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पेंशन बिल यानी कामगारों की तबाही

विचार

 

पेंशन बिल यानी कामगारों की तबाही

पीयूष पंत

पेंशन बिल


ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह सरकार या तो दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना नहीं चाहती या फिर उसने सचाई से जान-बूझ कर अपनी आंखें मूंद रखी हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को लूटने पर आमादा बहुराष्ट्रीय निगमों के एजेंट के रूप में अपनी भूमिका को सीमित कर लिया है. ऐसा नहीं होता तो फिर आखिर क्यों भारत सरकार लगातार भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाज़े इतने निर्मम तरीके से विदेशी पूंजी के लिए खोलती चली जाती जबकि यह साबित हो चुका है कि आवारा पूंजी ने किस तरह अमरीका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को तबाह कर दिया है.

नीतिगत गतिरोध के खिलाफ अपनी बढ़ती आलोचना से खुद को बचाने के लिए और यह साबित करने के लिए कि इसने आर्थिक सुधारों की राह अब तक नहीं छोड़ी है, मनमोहन सिंह सरकार अब इन सुधारों को आगे ले जाने की राह पर बढ़ रही है. यह जानते हुए भी कि गिरती आर्थिक वृद्धि और बढ़ते वित्तीय घाटे को पाटने का ये सुधार कोई रामबाण नहीं हैं.

यह बात सर्वविदित है कि ऐसे ही सुधारों ने पिछली सदी में पहले लातिन अमरीका और बाद में पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था में कैसी तबाही मचाई थी. कहना न होगा कि नब्बे के दशक में कैसे कई लातिन अमरीकी देशों ने चिली की नकल करते हुए अपने यहां की पेंशन प्रणाली में सुधार लागू किए थे, जिससे वहां पूर्ण या आंशिक तौर पर अनुदानित अनिवार्य निजी पेंशन खातों की प्रणाली आ गई थी.

यह बात अलग है कि वहां पेंशन का निजीकरण इसके समर्थकों और प्रणेताओं के वादों और दावों पर खरा नहीं उतरा है. माना गया था कि इससे इसमें शामिल होने वाले मजदूरों का दायरा और उन्हें मिलने वाले लाभों में इजाफा होगा और कुछ पीढ़ियों की बचत के बाद बाज़ार को प्रोत्साहन मिल सकेगा. यह दोनों ही मोर्चों पर विफल रहा. यहां तक कि 90 के दशक में निजीकरण की राह चुनने के हामी देशों के वैचारिक और वित्तीय समर्थक विश्व बैंक ने भी अपनी समझ में संशोधन करते हुए इस नाकाम विकल्प को तिलांजलि देने का संकेत दे डाला.

कामगारों की बचत और पेंशन को वित्तीय बाज़ारों के हाथ में देने के बजाय मनमोहन सिंह सरकार को यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि जिन देशों ने अपने यहां आर्थिक सुधार लागू किए थे, वे नए सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में इन सुधारों को सुधारने के काम में लग गए हैं.

अकसर पेंशन सुधार के मामले में इसके प्रणेता चिली को कामयाब मॉडल के रूप में उद्धृत करते हैं जबकि चिली ने भी हाल में 65 साल से नीचे के निम्न आय वर्ग के नागरिकों के लिए एक प्राथमिक पेंशन की व्यवस्था कर दी हैं जो कि निजीकृत तंत्र में कभी रिटायर नहीं होते. यह नाकामी इकट्ठा किए गए अपर्याप्त फंड के कारण थी या फिर सिर्फ इसलिए कि लोगों को पेंशन कोष में योगदान नहीं दिया था क्योंकि कई लोगों को अनौपचारिक अर्थतंत्र में कम आय पर जीने की मजबूरी थी.

इसी तरह अर्जेंटीना में राष्ट्रपति क्रिस्टीना किर्शनर ने 30 अरब डॉलर के निजी पेंशन फंड को राष्ट्रीयकृत करने की सरकार की मंशा का एलान किया है ताकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट के कारण गिरती शेयरों और बॉन्ड की कीमतों से अवकाश प्राप्त नागरिकों पर कोई प्रभाव न पड़ने पाए.

वास्तव में लातिन अमरीका का अनुभव यह रहा है कि उसने राज्य संचालित एक प्रणाली के ऊपर निजी निवेश के ‘लाभों’ को तरजीह दी और इस तरह जो नई सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनी, वह पूरी तरह विफल हो गई.

अंतरराष्ट्रीय संगठन सोशल वॉच कहता है, ‘‘कामगारों को प्रतिष्ठाजनक पेंशन की गारंटी देना तो दूर, निजीकरण ने एक ऐसी व्यवस्था बना दी है जिसमें बचतकर्ता का अपनी बचत पर कोई नियंत्रण नहीं होता या फिर बहुत कम रहता है. इस तरह नई सचाई यह है कि आर्थिक सुधारों को लागू करने के वक्त किये गये ज्यादा कामगारों के शामिल होने और ज्यादा पारदर्शिता व अवकाश प्राप्ति के बाद होने वाली ज्यादा आय के दावे नाकाम हो चुके हैं.’’

बोलीविया का उदाहरण लें. सोशल वॉच द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है- ‘‘बोलीविया में पेंशन सुधार को एक सामाजिक अनिवार्यता के तौर पर पेश किया गया था. कई दशक से चली आ रही पारंपरिक पेंशन प्रणाली की निष्क्रियता के कारण इसे सही ठहराने की एक दलील भी मौजूद थी- हालांकि इसकी मंशा निजी निवेश को मुनाफा पहुंचाने का एक स्रोत निमित करना था.’’

आर्थिक सुधारों के प्रमुख प्रणेताओं में एक पेना रूयदा (1996) के मुताबिक ‘‘पे ऐज़ यू गो’’ (पेजी) नामक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली को हटाने के लिए उसकी दिवालिया हालत को दर्शाते कुछ आंकड़े दिए गए, जो निम्न थेः

• सक्रिय कामगारों और पेंशनधारकों का अनुपात 3:1 का है जो कि इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए अपर्याप्त है और आदर्श अनुपात से कहीं कम है (10ः1).
• प्रणाली की कवरेज बेहद सीमित थी जिसमें आर्थिक रूप से सक्रिय 26 करोड़ की आबादी के बीच सिर्फ 314,47 नागरिक योगदान दे रहे थे.
• यह प्रणाली मुद्रास्फीति के प्रति अरक्षित थी और इस पर रोजगार व पलायन में होने वाले उतार-चढ़ावों का भी असर पड़ता था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

pramod srivastav [] Ambikapur - 2013-03-18 14:39:22

 
  विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा जारी गोपनीय दस्तावेज देखें, जिसमें भारत सरकार को सवाह दी गई है कि वह पेंशन फंड को पूंजी बाजार के लिए खुला करे, ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियां पूंजी की लूट खसोट कर अमरीकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकें. 
   
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