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अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!

मुद्दा

 

अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!

सचिन कुमार जैन


मैं पिछले 3 महीनों से मध्यप्रदेश में एक सरकारी विज्ञापन देख रहा हूँ, जिस पर लिखा है-“एक दिन की मजदूरी में पूरे महीने का राशन”. यह मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री अन्नपूर्ण योजना का विज्ञापन है. इसमें सरकार ने गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को 1 रूपए किलो गेहूं और 2 रूपए किलो चावल देने वाला कार्यक्रम शुरू किया है.

मध्यप्रदेश में राशन

माफ कीजियेगा; कोई कार्यक्रम शुरू नहीं किया है बल्कि पहले से चल रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी सस्ते राशन की दुकान वाली योजना में कुछ फेरबदल किया है. फेरबदल यह है कि दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार गरीबों को 5 रूपए किलो गेहूं और 6.50 रूपए किलो चावल देती है, भोपाल में बैठी मध्यप्रदेश सरकार ने इस राशि को कम करके 1 रूपए और 2 रूपए कर दिया. यानी लोगों को राहत मिली; पर क्या इसे अधिकार माना जाएगा?
हमारा राज्य भोजन के अधिकार को भोजन की खैरात में तब्दील कर रहा है, जिसमें जरूरत पूरी करने के लिए व्यावस्था नहीं बनायी जाती, बल्कि सरकार अपनी सहूलियत और आत्ममुग्धता के आधार पर व्यवस्था बनाती है. सवाल यह भी है कि क्या मध्यप्रदेश में सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी से जूझ रही 89 प्रतिशत जनसँख्या को पोषण (सम्मानजनक जीवन के लिए भोजन का पोषण युक्त होना जरूरी है) का अधिकार मिल पायेगा? केवल गेहूं और चावल से कुपोषण तो मिटेगा नहीं, तब सरकार पोषण आहार के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के पक्ष में खड़ी हो जायेगी.

मध्यप्रदेश सरकार के भोजन के अधिकार के इस दावे और 10 जून 2013 को भोपाल में जारी हुए जनगणना के नए आंकड़ों के बीच के संबंधों को भी देखिये. वर्ष 2001 में कुल कार्यशील जनसँख्या में से 42.8 प्रतिशत लोग कृषक थे. यह संख्या 2011 में घट कर 31.2 प्रतिशत पर आ गई. अब सवाल यह कि ये 11 प्रतिशत किसान कहाँ गए? वर्ष 2001 में कुल कार्यशील जनसँख्या में से 28.7 प्रतिशत लोग खेतिहर मजदूर थे, जो 2011 में बढ़ कर 38.6 प्रतिशत हो गए. किसान खेत के मालिक से खेत का मजदूर बन रहा है और मध्यप्रदेश सरकार इसकी क्षतिपूर्ति राशन की कीमत कम करके करने की कोशिश में जुटी हुई है.

मैं कुछ सवालों के जवाब दे देना चाहता हूँ. पहला तो यह कि मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना में महज 20 किलो गेहूं और चावल मिलता है; यानी एक सदस्य को एक दिन के लिए 133 ग्राम गेहूं. इससे 4 रोटियां बनती हैं. क्या 4 रोटियों से एक परिवार को भूख और पोषण की कमी से मुक्त किया जा सकता है? भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मुताबिक भारत की परिस्थितियों में एक वयस्क को प्रतिदिन 466 ग्राम अनाज खाने को मिलना चाहिए. मध्यप्रदेश सरकार इस जरूरत का एक तिहाई से भी कम दे रही है; पर विज्ञापन कहता है एक दिन की मजदूरी में पूरे दिन का राशन दे रही है सरकार!

दूसरी बात यह कि घर के राशन का मतलब केवल गेहूं, चावल और नमक नहीं होता है. भारत सरकार लगातार इस तथ्य की उपेक्षा करती रही है कि कुपोषण से मुक्ति के लिए अनाज की मात्रा को बढाते हुए सस्ते राशन के कार्यक्रम में दालों और खाने के तेल को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार के अमानवीय रवैय्ये के सन्दर्भ में मध्यप्रदेश की योजना में इन दोनों वस्तुओं का समावेश करके जनोन्मुखी राजनीति का उदाहरण पेश कर सकती थी मध्यप्रदेश सरकार; पर ऐसा नहीं किया गया.

जबकि दावा यह किया जा रहा है कि दालों और तिलहन के उत्पादन के मामले में हमारा राज्य देश में सबसे ऊपर है. वर्ष 2012 में राज्य की कृषि विकास दर 18 प्रतिशत रही; खेती के विकास में केवल गेंहू और चावल का ही योगदान नहीं रहा है. खेती का परिणाममूलक विकास उसे माना जाएगा जो भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने में सीधी भूमिका निभाए.

