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दास्तां-ए-मानुष : यसोदा

दास्तां-ए-मानुष पांच

वार्तालेख


पीयूष दईया

 

सन् 1999 में उत्तराखंड के रांउलेक गांव, ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए भू-स्खलन से प्रभावितों के विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुए थे. कुछ और प्रभावितों के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में हैं.

 

 

धूप पीछे से निकल गईः यसोदा

 

उस दिन जब गांव में भूकम्प आया तब गांव के बहुत सारे लोगों को बचाने का पहला श्रेय आपको ही जाता है.

आपके जीवन की पार्श्वभूमि कुछ इस तरह से है कि आपके पति फौज में थे. पति की पहली पत्नी से एक लड़का और एक लड़की. पहली पत्नी के निधन के बाद शादी यसोदा जी से हुई. शादी के कुछ सालों बाद जब इनका एक लड़का ढाई साल का था और दूसरा बच्चा डेढ माह के गर्भ में था तब आपके पति की मृत्यु हो गयी. तबसे आप स्त्री-मुखिया की भूमिका में है. आपके छोटे बेटे का नाम अशोक है-भूकम्प के समय अशोक करीब ग्यारह साल का था-जो अभी आप के साथ ही रहता है. कुछ सालों पहले बाइस बरस की उम्र में आपके बडे बेटे का एक सड़क-दुर्घटना में निधन हो गया था.

उस दिन यहां जंगल में आग लगी थी सो हम सब आग बुझाने गये थे. पूरा गांव. अपना जंगल बचाना होता है ना सो सभी स्त्री-पुरूष जाते हैं. जब तक आग बुझा कर लौटे तब तक रात के करीब दस-साढे दस बज चुके थे. गांव में आने के बाद जिनके घरों में बनाने वाले थे उन्होंने खाना बना कर खाया लेकिन मैं इतना थक चुकी थी कि खाना नहीं बना सकी. मेरा यह बेटा तो तब छोटा था सो काम कैसे करता हालांकि लड़की होती तो बना भी लेती. जब तक मैं घर पहुंची तब तक यह सो गया था सो मैं भी थकान के चलते सो गयी.

रात में जब नींद में थी तो भूकम्प आ गया. मैं अपने बच्चे के साथ अन्दर थी और मैंने उससे कहा कि तू बाहर मत आ, बाहर शायद भूत आया है. तब ऐसा थोड़े ही पता चला था कि यह भूत नहीं, भूकम्प आ रहा है. तब बाहर बहुत तेज शब्द-घनघोर विस्फोट-सा-हुआ और घर भी हिला, ऊपर की कडी टूट नीचे गिरी. घर क्योंकि पूरा बंद था इसलिए यह पता नहीं चला कि बाहर बिजली वगैरह भी चमकी हो तो. दिखाई नहीं दिया.

 

बच्चे को मैंने घर के अन्दर ही रखा क्योंकि छोटे बच्चों को डर लग जाता है ना. वह बाहर आना चाह रहा था पर मैंने उसे अन्दर ही वापस धकेल दिया और कहा कि तू बाहर मत आ.

जब मैं बाहर चौक पर पहुंची तो देखा कि सब रो रहे हैं. मुझे झटका लगा कि अरे! यह क्या हो गया. सारे गांववाले दबे पड़े रो-चिल्ला रहे थे पर तब भी मुझे यह नहीं पता चला कि यह भूकम्प की वजह से हुआ है. जिस जगह पर मैं खड़ी थी वहां से सब जगह नज़र जाती है-सारे मकान टूट गये थे, लोग दबे थे.

यहां से एक मील दूर पर नदी के पास नेपाली मजदूरों की बस्ती है तो मैंने अपने यहां की एक महिला जसोदा से कहा कि चल उधर जाकर नेपालियों को ले आते हैं-क्या पता कितने जिंदा बचे हैं, कितने मर गये हैं. अंधेरा था सो भला पता भी कैसे लग सकता था. हम दोनों भागे भागे गए और नेपालियों को जाकर खबर करी कि भाई साहब उधर चलो कि पूरा गांव दब गया है. सब को बचाने के लिए चलो. किसी ने सबल रखा, किसी ने बेलचा रखा, किसी ने कुछ रखा और सभी लोग-करीब एक-डेढ सौ लोग-गांव की ओर चल पड़े. रात भर हम सब दबे हुए लोगों को निकालने में लगे रहे.

सुबह होने पर हम सब निकाले हुए लोगों सहित ऊपर बांध तक गए और सड़क के पास शरण ली. सबके लिए खाना बनाया. अन्दर का डर होता है न तो कभी-कभी घाव बन जाता है. सो इसके लिए हमारे यहां गुड का हलवा बनाया जाता है. जैसे बोलते हैं न कि खून का थक्का बन जाए तो वह फट जाता है सो ऐसा न हो इसके लिए हलवा बना कर ले गयी. किसी ने खाया, किसी ने नहीं खाया. जिसका जैसा दिल किया उसने वैसा किया.

