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वरवरा राव से रेयाज-उल-हक की बातचीत

संवाद

 

नेपाल के संकेत अच्छे नहीं हैं

 

नक्सली कवि वरवर राव से रेयाज़-उल-हक़ की बातचीत

 


उन्हें अपने को माओवादी कहे जाने पर आपत्ति है. वे खुद को नक्सली कवि कहलाना पसंद करते हैं. नक्सलियों से बातचीत के लिए सरकार उन्हें मध्यस्थ बनाती है और फिर उनके ही संगठन को 'विरसम' को नक्सली संगठन बता कर उस पर प्रतिबंध लगा देती है. नक्सली होने के आरोप में जाने कितनी-कितनी बार उन्हें जेल जाना पड़ा है. लेकिन क्रांतिकारी कवि कहे जाने वाले दो टूक बातें करते हैं. वे मानते हैं कि ख़ून से रंगे हाथों की बातें, ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर, कही जाती हैं.
यहां प्रस्तुत है वरवर राव से की गई बातचीत के अंश.

 

 

वरवर राव VARVARA RAO

1959 के बाद सीपीआई-सीपीएम ने संसदीय राजनीति को स्वीकार कर लिया. वे अब समाजवादी सुधारों की कोई कोशिश नहीं करते.

लैटिन अमरीका, दक्षिण एशिया और तीसरी दुनिया के अन्य देशों में चल रहे प्रतिरोध आंदोलनों की पृष्ठभूमि में भारतीय जनता के संघर्षों की दशा और दिशा के बारे में आपका क्या नजरिया है? खास कर नेपाल में जो हालिया परिवर्तन हुए हैं और वहां से जो संदेश बार-बार भारत के माओवादियों को दिये गये हैं, उनकी जमीन कितनी ठोस है?

 

भारत में और खास कर छत्तीसगढ में चल रहे संघर्षों की जो दिशा है-क्रांतिकारी संघर्ष से नवजनवादी क्रांति की ओर बढने के लिए यही दिशा ठीक रहेगी. इसी से सामंतवाद, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के दलालों को खत्म किया जा सकता है और उनका प्रतिरोध किया जा सकता है.

जैसे चीन की नवजनवादी क्रांति के सिद्धांत को माओ ने आगे बढाया, उस दर्शन से जो संघर्ष चल रहा है, उसे हम भारत में छत्तीसगढ और झारखंड में देख रहे हैं. नक्सलबाडी का जो पथ है, उसकी दिशा वही है. हालांकि नक्सलबाडी से पहले भी यह दिशा मौजूद रही है.

ऐतिहासिक तौर पर भी नक्सलबाडी की दिशा सही साबित होती है. 1973 में चिली में अलेंदे की सरकार आयी. सभी मार्क्सवादी और जनपक्षधर लोग सत्ता में चुनाव के जरिये आये. सबने जनता से कहा और वादा किया कि वे संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करेंगे. उन्होंने कोशिश भी की, लेकिन पिनोशे के नेतृत्व में हुए तख्तापलट में उस सरकार को खत्म कर दिया गया.

इसलिए अगर सत्ता में आकर, एक बने-बनाये ढांचे में आकर किसी तरह के परिवर्तन की कोशिश करेंगे तो असफल रहेंगे-यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध हो चुका है. भारत में भी हम इसके उदाहरण देखते हैं.

1959 में नंबूदरीपाद की सरकार केरल में बनी. उन्होंने तब भूमि सुधार जैसी कोई बडी कोशिश नहीं की. उन्होंने सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की कोशिश की. जो निजी ईसाई शिक्षा संगठन थे, उनका सरकारीकरण कर दिया. शासकवर्ग उसे भी बरदाश्त नहीं कर पाया. उस सरकार को हटा दिया गया और वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. इस तरह हम देश में नंबूदरीपाद का और विश्व स्तर पर अलेंदे का उदाहरण पाते हैं, जिन्होंने एक बने बनाये सत्ता तंत्र को, शासन के ढांचे को स्वीकार कर लिया और उसी के जरिये बदलाव की कोशिश की. वे असफल रहे.