तीसरी बात जो सबको जान लेना चाहिए कि मध्यप्रदेश सरकार सस्ते राशन की कीमत को और कम क्यों कर रही है; जबकि वास्तव में उसे हर परिवार को मिलने वाली अनाज की मात्रा को बढ़ाना चाहिए था. पीडीएस के तहत हर गरीब (इसका अब तक सही आंकलन नहीं हुआ है कि कौन गरीब है और किन आधारों पर) परिवार को 35 किलो राशन दिया जाएगा, पर मध्यप्रदेश में 20 किलो अनाज ही दिया जाता है.

कारण यह है कि भारत सरकार 42 लाख परिवारों को ही गरीब मान कर 35 किलो राशन देती है, जबकि मध्यप्रदेश में 70 लाख परिवार गरीबी की रेखा में दर्ज हैं, इसलिए सबको 35 किलो अनाज देने के बजाये वह 20-20 किलो का प्रावधान करके कार्यक्रम चला रही है. यह सर्वोच्च न्यायलय के आदेश (2008) का उल्लंघन भी है. मध्यप्रदेश सरकार कीमत कम करने में राज्य सरकार के जिन संसाधनों का उपयोग कर रही है उसका उपयोग मात्रा को बढाने में किया जा सकता था.

यदि पीडीएस में 35 किलो अनाज 5 रूपए के मान से भी दिया जाता तो 175 रूपए खर्च होते; अभी की स्थिति में लोगों को 16 रूपए के मान से 15 किलो अनाज खरीदने में (पीडीएस से एक रूपए किलो और बाज़ार की खरीदी मिला कर) 260 रूपए खर्च करना पड़ रहे हैं. गरीबी की रेखा का जाल मध्यप्रदेश में अब भी 30 लाख लोगों की गर्दन फंसाए रखेगा. जिन आधारों पर यह रेखा खींची जाती है, वह रेखा वास्तव में भुखमरी की कगार पर रहने वाले नागरिकों की पहचान के लिए ही उपयुक्त है.

वर्ष 2009 से गरीबी के नए मापदंडों और गरीबों की पहचान के तरीकों पर काम होना शुरू हुआ. 3 समितियां बनीं. अंततः योजना आयोग की दुराचारों की वजह से गरीबी की रेखा विवाद में फँसी और गरीब भूख के जाल में. यह मामला लोगों को केवल सस्ते राशन से ही वंचित नहीं करता है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के हकों से भी दूर हटाता है. यानी लोग वंचितपन के दुष्चक्र में फंसते हैं और फंसे रह जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि सरकार को ये सारे गणित पता नहीं है; गणित पर राजनीति का शासन है. कीमत कम करने से मध्यप्रदेश सरकार यह दावा कर सकती है कि राज्य सरकार यह योजना चला रही है; और यदि वह अपने संसाधन जोड़ कर भी 5 रूपए किलो के मान से 35 किलो अनाज देती रहेगी तो वह लोगों के बीच जाकर या अखबारों में मंहगे विज्ञापन देकर यह नहीं कह सकती थी कि उसने कोई नया काम किया है; क्योंकि यह योजना तो पहले से चल रही है और यदि किसी विसंगति को दूर करने के लिए उसने कोई अतिरिक्त संसाधन खर्च किये भी तो यह उसका प्रशासकीय उत्तरदायित्व बनता. यह प्रकरण बहुत साफ़ है, सरकार अपनी योजना इस आधार पर बनाती है कि एक अच्छा राजनीतिक नारा कैसे बन सकता है; बस इससे ज्यादा कुछ और नहीं.

14.06.2013, 13.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

प्रमोद कुमार [kumar.pramod547@gmail.com] झांसी (यूपी) - 2014-05-30 12:17:01

 
  सचिन जी आपका लेख वाकई काबिले तारीफ है, लेकिन आपने इस लेख में एक तथ्य दिया है कि वर्ष 2001 में कुल कार्यशील जनसँख्या में से 42.8 प्रतिशत लोग कृषक थे. यह संख्या 2011 में घट कर 31.2 प्रतिशत पर आ गई. अब सवाल यह कि ये 11 प्रतिशत किसान कहाँ गए...आपके इस सवाल का जबाव केवल सरकार के पास नहीं बल्कि आपके और हमारे पास भी है...क्योंकि एकल परिवार और आलीशान घरों में रहने की हमारी प्रवृ्त्ति ने खेतों को कंकरीट के जंगलों में तब्दील कर दिया है..हो सकता है आपने या आपके परिवार ने भी कहीं घर बनवाया हो..जरा पता कीजिए कहीं वहां पहले कोई किसान खेती तो नहीं करता था... 
   
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