मकान तो मेरा भी टूटा था पर नीचे नहीं गिरा था.

लौट कर जब वापस घर आई तो देखा कि मेरे बच्चे पर बल्लियां पड़ी थी. एक भी अगर इस पर सीधी चुभ जाती तो यह मर जाता. तब मैंने अपने बच्चे को बाहर निकाला. यह रो-बिलखते हुए मुझसे कह रहा था कि तू इतनी रात में कहां गयी थी.

मैंने उसे समझाने की कोशिश करी कि पूरा गांव दब गया था सो सबको बचाने गई थी पर यह तो बहुत छोटा था सो जान नहीं सका और पूछता रहा कि कैसे दब गया, किसने दबाया, क्यों दबा. अब इसका भला कोई क्या जवाब दे सकता है. अभी हम यहां बैठे हैं और अचानक से भूकम्प आ जाए तो किसको मालूम है? होने वाली बात तो कोई भी नहीं जानता, होगी तो सब जानते हैं. कौन है जो होने वाली बात जान सकता हो ?

मैंने अपने बच्चे से कहा कि रो मत, धीरज रख. सब बच गये हैं. यह बोला कि मेरी भैंस ला-मैं दूध कहां से पीऊंगा. मुझे उससे कहना पड़ा कि अब भैंस कहां से लाऊं वह तो ख़त्म हो गयी.

मैं तो रात में नेपालियों को लेने के लिए चली गई थी और अपनी गौशाला में नहीं गई थी. मेरी सास उधर के मकान में रहती थी और वह भी दब गयी थी अन्दर. मेरी सास मुझ पर चिल्ला रही थी कि तू कहां भाग रही है, भैंस दब गयी है और तू गौशाला में जा. पर मैं नहीं गयी. मेरा ध्यान तो इस ओर था कि पूरा गांव दब गया है और इसे बचाना है.

अगले दिन यहां सबने टैण्ट निकाले और पूरे गांववाले एक जगह पर इकठ्ठा हो गए. सब इस बात पर सहमत थे कि सब एक जगह पर साथ में रहेंगे--मरेंगे तो सब एक साथ, जीएंगे तो सब एक जगह पर. सारी चारपाइयां एक जगह पर लगाई गयीं. कोई चारपाई पर रहा तो कोई ज़मीन पर. एक-डेढ महीने तक सब इसी तरह से चलता रहा. फिर इन्हीं दो महीनों के दरमियान बाहर से लोग आए और किसी ने बिस्कुट दिए तो किसी ने राशन. फिर सीडीआई वालों ने हमारे लिए टिन-छत की व्यवस्था की. जितनी जैसी जगह थी उस हिसाब से टिन वाले कमरे बनाए.

फिर खाना अलग अलग बनने लगा पर जब घटना आ जाती है तो किसका ध्यान रहता है किसी पर. शरीर तो खराब हो जाता है न. ऐसे में किसी ने बनाया, किसी ने नहीं बनाया. किसी का परिवार छोटा था, किसी का बड़ा.

 

यहां तो धूप आगे से निकलती है पर मेरे तो पीछे से निकल रही है लेकिन करूं तो क्या करूं. पहले के लोग तो वैसे भी भुन्नु-बुध्दु थे.

जहां तक उस रात की बात है जब भूकम्प आया था तो मैं खुद नहीं जानती कि मेरे मन में यह भाव कैसे जगा कि मैं जाऊं सबको बचाने. यह तक ध्यान में नहीं आ सका कि मेरा भी बच्चा है, गौशाला है जिसमें भैंस है जो मर गई थी. जब पूरा गांव मर रहा था तो एक (अपने) बच्चे की ओर ध्यान ही नहीं गया.


हो सकता है कि मेरा स्वभाव ही ऐसा हो--मुझे नहीं मालूम.

इस बात का तो खैर बहुत फ़र्क़ पड़ता ही है कि मैं अकेली हूं और मेरा कोई मरद नहीं है. इतना तो महसूस होता ही रहा है कि जिनके मरद रहे उन्होंने तो अपना सब कर करा लिया पर हम तो वैसे ही रहे, हमारा तो कोई नहीं रहा. मेरे लिए तो मेरा ईश्वर ही है और उसी से यह प्रार्थना कर रखी है कि मेरा तो तू ही है-तू ही है जो हमें मार रहा है और तू ही है जो हमें रखेगा. यहां तो धूप आगे से निकलती है पर मेरे तो पीछे से निकल गयी/रही है लेकिन करूं तो क्या करूं. पहले के लोग तो वैसे भी भुन्नु-बुध्दु थे. कुछ जानते-समझते नहीं थे, कुछ ऐसा दुनियादारी का होश नहीं था पर अब तो लोगों को देखकर हमको भी थोड़ा बहुत ज्ञान आ गया है कि क्या होता है, क्या नहीं होता.