यहीं पर यह सवाल हो सकता है कि सीपीएम बंगाल में और केरल में क्यों बनी हुई है? असल में 1959 के बाद सीपीआई-सीपीएम ने संसदीय राजनीति को स्वीकार कर लिया. वे अब समाजवादी सुधारों की कोई कोशिश नहीं करते.


थोड़ा पीछे जायें तो कुछ मुद्दों पर सभी राजनीतिक पार्टियों की सहमति होती थी. उनमें यह सहमति थी कि देश में अलग-अलग राष्ट्रीयताएं हैं तो राज्यों का एक फेडरल स्ट्रक्चर हो तथा भाषा और राष्ट्रीयताओं को उन्नतिशील स्थान मिलना चाहिए. चाहे नंबूदिरीपाद हों या आनंदपुर साहिब या शेख अबदुल्ला सभी डिफेंस, करेंसी, रेलवे और विदेश मामलों को छोड कर राज्यों की अपनी स्वायत्तताओं के समर्थक थे.

पर आज तो देखने भर के लिए एक संघीय ढांचा है. अब केंद्रीयकृत संरचना मजबूत हुई है. 1991 के बाद राज्यों ने संघीय ढांचे का दुरुपयोग करना शुरू किया. वे अब इसको आड़ बना कर खुद ही विदेशों से एमओयू कर रहे हैं. अब राज्यों के मुख्यमंत्री अमरीका जाते हैं और एमओयू साइन करके आते हैं. वे अमरीका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलालों के रूप में स्थापित हुए हैं.

लैटिन अमरीका के पांच-छह देशों में साम्राज्यवाद विरोधी सरकारें तो आयी हैं-वेनेजुएला और बोलीविया में सरकारें प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करने का एलान कर रही हैं. अब देखना यह है कि यह सब कहां तक टिकेगा. एक साम्राज्यवाद विरोधी शक्ति के रूप में जाने जानेवाले फिदेल कास्त्रो भी अब ग्लोबलाइजेशन की तरफ जा रहे हैं. इसी तरह ब्राजिल के लूला डिसिल्वा के बारे में भी सुना था. लेकिन 2004 में सुना कि वे भी वैश्वीकरण की ओर जा रहे हैं.

नेपाल इससे अधिक नजदीक का उदाहरण है. 1995 में नवजनवादी क्रांति के लिए वहां नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में माओवादी आंदोलन शुरू हुआ. इस बीच 2001 में राजपरिवार हत्याकांड के बाद जनता में राजतंत्र विरोधी उभार आया. इस उभार को नेतृत्व देते हुए माओवादी पार्टी ने आंदोलन चलाया. दूसरे दलों के साथ मिल कर उसने राजतंत्र के खत्म किया और हाल के चुनावों में वह विजयी रही.

लेकिन जनयुद्ध के इन वर्षों में जिन 16 हजार लोगों ने कुरबानी दी, वह सिर्फ राजतंत्र को खत्म करने के लिए नहीं थी. जब यह जनयुद्ध शुरू हुआ था, तो वह नवजनवादी क्रांति के लिए था. तब उन दिनों नेपाल का राजा वीरेंद्र उस तरह का शत्रु नहीं था, जिस तरह हत्याकांड के बाद आया राजा ज्ञानेंद्र था. लेकिन बाद में यह जनयुद्ध सिर्फ राजतंत्र के खात्मे तक ही सिमट कर रह गया. नवजनवादी क्रांति सिर्फ राजतंत्र हटाने के लिए नहीं होती, वह सत्ता को वर्किंग क्लास के हाथों में लाने के लिए होती है.

लेकिन नेपाल की स्थितियां जो हैं, उन्हें देखते हुए जल्दी ही कोई निर्णय देना आसान नहीं है. नेपाल में क्रांति करना बडी बात नहीं है, उसे निभाना बडी बात है. नेपाल के एक तरफ चीन है, जो क्रांति का समर्थक नहीं है. दूसरी तरफ भारत है, जो अमरीका के लिए क्रांति को खत्म भी कर सकता है. ज्ञानेंद्र के बाद राजतंत्र बडा मुद्दा बन गया. इस संदर्भ में वहां एक सवाल यह भी था कि क्या इसमें भारत की मदद ली जा सकती है.

