वहाँ से, सबको अपनी चुम्बकीय शक्ति से खींचती है. जिसके चेहरे को बिना मुस्कुराहट पहने शायद ही किसी ने देखा हो. उसी मणिमाला का जीवन इतना उबड़-खाबड़, इतना पथरीला, कि उसमें प्रेम की चंद बूँदें भी नहीं?

उसके जीवन के शुरूआती अहसासों में से एक है कि उसकी अपनी सगी माँ उसे नहीं चाहती और न जाने क्यों उससे सौतेला व्यवहार करती तो दूसरा यह कि पिता की, बतौर पिता अनुपस्थिति. माँ और पिता के बीच निरंतर कलह, मारपीट. पिता का कभी न लौटने के लिये चला जाना. माँ का दूसरा विवाह और हफ्ते भर के भीतर ही मारपीट, गाली-गलौज का वही सिलसिला. माँ का बरसते पानी में भी उसे भिक्षा माँगने भेज देना. अपने दूर के रिश्ते के दादू दुखुसम चित्रकार से छुप-छुपकर गाना सुनना ताकि गीत गाकर ज्यादा भिक्षा मिल सके.

manimala


बचपन की स्मृतियों में यदि कोई प्रेम का कोना है तो वह कुछ समय माँ उसे उसकी दादी-फूफू के यहाँ नंदीग्राम छोड़ आई थीं. दादी-फूफू, जो घर पर खजूर के पत्तों की चटाइयाँ बनाती थीं. दादी-फूफू जो गाने गाती थीं. जो मणिमाला को प्यार करती थीं और उसे अपने ही पास रखना चाहती थीं. शांति और प्रेम से लबालब भरे ये चन्द माह उसके सूखे बचपन में साफ, मीठे पानी के ताल जैसे हैं.

फिर एक रोज़ तेरह बरस की उम्र में गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह-सा अचानक उसका अपना ब्याह. रातों रात बिदाई. नींद, थकान और भय के बीच ट्रेन- बस और फिर जंगल का लम्बा पैदल सफर. रात, जंगल, हुआं-हुआं करते सियार. अंतत: पौ फटते तक अपने ससुराल गाँव हाथचड़ा (नन्दीग्राम) पहुंचना. न खाना-पानी, न नींद, न कोई प्यार भरा सत्कार. और फिर सुबह पति का बड़ा सा बस्ता टाँग कचरा बटोरने के लिये निकल जाना. सास का उसे तालाब से कलसी भरकर लाने का आदेश दे कहीं दिन भर के लिये गायब हो जाना. भूख और थकान से थरथराती एक बच्ची की कमजोर देह. हाथ-पाँव में आलता, माँग में चटक सिंदूर, सस्ती, चमकती साड़ी का सिर पर पल्लू.

मोहल्ले के बच्चे बार-बार घर में झाँकने चले आते और चिल्ला कर कहते नई बहू-नई बहू! ब्याह का खेल पूरा हो चुका था. बच्ची से नई बहू बनी मणिमाला के अपने जीवन में विवाह का रहस्य यूँ कुछ चंद घण्टों में पहाड़ की तरह टूटा. पलक झपकते वह सयानी हो गई.

मोहल्ले के बच्चे आपस में, तालाब के पास किसी संपन्न बंगाली परिवार में 'बोऊ-भात' में खाना खाने जाने की बातें कर रहे थे. मणिमाला थी तो उन्हीं की उम्र की, उन्होंने उससे भी साथ चलने को कहा. फौरन एक मैला-कुचैला कपड़ा ओढ़ वह उनके साथ चल पड़ी. वहाँ पंगत में बैठ वह जिस तरह खाने पर टूटी उसे देख, तो घर के परोसने वालों ने उसकी सारी व्यथा-कथा बिन जाने ही समझ ली. नई बहू का आलता-सिंदूर, छुपाने से छुपता है भला. उस परिवार की औरतों ने उसे भरपेट खिलाया, साथ में घर ले जाने के लिये भी दिया.

मणिमाला कहती है कि यदि उस रोज़ उस परिवार में भोजन नहीं मिला होता तो शायद वह उसी दिन मर गई होती.

विवाह के बाद का जीवन भी बचपन के अभावग्रस्त जीवन की ही अगली कड़ी थी. पहले सासुमाँ और जेठ द्वारा मारपीट और फिर कभी-कभी पति कुलसंग पटीदार का भी उनके संग हाथ बँटाना. ब्याह के दो चार दिन बाद मणिमाला भी पति के साथ बस्ता टाँग कर कचरा बीनने-जाने लगी थी.

 

आँखों ने अच्छा देखना ही बन्द कर दिया. वे बस सड़क किनारे, गन्दे घूरों पर मोमजामे की थैलियाँ, बोतल, डिब्बे, लोहा-लंगड़ ढूंढ़ती रहतीं. बस स्टैण्ड के पास उधर लोग पेशाब कर रहे होते और इधर यह नवदंपति वहीं से पन्नी उठा रहे होते. कूड़े के ढेर में कुत्ते, गाय, बकरी और यह नवदंपति एक साथ कुछ तलाशते रहते. घर लौट कर पोखर के पानी से कितना ही नहाओ वह गंध, वह सड़ाँध पीछा नहीं छोड़ती थी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

subhash chander (subhash.c.chander63@gmail.com) delhi

 
 इस संवेदनशील रचना के लिए शंपा शाह बधाई की पात्र हैं. 
   
 

yogendra patle (cool.yogendrababa@rediff.com) Bhopal

 
 gao ki taswir computer par la di gayi hai.jo manao ko prakrati se jodti hai. 
   
 

याज्ञवल्‍क्‍य (yagnyawalky@gmail.com) छत्‍तीसगढ

 
 अच्छी प्रस्तुति, अच्छे शब्दों का प्रयोग. मेरी बधाई लें. 
   
 

ShreePrakash Ranchi

 
 आज की तारीख में कला को जिस तरह से हाशिये पर डाला जा रहा है, उसमें यह सुखद है कि मणिमाला जैसी कलाकारों को मंच मिल रहा है. शंपा शाह ने जिस तरह से मणिमाला की कहानी उकेरी है, वह अपने में लाजवाब है.रविवार में लगातार आप लोग समाज में ऐसी खबरों को जगह दे रहे हैं, जो अलक्षित रह जा रही हैं. सच्चिदा बाबू का साक्षात्कार भी रविवार के लिए उपलब्धि है. 
   
 

dadi (dadinani9@yahoo.com) chicago

 
 चित्र कला का लेख मन को भाया. एक पाठिका
dadi from chicago
 
   
 

kaushlendra (k.prapanna@gmail.com) delhi

 
 मणिमाला की कथा के साथ ही राजेंद्र यादव की रचना अच्छी है. प्रसून लतांत की लेखनी दहेज में मिली हरियाली पहाड़ की दुनिया की झलक दिखाती है. कौशलेंद्र.  
   
 

raina paliwal () agra

 
 apka ye lekh accha laga .  
   
 

vinati () chhattisgarh

 
 निःशब्द छोड़ दिया है शंपा ने, मणिमाला ने... इलेक्ट्रानिक मीडिया बाबा, भविष्य, मल्लिका, शिल्पा को छोड़ रविवार से ही कुछ सीख (टीप) ले.  
   
 

Sunita Verma Chhattisgarh

 
 बहुत मार्मिक कहानी है मणिमाला की. लेकिन जो जज्बा और हौसला उन्होंने दिखाया है, वह काबिल-ए-गौर है. इस हौसले को मैं सलाम करती हूं.
शंपा जी अगर पट चित्रकला के बारे में भी थोड़ा प्रकाश डालतीं तो यह सोने में सुहागा हो जाता.
 
   
 

kumar akhilesh Patna

 
 बहुत सुंदर लिखा है आपने. कलाकारों पर इसी तरह आप लिखते रहें, बड़ी मेहरबानी होगी. 
   
 

कुंदन सिंह कोलकाता

 
 मणिमाला की जीवन कथा लिख कर आपने बहुत सकारात्मक काम किया है. आज की मीडिया में दो-दो कौड़ी के फिल्म इंडस्ट्री के लोगों पर पूरा पन्ना न्यौछावर रहता है लेकिन जो सच में एकांत साधना कर रहे हैं, उनको कोई नहीं पूछता. ऐसे में आपलोग रविवार पर इस तरह की चिजें प्रकाशित करके गुरुत्तर कार्य कर रहे हैं. 
   

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