उन दिनों गांव-प्रधान ने भाई-बंदी की थी. जिनका बोलनेवाला था और जो घर में थे उनका मकान बनवाया पर जिनका बोलनेवाला नहीं था-मरद नहीं था-उनके लिए कुछ नहीं किया. पूरे गांव वालों का पाखानाघर बना पर मेरा नहीं बना. अब जो पाखानाघर है उसके लिए भी मैंने दस हज़ार रूपये दिए थे. क्योंकि मेरे यहां कोई मरद नहीं रहा, इसलिए ऐसा हुआ.

जब पूरे गांव में मकान बन गये तब वे लोग मेरे यहां आए लेकिन जिस दिन वे आए उस रोज मैं बीमार थी और रूद्र प्रयाग गई हुई थी. वहां मेरा ऑपरेशन हुआ था और आठ-दस दिन बाद जब लौटी तब तक वे यहां से छोड़ कर चले गये थे.

जिन गांव वालों को मैंने अपनी जान जोखम में डाल कर बचाया, उनमें से कोई भी मेरी मदद के लिए नहीं आया. सब स्वार्थी निकले. तब भी मैं तो यही सोचती हूं कि चाहे किसी ने कुछ भी किया हो मैं दिल में रखने वाली नहीं हूं. जब स्वयं ईश्वर ही हमारी ऐसी कठिन परीक्षा ले रहा है तो किसी का बुरा क्या करना या कहना. हां, कभी कभी बुरा तो लगता है पर करने वाला तो वह ऊपरवाला ही है.


जारी...
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.09.2008, 13.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

parashar Gaur (parashargaur@yahoo.com) Canada

 
 पीयूष दईया की इस रिपार्ट ने मेरे अंदर के मानव को झकझोर कर रख दिया. एक और अपने हित कि चिंता न करते हुए बिना स्वार्थ के यशोधरा ने पुरे गोंउ को बच्चा डाला ! लकिन जब उस पर दुखूओ का पहाड़ टूटा तो कोई आगे नही आया ! इस तरह कि हादसे कभी कहीं भी घट सकते है पर मानव कितना स्वार्थी हो गया इस रिपोर्ट में साफ़ झलकता है ! आदमी और उसके रिश्तों का जितना सटीक चित्रण पियूष ने बिना किसे लांग लपोड़ ( ये पहाडी शब्द है) कर के जो लिखा, वह अपने आप में एक उदहारण है.
-पराशर गौर, कनाडा
 
   
 

रवींद्र व्यास (ravindrasvyas@gmail.com) इंदौर

 
 मैं इसके पहले की कड़ियां पढ़ चुका था। यह कड़ी आज देखी। मुझे कहने दीजिए पीयूषजी की यह बहुत सटीक रिपोर्ट है। कहीं, कोई भी अतिरिक्त भावुकता नहीं, बनाव नहीं। बस वे अपने यशोदा के शब्दों को इस सलीके से रखते हैं कि उसमें यशोदा, उसके लोगों और उसकी जगह की त्रासदी खुद ब खुद बयां होती चली जाती है। यह पीयूषजी का कौशल ही नहीं, वह संवेदनशीलता और अचूक दृष्ठि भी है जिसकी वजह से यह रिपोर्ट इतनी मार्मिक बन सकी है। क्या इसके लिए उन्हें और रविवार को बधाई नहीं दी जाना चाहिए।  
   
 

vinod (dongre.vinod@gmail.com) raipur

 
 as a journalist i learnt many thigs from this report. cogrates a lot to RAVIWAR.COM 
   
 

Biju toppo (biju.toppo@gmail.com) Delhi

 
 इस तरह की मौलिक रिपोर्ट का घोर अभाव है. आपलोग जिस तरह से गांवों को सामने ला रहे हैं, वह इस कोहरे वाले समय में भी आश्वस्ति का भाव पैदा करता है. कहीं गहरे तक यह भाव जागता है कि अभी भी सच्ची पत्रकारिता जिंदा है. पीयूष दईया जी अब साहित्य से इतर पत्रकारिता में अपने को अगर रमा रहे हैं तो हमें ये मान कर चलना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता को भी कुछ बेहतर हासिल होगा. मेरी बधाई लें. 
   
 

Priyanka Paliwal Patna

 
 यशोदा जी ने जिस हौसले के साथ अपना फर्ज निभाया है, उस हौसले को सलाम करती हूं. यह तो हमारे समाज के नियम हैं कि वह कृतघ्नता दिखाने में जरा भी देरी नहीं करता. 
   

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