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कहानी | छूटे हुए घर | सूरज प्रकाश

कहानी

 

छूटे हुए घर

 

सूरज प्रकाश

वे महिलाएं अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दौर से गुज़र रही थीं. वे बेहद चिड़चिड़ी हो गई थीं और हमेशा शिकायत के मूड में रहतीं. इन दिनों उनके पास बातचीत का सिर्फ एक ही टॉपिक था. इस विषय के अलावा वे न तो कुछ कहना चाहतीं, न सुनना. वे मौके या जगह की भी परवाह नहीं करती थीं, न यह देखतीं कि कोई उनका दुखड़ा सुनने के लिए तैयार भी है या नहीं. बस, उन्हें, ज़रा-सी शह मिली नहीं कि उनके दर्द भरे गीत शुरू हो जाते. वे अपना दुखड़ा न भी सुना रही होतीं, तब भी लगता, वे बिसूर तो ज़रूर ही रही थीं.

suraj prakash

इन रोने-धोने की वज़ह से उनकी सेहत खराब होने लगी थी. वे ज्यादा बूढ़ी, थकी-थकी-सी और चुक गई-सी लगने लगी थीं. उनके जीवन से बचा-खुचा रस भी विदा लेने लगा था और वे जैसे-तैसे दिन गुज़ार रही थीं. कुछ तो सचमुच ही बीमार हो गई थीं. अगर वे खुद बीमार नहीं थीं तो उनके परिवार का कोई न कोई सदस्य बीमार हो गया था और वे उसी की चिंता में घुली जा रही थीं.

उनमें से अधिकतर की उम्र चालीस से पचास के बीच थी और वे मेनोपॉज के भीषण बेचैनी वाले कठिन दौर से गुज़र रही थीं, या किसी भी दिन उस दौर में जा सकती थीं. इस वज़ह से भी उनकी तकलीफें और बढ़ गई थीं. वे असहाय थीं. लाचार थीं. खुद को शोषित और पीड़ित तो वे मानती ही थीं. कुल मिलाकर उनके लिए ये बेहद तकलीफ भरे दिन थे.

वैसे वे हमेशा से ऐसी नहीं थीं. वे सब की सब अच्छे घरों से आती थीं. पढ़ी-लिखी थीं. उनके स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे थे. रुतबे वाले पति थे. घर-बार थे. उनमें से कुछ के तो महानगर में खुद के फ्लैट्स भी थे. गाड़ियां थीं. उनके पास सुख-सुविधा का सारा सामान था. अच्छे-अच्छे गहने और ढेर सारी साड़ियां थीं. वे हर दृष्टि से भरपूर जीवन जी रही थीं. वे सब-की-सब अच्छा कमा रही थीं. कुछ का वेतन तो `कोई फोर फीगर' से बढ़कर`फाइव' फीगर तक पहुंचा था. और यही अच्छा कमाना उनके लिए अभिशाप बन गया था. वैसे देखा जाए तो उनके साथ कोई ऐसी गंभीर बात नहीं हुई थी कि वे सब-की-सब सदमा लगा बैठतीं या जिंदग़ी से इतनी बेज़ार हो जातीं. लेकिन वे अपनी ज़िंदगी की पहली बड़ी परीक्षा में ही फेल हो गई थीं और उनकी यह हालत हो गई थी.

दरअसल वे सब-की-सब एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण संस्थान से जुड़ी हुई थीं. कुछ तो बहुत वरिष्ठ पदों पर भी कार्य कर रही थीं. इस संस्थान का प्रधान कार्यालय एक ऐसे महानगर में था, जिसमें वैसे तो ढेरों समस्याएं थीं, लेकिन वहां रहने वाले उस महानगर को बेहद प्यार करते थे. यह महानगर उनकी शिराओं में बहता था. उनकी सांस-सांस में रचा-बसा था. इस संस्थान की शाखाएं सभी प्रदेशों की राजधानियों में थीं. संस्थान में काम करना गर्व की बात माना जाता था, क्योंकि वहां बेतहाशा सुविधाएं थीं और वहां नौकरी का मतलब सुखी जीवन की गारंटी हुआ करता था. महानगर में स्थापित इस प्रधान कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं का अनुपात अन्य केंद्रों की तुलना में बहुत अधिक था. यह अनुपात भी एक मायने में उनके लिए अभिशाप बन गया था.

उनकी खुद की निगाह में, यह अभिशाप था-उनका ट्रांसफर.

हालांकि इस ट्रांसफर में कूछ भी नया या गलत नहीं था. संस्थान के नियम और ज़रूरतें ही ऐसी थीं. ये ट्रांसफर अरसे से होते आ रहे थे और हर बरस होते ही थे. जो अधिकारी सीधी भर्ती से आते थे, जिनमें अक्सर लड़कियां भी होती थीं, वे इन स्थानांतरणों को सहर्ष स्वीकार कर लेते थे, क्योंकि वे जानते थे, कैरियर की सीढ़ी लगातार चढ़ते रहने के लिए पांच-सात ट्रांसफर तो देखने ही होंगे. फिर उनकी उम्र भी कम होती थी. वे कुछ भी कर गुज़रने के जोश से लबालब भरे होते.

