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माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

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चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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फ़िलिस्तीनी कविता | मोईन बेसिस्सो

फिलिस्तीनी कविता

 

मोईन बेसिस्सो

अंगरेजी से अनुवादः अनिल जनविजय

 


प्रतिरोध

 Muin Bessisso


मेरी नाक के सामने
फेंका उन्होंने
एक काग़ज़ और एक क़लम
मेरे हाथों में ठूँस दी
घर की चाबी

काग़ज़- वे मुझ पर दोष लगाना चाहते थे
कहा- प्रतिरोध
क़लम- वे मुझे कलंकित करना चाहते थे
कहा- प्रतिरोध
घर की चाबी
कहा- तुम्हारे इस छोटे-से घर के हर
पत्थर के नाम- प्रतिरोध

दीवार पर एक छेद
दीवार के पार एक संदेश
एक विकलांग हाथ
सूचना मिली- प्रतिरोध

बारिश की हर बूंद
टपक रही थी जो
यंत्रणा-कक्ष की छत पर
चीत्कार कर रही थी- प्रतिरोध


बेरूत पीछे छूट गया

हवाई अड्डे पर है एक प्रसन्न कवि
हवाई अड्डे पर है एक प्रसन्न पाठक
सुरक्षित है हवाई अड्डे की ओर आने वाली सड़क
वहाँ कोई स्थानीय विमान नहीं है
और रेत का यह बोरा ही सिर्फ़ नायक नहीं है

यह बेरूत है
न मरे में है और न जिये में
लेकिन अख़बारों के हर हिस्से पर बेरूत की छाया है
चक्की के दो पाटों के बीच फँसा
वह अपना अख़बार छाप रहा है
अपना अख़बार पढ़ रहा है वह
प्रसन्न कवि प्रतीक्षा कर रहा है विमान की
प्रसन्न पाठक इन्तज़ार में है जलयान की
और रेत का यह बोरा ही सिर्फ़ नायक नहीं है
लेकिन बेरूत वहाँ है
एक दीवार के पीछे जीता और मरता हुआ

ओ अभागे नगर !
एक बादल हो तुम
बन्दूक से छूटी एक गोली, रोटी का एक टुकड़ा
और एक बोतल
या तुम एक लंगड़ी भेड़ हो
फुटपाथ पर नौसैनिकों से प्यार जताती हुई
ख़ुदा हो जैसे तुम अब
जंज़ीरों में जकड़ा हुआ

तुम न उड़ती हुई चिड़िया हो और न बम
दो गुटों के बीच तुम
एक धब्बे की तरह हो
हर दो वाक्यों के बीच एक अर्धविराम की तरह

चांदमारी के लिए बनी दीवार
काम आती है विज्ञापनों के लिए भी
उस पर चिपके पोस्टरों पर
बरसती है बारिश
इकट्ठा हो जाता है तुम्हारा बहुरंगी जल
अभी भी शेष है वहाँ, उस दीवार पर
एक वासन्ती चिड़िया
तुम्हारे प्यानो की चाबियों पर बैठी हुई

शाम को
अख़बार में लिखते हैं घायल
सुबह सवेरे उसे पढ़ते हैं मृतक
प्रसन्न कवि
और प्रसन्न पाठक हवाई अड्डे पर हैं
प्रसन्न विमान परिचारिका बाँट रही है
पेंसिलें, उड़ान-कार्ड और समाचार-पत्र

दस हज़ार मीटर की ऊँचाई पर
लिखो- बेरूत गूँज रहा है
दस हज़ार मीटर की ऊँचाई पर
पढ़ो- बेरूत डूब रहा है
बेरूत पीछे कैसा है
ख़ुशी से लिखो
ख़ुशी से पढ़ो
बेरूत पीछे छूट गया

16.09.2008, 16.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rati Saxena (saxena_pr@asianetindia.com) Trivandrum

 
 बेहद मार्मिक कविताएँ और खूबसूरत अनुवाद, अनिल जी कृत्या को भूल गए क्या?

 
   
 

Rajiv Pandey (rajivreal@gmail.com) Bombay

 
 बेहतरीन अनुवाद. कविता पढ़कर खुशी हुई कि खुशी सहम गई. 
   
 

ajey (ajeyklg@gmail.com) Keylong , Lahaul, H.P.

 
 कविताएं तो मार्मिक हैं ही, अनुवाद कमाल का है, साधुवाद ! 
   

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