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बेटी संज्ञा, बहू सर्वनाम

मुद्दा

 

बेटी संज्ञा, बहू सर्वनाम

सुधा अरोड़ा

जेनेरिक दवा


''हमारी बिट्टो तो बहुत बढि़या खाना बनाती है, आप उंगलियां चाटते रह जाओ. बिट्टो के ऑफिस में सब उसकी बड़ी तारीफ करते हैं, मज़ाल है कि काम आधा छोड़कर उठ जाये! कभी-कभी तो दस बज जाते हैं ...अभी सो रही है, एक इतवार ही तो मिलता है ज़रा देर तक सो लेती है. बड़े लाड़-प्यार में पली है हमारी बिट्टो ...''

''इसे तो चाय तक ढंग की बनानी नहीं आती! कभी फीकी तो कभी मीठी चाशनी! ... ऐसी बेस्वाद सब्जी बनाती है. पता नहीं, इसकी मां ने क्या सिखाया है इसे! आजकल तो सभी लड़कियां नौकरी करती हैं पर बाहर काम करने का ये मतलब थोड़ी है कि घर की रसोई कोई दूसरा संभाले ...इसे घर गिरस्ती चलानी ही नहीं आती ... महारानी सो रही है अब तक ...बड़े बुजुर्गों की परवाह ही नहीं इसे.''

यह पहचानना कतई मुश्किल नहीं है कि कौन सा संवाद किसके लिये कहा जा रहा है! किसी दकि़यानूसी मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में कभी आप जायें जहां एक ही उम्र की दो लड़कियां हैं- एक घर की अनब्यांही बेटी है, जिसका एक नाम है और वह अपने नाम से बुलायी जाती है. दूसरी ब्याह कर लाई गई बहू है. नाम उसका भी है पर नाम होते हुए भी वह 'यह-वह', 'इस-उस' के सर्वनाम से जानी जाती है.

एक औसत सास की त्रासदी ही यह है कि वह स्वयं ज़िंदगी भर औरत बनी रहती है पर सास बनते ही अपना औरत होना भूल जाती है. जिस बात के लिये वह अपनी बेटी की तारीफ करती है, उसी के लिये उसकी बहू उपहास और निंदा का पात्र बनती है. जिन्हें अपना समय याद रहता है और जो अपने समय में हुई भूलों को दोहराना नहीं चाहतीं, वे अपनी बहू के प्रति न कभी अतार्किक होती हैं, न दुराग्रह पालती हैं क्योंकि अन्तत: एक औरत ही दूसरी औरत की तकलीफ़ को ज्यादा गहराई से महसूस कर सकती है. उसे करना चाहिये.

ऐसी ही एक समझदार महिला को मैं कभी भूल नहीं सकती जो अपनी बहू प्रीति (फर्जी नाम) को लेकर हमारे सलाहकार केंद्र में आई थीं. बहू का चेहरा जैसे किसी सदमे से पथराया हुआ था. बोलने की कोशिश करते ही उसके आंसू धाराप्रवाह बहने शुरू हो जाते थे. वह हमारे सामने छुई-मुई सी चुप बैठी रही. उसकी पूरी कहानी उसकी सास ने कह सुनाई. देखने में बेहद खूबसूरत वह लड़की एक गरीब परिवार से थी. उसकी खूबसूरती पर मुग्ध हो बेटा वहां रिश्ता करने को तैयार हो गया था.

लड़की के घर वालों ने समृद्घ परिवार और होनहार वर देख लड़की के लाख चाहने पर भी उसे बी ए की पढ़ाई का आखिरी साल पूरा नहीं करने दिया और शादी के बाद वह मुंबई आ गई. शादी को तेरह साल हो गए थे और उनके दो बच्चे थे- ग्यारह साल की बेटी और छ साल का बेटा. अब उस आदमी के रंग ढंग बदलने शुरु हुए. अपने ऑफिस की एक विधवा सहकर्मी से उसके संबंध बन गये. नौबत यहां तक आ गई कि उसने अपनी सहकर्मी के लिये एक कमरा ले दिया.

ऑफि़स से लौटते ही वह एक रिंगमास्टर की तरह घर में घुसता, खाने में नमक कम होने या किसी भी छोटे से बहाने से वह बीवी को मारता-पीटता और रात को घर से निकल जाता. यह हर रोज़ का किस्सा हो गया. बच्चे भी उसके आते ही थर-थर कांपने लगते. बेटी दरवाज़े की ओट में खड़ी हो जाती. मां ने शुरू में प्यार से अपने बेटे को समझाया पर वह किसी भी तरह मानने को तैयार ही नहीं हुआ.

मां ने बहू का साथ नहीं छोड़ा और उसके दूसरे संबंध को स्वीकृति नहीं दी तो वह मां पर भी हाथ उठाने लगा. बहू को यह देखकर तकलीफ़ होती कि उसकी वजह से बूढ़ी मां को भी पिटना पड़ता है. बेटे का आतंक पूरे घर को नरक बना रहा था. पड़ोसी उस झमेले में पड़ना नहीं चाहते थे और पुलिस इसे उनका निजी मामला कहकर बीच बचाव करना नहीं चाह रही थी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rajni dhyani [] Agra - 2013-03-16 14:32:08

 
  हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, बेटी और बहू को एक नजर से देखने की संवेदना ही नहीं दिखा पाते. आखिर क्यों ? 
   
 

om sapra [omsapra@gmail.com] delhi-9 - 2013-02-11 19:04:07

 
  सुधा जी का यह लेख कई परतें खोलता है. इन समस्याओं के हल पर हम सबको विचार करना चाहिये. 
   
 

girish chandra [] roorkee - 2012-12-28 02:04:07

 
  एक सही और सार्थक दिशा में उठाया गया कदम. सासू माँ की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने बहू को बेटी जैसा समझा. 
   
 

Naveen Deshwal [naveenkimail@gmail.com] Rohtak Haryana - 2012-12-05 06:13:41

 
  वाह-वाह बहुत खूब. 
   
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