लेकिन समस्या उन अधिकारियों की होती जो संस्थान में ही पंद्रह-बीस बरस की नौकरी करने के बाद अधिकारी बनते थे. इनमें से भी महिलाओं के साथ ज्यादा समस्याएं होतीं. ट्रांसफर की बारी आते-आते वे उम्र के चार दशक पार कर चुकी होतीं. घर-बार सैटिल कर चुकी होतीं. जीवन में स्थायित्व आ चुका होता. बच्चे बड़ी कक्षाओं में पहुंचने को होते. लड़कियां होतीं तो वे उपनी उम्र के सबसे नाजुक मोड़ पर होतीं, जहां उन्हें पिता की नहीं, मां की ही ज़रूरत होती. उम्र के ये दौर ही उनके लिए अभिशाप बन कर आए थे.

पिछले दो-तीन बरसों से संयोग कुछ ऐसा बन रहा था कि इन दिनों जितने भी ट्रांसफर हुए, हर सूची में इस महानगर की महिलाएं ही अधिक रहीं, जिन्हें वरिष्ठता क्रम से बाहर भेजा जाना था. अलबत्ता, इन महिलाओं के साथ संस्थान ने इतना लिहाज ज़रूर किया था कि उन्हें निकटतम प्रदेश की राजधानी में ही भेजा था, जहां से वे रात भर की यात्रा करके आ-जा सकती थीं. उनकी तुलना में उनके पुरुष सहकर्मी दूर-दूर के केंद्रो पर भेजे गए थे. इसके बावजूद ये महिलाएं खुद को अभिशप्त मान रही थीं.

ये अभिशप्त महिलाएं हर तरफ से घिर गई थीं. एक तरफ घर-बार था. पढ़ने और महंगी जींस पहनने वाले लड़के थे. सपने देखने वाली जवान होती लड़कियां थीं, जिन्हें लगातार अपनी मांओं की ज़रूरत थी और दूसरी तरफ इन सबकी बेतहाशा बढ़ चुकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें नौकरी करते रहने की ज़रूरत थी.

उनमें से कुछ ही महिलाएं ऐसी थीं जो, आदतवश, वक्त गुज़ारने के लिए नौकरी कर रही थीं. वे बहुत अच्‍छे घरों से थीं और नौकरी न करके भी अपना स्तर बनाए रख सकती थीं. बल्कि नौकरी करके वे जितना कमाती थीं, नौकरी के लिए खुद को सजाने-संवारने में उससे कहीं अधिक खर्च कर डालती थीं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

madhu()

 
 surajji,
ye kahani sach meiN acchi hai.sach hai mahila ko kai fronts per akele ek saath joojhana hota hai. aakhir Bhartiya Nari jo thaharee.badhi iss rachana ke liye.
 
   
 

neelesh mishra(nm_hc@rediffmail.com)

 
 mai chata hu ki aap isme bhopal ke bare me bhi kuch likhe aur bhopal me jo bhi job advertise hoti hai uske bare me bhi likha jay to achha hoga..... baki to apki website me kafi achhi new hai... 
   
 

रंजना सिंह(ranjurathour@gmail.com)

 
 बिल्कुल नई शिल्प में गुंथी कथा है.घर से दूर रह नौकरी कर रही प्रौढा स्त्रियों की परिस्थितियों तथा मनोव्यथा का बड़ा ही सटीक,सहज और सुंदर वर्णन आपने किया है.  
   
 

मुकेश पोपली(mukesh11popli@gmail.com)

 
 सूरज जी
आप की ये कहानी इस बात को दर्शाती है की अभी कहानी कहने की कला ख़त्म नही हुई है, विषय और शिल्प भी सुंदर है. आपको बहुत बहुत बधाई
 
   
 

nisha bhosle(nishabhosle_kavita@rediffmail.com)

 
 
aapki kahani mujhe bahut achhi lagi.
badhai.
 
   
 

Drishti

 
 An excellent story ! Badhai Suraj prakash ji ~ 
   
 

Ashutosh Dubey

 
 लंबे समय के बाद इस तरह की कोई कहानी पढ़ने में आई. पूरी कहानी की बुनावट इस तरह की है कि पाठक अंत तक बंधे रहता है. वरना किसी कहानी में कोई संवाद नहीं हो और वह इतना लंबा चला आए, यह लगभग असंभव जैसा है. युरोपियन कहानियों में ऐसा होता है लेकिन मेरे जानते कमसे कम हिंदी में कोई कथाकार इस तरह का जोखिम नहीं उठाता या कम ही उठाता है. अधिकांश कथाकारों के पास तो इस तरह की क्राफ्टमैनशीप भी नहीं है.  
   
 

पंकज कुमार वर्मा

 
 स्थानांतरण के बाद कामकाजी महिलाओं के जीवन में आए उथल-पुथल पर सूरज जी की कहानी पढ़ी। अच्छी लगी। संसार तो बस ऐसा ही है। दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है . . . .. . . .. .. ............ 
   
 

सुजाता एस

 
 आपने स्त्रियों की गाथा को इतने सुंदर तरीके से लिखा है कि एक-एक दृश्य सामने नजर आ रहा है. बोधिसत्न की एक कविता याद आ गई-
वह स्त्री जंगल में थी
तभी अपनी आँखों में रक्तस्राव धारण किए
सूर्य उगा
उस स्त्री के बच्चे
शिकार करने चले गए
और वह जंगल में
हिरनी की तरह रहने लगी.

आपको इस सुंदर कहानी के लिए बधाई.
 
   

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