नेपाल में क्या हो रहा है, इसे यहां से नहीं जान सकते. इसलिए उस पर कुछ कह भी नहीं सकते. लेकिन नेपाल को लेकर भारत में जो कुछ हो रहा है, सीपीएम और कांग्रेस जिस तरह की प्रतिक्रियाएं दे रही हैं और उनकी जो गतिविधियां हैं, उनके आधार पर इस पूरी प्रक्रिया पर शक पैदा होता है. नेपाल में नेकपा (माओवादी) जो कर रही है, उसकी कांग्रेस-सीपीएम के बीच स्वीकार्यता संदेह पैदा करती है.

ऐतिहासिक तौर पर भी कई संदेह पैदा होते हैं. नेपाल में आज जो हो रहा है, तेलंगाना में 60 साल पहले वह सब हो चुका है. वहां निजाम के खिलाफ संघर्ष हुआ और चूंकि नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी, इसलिए वहां जमीन का सवाल भी संघर्ष से जुडा. तीन हजार गांवों में 10 लाख एकड से अधिक जमीन पर कब्जा किया गया.

उस संघर्ष की जो दिशा थी, लगता था कि वह लाल राज्य की ओर जा रहे थे. लेकिन फिर वहां मिलिटरी एक्शन हुआ और इसके बाद चुनाव हुए. कम्युनिस्ट पार्टी ने पीडीएफआइ के नाम से चुनाव लडा. उसको 96 में 48 सीटें आयीं. निजाम गया, कम्युनिस्ट पार्टी को बहुमत मिला. लेकिन मराठवाडा में कांग्रेस को बहुमत मिल गया और इस तरह वह सत्ता में आयी. कम्युनिस्ट पार्टी को सत्ता में नहीं आने दिया गया. आज जो नेपाली माओवादी बोल रहे हैं, वह तेलंगाना में 60 साल पहले हो चुका है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sugandha Mishra Delhi

 
 वरवरा राव ने जो मुद्दे उठाए हैं, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं. उन पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है. 
   
 

श्रीकांत दिल्ली

 
 वरवर राव चाहे जो कुछ कहें लेकिन उनके माओवादी मित्रों ने छत्तीसगढ़ में जिस तरह से उत्पात मचाया है, उसमें उनके निशाने पर केवल औऱ केवल आदिवासी हैं. जिन्हें वे वर्ग शत्रु बताते हैं, उनसे तो लेवी वसूल कर माओवादी दावत उड़ा रहे हैं. आंकड़े उठा कर देखें वरवर साहब तो उन्हें अफने साथियों की हरकतों पर शर्म आ जाएगी. 
   
 

Kumar suresh Delhi

 
 Prachand is the real face of maoist movement. remember his interview with Varadrajan-" we decided that when we are in power, the whole team of our leadership will not be part of day-to-day power. Not just me but our team. Dr. Baburam Bhattarai, Badal, Mohra, others, we have a leadership team which arose from the midst of the struggle. When we go to Kathmandu, we will not be involved in power struggles or day-to-day power. That will be for the new generation, and we will train that generation. This is a more scientific approach to the question of leadership. If we don't do this, then we will have a situation where as long as Stalin is alive, revolution is alive, as long as Mao is alive, revolution is alive.
This will be a big sacrifice for our leadership. Of course it does not mean we will be inactive or retire from politics. Our leadership team will go into statesmanship. We are hoping that by doing this we will solve a very big ideological problem of the communist movement. This is not only a technical question but a big ideological question. There can be no question of concentrating power in the hands of any individual or group. When we placed this resolution before the plenum, then our entire leadership team gained confidence in themselves, the movement and the line. Our unity has become much stronger. Now we are in an offensive mood."
And what he is doing now ? Shame prachand....Shame....!
 
   

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