कविता | दिविक रमेश
कविता
दिविक रमेश
अफगान महिलाएं -2001
तुम्हारा आकाश
क्या सचमुच इतनी जगह थी तुम्हारी गुफाओं में उम्मीदों की
शायद वहीं सम्भाल कर रखे होंगे तुमने ये पंख
वरना नोंच लिए जाते
नोंच लिए गए हैं जैसे कितनों ही के
आज आकाश तुम्हारा है
और यह उडान भी
आकाश जिसका मुरीद है
कितने मुक्त तो दिख रहे हैं तुम्हारे पांव
राहत में मिली सांसों से
घुटी इच्छाओं की सी राहें अब निकल पडी हैं जिनसे धाराओं सी
देखो तो कैसे आ खडे हैं सामने
ये सुन्दर सुन्दर लक्ष्य गबरू खान भाइयों से
खींच ली गई थी जो जमीन तुम्हारे नीचे से
और फेंक दिया गया था जिसे किसी कोने में
पुराकथा के किसी पात्र सा
आज देख रहा हूं उसे लौटते
सम्भाल सम्भाल रखते तुम्हारे पांव
बरसों बाद आज लैटेगा काबुली वाला मेरा दोस्त अपने वतन को
ठूंस ठूंस भर ली हैं उसने जेबें
शहनाइयों की मिठास से
खुशियों के जाने कितने जेवरात
उसने रख लिए हैं अपनी आंखों में
बस्तों का एक पूरा हुजूम
उसने संजों लिया है जजबातों में
उसके हाथों में कलम है
और सभ्यता की पुनर्रचना के लिए
एक बेहतरीन कागज
देखना
खिडक़ियों की छलनियों के पीछे की तुम्हारी आंखों को
ला खडा करेगा वह दुनिया के तमाम दृश्यों के सामने रूबरू
जिन्हें फिर कभी कोई जुर्रत नहीं कर सकेगा छीनने की तुमसे
तुम्हारी ताकत के सामने
उड़ो कि इतना उड़ो
कि
आदत हो जाए तुम्हारी आकाश
फूल
फूल जाए छाती जमीन की
तुम्हारी कामयाब उडानों पर
कि दौड पडे स्वागत में
चूल्हों की गन्ध और
आकाशी सुगन्ध साथ साथ
जगह
जल ही नहीं
जगह तो बनाता है चकला भी
बेलन ही नहीं चिमटा भी और आग भी
नदी जो चलती है विस्तार में
बहुत कुछ देती है चलती
ऊंचाई की ओर ताकते स्थिर वृक्षों को
रखती है चलाएमान भी
देते हैं उड़ान वृक्ष पक्षियों को
एक जगह अनन्त
हर वह जो यहां है
रखता है अपनी एक न एक जगह
जहां हो सकता है अभिव्यक्त
अपनी तरह
दिक्कत पर यही है
कि न पहचानते हैं और न ही खोजते हैं
अपनी उस जगह को
बस झपटा मारते हैं औरों की जमीन पर सुविधापरस्तों की तरह
होते ही जरूरत
और रोते हैं
19.09.2008,
02.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित