इंग्मार बर्गमॅनः स्क्रीन को बेधती आंखें
फ़िल्म
इंग्मार बर्गमॅनः
स्क्रीन को बेधती उदास आंखें
दिनेश श्रीनेत
विश्व के महानतम निर्देशकों मे से एक इंग्मार बर्गमॅन के निधन के एक बरस बाद उनकी
कुछ उदास (और एक कॉमेडी भी) फिल्मों को देखना एक असाधारण अनुभव है. पिछले दिनों कुछ
श्वेत-श्याम फिल्मों के जरिए उन्हें याद किया गया.
शायद इन फिल्मों के जरिए आप बर्गमॅन की उदासी से फिर रू-ब-रू होते हैं. स्वीडेन के
दूतावास और पालाडोर पिक्चर्स के सौजन्य से ये फिल्में दिल्ली, चेन्नई, बंगलौर और
मुंबई समेत देश के छह प्रमुख शहरों में दिखाई गईं और सिनेमा प्रेमियों ने खासा
उत्साह भी दिखाया.
खास
बात यह थी कि 'वाइल्ड स्ट्राबेरीज़' को छोड़ दें तो इस बार के चयन में उनकी कुछ कम
चर्चित मगर अहम फिल्में शामिल थीं. मसलन 'समर विथ मोनिका' जिसके बारे में आयोजक
पॉलाडोर पिक्चर्स के सत्येन की टिप्पणी थी, "यह बर्गमॅन के बर्गमॅन बनने से पहले की
फिल्म है..."
हफ्ते भर के इस आयोजन में उनकी सात प्रमुख फिल्में दिखाई गईं. यदि आप बर्गमॅन से कभी
रू-ब-रू नहीं हुए हैं तो शायद इन फिल्मों के जरिए आप खुद को हर रोज इस महान
निर्देशक के करीब- और करीब जाता महसूस करेंगे.
इन
फिल्मों के बहाने यह समझना दिलचस्प होगा कि किस तरह न सिर्फ सिनेमा बल्कि रंगमंच,
रेडियो और लेखन से जुड़े बर्गमॅन सिनेमा को एक सर्वथा भिन्न अनुभव में बदल देते
हैं. 'रिमेंबरिंग बर्गमॅनः ए रेट्रास्पेक्टिव' के नाम से हुए इस आयोजन में दिखाई गई
फिल्में बर्गमॅन के सिनेमा की इस खूबी को समझने की कुंजी भी बनते हैं.
बर्गमॅन की उदासी दर्शकों पर गहरा असर करती है, मगर इस असर को आप फिल्म के नैरेशन
में नहीं तलाश सकते. नैरेशन के स्तर पर बर्गमॅन सतह पर सरल संचरना वाले एक जटिल
फिल्मकार हैं. इसके लिए फेस्टिवल में दिखाई गई दो ही फिल्मों का उदाहरण काफी है, 'समर
इंटरल्यूड' और 'समर विथ मोनिका'..... दोनों ही फिल्में नदी से बहते जीवन, बिछोह और
प्रेम के इर्द-गिर्द घूमती हैं.
फिल्म खत्म होने पर जब आप इन्हें दोबारा याद करते हैं तो तमाम मामूली लगने वाली बातों
के भी मतलब सामने आऩे लगते हैं. फिल्म सिर्फ स्क्रीन पर चल रहा रोशनी का खेल बनकर
नहीं रह जाती बल्कि वह उसे बेधती हुई आपके अनुभव का एक हिस्सा बन जाती है.
शायद यही वजह है कि बर्गमॅन की फिल्मों में प्रकृति सिर्फ श्वेत-श्याम छवियों में
कैद होकर नहीं रह जाती. उनकी फिल्मों की चांदनी, समुद्र, बादल, हवाएं आपको याद रह
जाते हैं. गर्मियों की खूबसूरत रात में 'समर इंटरल्यूड' की ऑपेरा डांसर के संशय और
उसके प्रेमी की दुर्घटना और फिर इन सबका स्मृति बनकर रह जाना, आपके मन में अंकित
होता चला जाता है.
ठीक
उसी तरह जैसे आप 'समर विथ मोनिका' में एक नौजवान जोड़े के साथ शहर, ऊंचे-ऊंचे पुल
और जहाजों को पीछे छोड़ते हुए निर्जन चट्टानों, हवा से हिलती जंगली घास और धूप के
बीच उनकी बेफिक्री का हिस्सा बनते चले जाते हैं. फिल्म में मोनिका का किरदार निभाने
वाली अभिनेत्री का वह नग्न दृश्य भी उसी बेफिक्री को दर्शाता है, जो उस समय काफी
विवादास्पद माना गया था.
'समर विथ मोनिका' में धीरे-धीरे यह आजादी असुरक्षा से जुड़े एक डरावने अनुभव में
बदलने लगती है और कभी अपनी गैर-रूमानी जिंदगी से उकताया यह जोड़ा शहर लौटने का फैसला
कर लेता है. फिल्म का नायक नौकरी करने लगता है और गर्भवती मोनिका एक बच्ची को जन्म
देती है.
जब
मोनिका का युवा प्रेमी अपनी बच्ची को देखता है तो उसके असमंजस भरे उदास चेहरे का
लंबा क्लोज-अप लेकर बर्गमॅन अपने खास तकनीकी कौशल से इसे आम दर्शक के लिए एक अनुभव
में बदल देते हैं. वास्तविकता से कतराने वाली मोनिका को न अपनी बच्ची में दिलचस्पी
है न परिवार में. एक दिन वह बार में अपने पुराने प्रेमी के पास लौट जाती है.
यहां हमें सिने इतिहास के कुछ सबसे शानदार शॉट्स में से एक मोनिका का लंबा क्लोज-अप
देखने को मिलता है. उसकी निगाहें सीधे कैमरे की तरफ हैं यानी निगाहें सक्रीन को
बेधती हुई सीधे दर्शकों से मुखातिब हैं और गोदार के शब्दों में उन आंखों में 'अनिश्चय
के बादल' मंडरा रहे हैं.
एक
कड़वाहट भरे झगड़े के बाद मोनिका घर छोड़कर चली जाती है. फिल्म के अंत मे नायक अपनी
बच्ची को गोद में लिए कॉफी हाउस के उसी आइऩे के सामने खड़ा नजर आता है, जहां हमने
उसे फिल्म के आरंभ में देखा था.
'रिमेंबरिंग बर्गमॅनः ए रेट्रास्पेक्टिव' में क्लासिक का दर्जा पा चुकी, मृत्यु,
जीवन और अकेलेपन का विमर्श रचती उनकी फिल्म 'वाइल्ड स्ट्राबेरीज़' का भी प्रदर्शन
हुआ. यह एक उम्र-दराज़ इंसान के सफर, उसके दुःस्वप्नों और जीवन का अर्थ तलाशने की
बेचैनी को दर्शाती है. फिल्म में स्मृतियों और स्वप्नों को अविस्मरणीय ढंग से
फिल्माया गया है.
दर्शक वास्तविकता को फिल्म के मुख्य पात्र के नजरिए से देखता है. इसके जरिए हम उस
यथार्थ को समझ पाते हैं जो स्मृतियों, अनसुलझे सवालों, रिश्तों के द्वंद्व में फंसा
हुआ है. सफर के दौरान आने वाले पड़ाव मानों रंगमंच बन जाते हैं और वहां स्मृति
दोबारा जिंदगी के उसी नाटक की पुनर्रचना करती है, मगर इस बार नाटक का पात्र उन्हीं
के बीच एक आउटसाइडर की तरह खड़ा है.
बर्गमॅन की फिल्में अक्सर बिना किसी निष्कर्ष के खत्म होती नजर आती हैं. वे आपको
बहुत सारे सवालों के साथ छोडती हैं. बर्गमॅन का सिनेमा स्क्रीन के इस तरह और उस तरफ
के फासले को मिटा देता है. स्क्रीन को बेधती सवालिया निगाहें आपका पीछा करती रहती
हैं.
24.09.2008,
18.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित