लूज कैरेक्टर का बिहार
लूज कैरेक्टर का बिहार
दिनकर कुमार
मिथिलांचल से लौटकर
उत्तर बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर मैं उस रेलगाड़ी में सवार था. जब गाड़ी आगे बढ़ी
तो बीच में ही चेन पुलिंग हो गई. दूधवाले और सब्जी वाले अपने-अपना सामान लेकर चढ़
गए. फिर रेलगाड़ी चलने लगी. आगे बढ़ने पर किसी ने वैक्यूम खोल दिया. हांफती हुई
रेलगाड़ी फिर ठिठक गई. फिर सामानों को लादने का वही सिलसिला शुरु हुआ. मुझे चिंता
हुई कि क्या समय पर मैं अपनी मंजिल तक पहुंच पाऊंगा ?
डिब्बे में मेरे सामने एक अधेड़ महिला अपनी युवा बेटी के साथ बैठी थी. उसमे मेरी
तरफ मुखातिब होते हुए कहा- यह लूज कैरेक्टर ट्रेन है. कभी भी समय पर नहीं चलती.
मैं भौंचक हो कर उस महिला की तरफ देखने लगा, जो सहज हो कर चेन पुलिंग और वैक्यूम
खोलने की वजह से हो रही देर को स्वीकार कर रही थी. वह डिब्बे में गर्मी की वजह से
रो रहे किसी मुसाफिर के बच्चे को अपने थरमस से पानी उड़ेलकर पिला रही थी तो कभी
रोचक प्रसंग सुनाकर डिब्बे के भीतर पसरी उदासी को दूर कर रही थी.
उसने एक ढ़ेलफोड़वा गोसाईं का किस्सा बताया कि किस तरह एक भगवान हैं, जिन पर लोग
ढ़ेले बरसाकर उनकी आराधना करते हैं और इसी वजह से उनका नाम भी ढेलफोड़वा गोसाईं है.
ऐसी असहज परिस्थिति में भी उस महिला को सहज होकर हास्यरस बिखेरते हुए देख मैं
प्रभावित हुआ. यही खासियत है बिहार के लोगों की. अपने आप पर हंसने के लिए साहस की
जरुरत होती है. विषम परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखने के लिए तीव्र मानसिक
शक्ति की जरुरत होती है.
बाहर जाने वाले
मेरी मुलाकात राजेश चतुर्वेदी से हुई. मोकामा के रहने वाले हैं और कोलकाता के एक
बैंक में राजभाषा अधिकारी हैं. उन्होंने कहा-बिहार के पिछड़ेपन के लिए बिहार के
लोग ही दोषी हैं. वे जब कमाने के बिहार से बाहर निकलते हैं तो वापस लौटना भूल जाते
हैं. महानगरों में ही घर बसाकर बिहार को भूल जाते हैं. अन्य प्रांतों के लोगों में
ऐसी बात देखी नहीं जाती. बंगाल या उड़ीसा का आदमी नौकरी भले ही किसी अन्य प्रदेश
में करेगा लेकिन अपना स्थायी मकान अपने गृह राज्य में ही बनाएगा. बिहार के साथ ऐसी
बात नहीं है. बिहार को बदलने में जो लोग सक्षम हो सकते थे, वे बिहार का साथ छोड़
रहे हैं. यही वजह है कि बिहार की तकदीर में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है.
युद्ध जैसा पलायन
टाइम पत्रिका ने अपनी एक रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि किसी देश में युद्ध छिड़
जाने के बाद जिस पैमाने पर लोगों का पलायन होता है, उससे भी अधिक लोगों का पलायन
बिहार से होता रहा है. यानी युद्ध के बिना ही बिहार की हालत इस कदर नारकीय होती गई
है कि लोग जीवन और जीविका की सुरक्षा के लिए बिहार छोड़कर दूसरे प्रदेशों की ओर
भागते रहे हैं.
भले ही घोषणाओं के लिए मशहूर वर्तमान राज्य सरकार पलायन रुकने का दावा कर रही है और
राज्य के भीतर ही लोगों को रोजगार मुहैया कराने का दावा कर रही है मगर आज भी रेलवे
स्टेशनों पर बोरिया-बिस्तर बांध कर परदेस जाने वालों का हुजूम उसी तरह उमड़ता हुआ
दिखाई दे रहा है, जिस तरह पांच या दस साल पहले दिखाई देता था.
मिथिलांचल में स्थित ब्रह्मपुरा नामक अपने गांव में दस दिनों तक रहते हुए मुझे कई
तरह के अनुभव हुए.
सबसे पहले बात पलायन की. गांव में युवा वर्ग का सदस्य ढूंढ़ने से भी दिखाई नहीं
देता. सिर्फ वृद्ध, औऱतें और बच्चे बचे हुए हैं. ज्यादातर लोग दिल्ली, कोलकाता,
मुंबई आदि महानगरों में काम कर रहे हैं. उनमें से कई अपने पूरे परिवार को साथ लेकर
चले गए हैं. उनके घर बंद पड़े हैं. साल-दो साल पर वे लोग आते हैं, फिर चले जाते
हैं.
ऐसा मंजर सिर्फ ब्रह्मपुरा में ही नहीं दिखाई देता, ज्यादातर गांवों का यही हाल है.
वृद्दों, औरतों औऱ बच्चों की आबादी को देखते हुए अनायास ही मन में राहत शिविर या
अनाथ आश्रम का चित्र उभरने लगता है. लगता है कि मैं अभिशप्त भूमि में विचरण कर
रहा हूं.
ठहरा हुआ वक़्त
बिहार में समय फ्रीज हो गया है. ऐसा लगता है कि 1947 के बाद का वक्त बिहार में
आया ही नहीं. न सड़कें, न पुल, न बिजली, न स्वास्थ्य सुविधाएं. फिर भी लोग हैं कि
जिए जा रहे हैं.
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पंचायती राज व्यवस्था की कृपा से गांव के लिए
सौर ऊर्जा से जलने वाले पांच लैंप पोस्टों को आबंटित किया गया. चार लैंपपोस्ट
मुखिया जी बेचकर खा गए. एक लैंपपोस्ट लगाया गया. दो-चार दिन रोशनी भी हुई. फिर एक
दिन कोई लैंप पोस्ट की बैटरी चुराकर ले गया. |
मेरे गांव में सभी घरों में बिजली का कनेक्शन है. कभी-कभी गलती से बिजली आ जाती है.
उस समय ज्यादातर लोग दौड़ पड़ते हैं. सेलफोन यानी मोबाइल चार्ज करना लोगों का
एकमात्र उद्देश्य होता है. आधा घंटा या एक घंटा तक बिजली रहती है, फिर गायब हो जाती
है. लोग कहते हैं कि अब शायद 4 दिनों के बाद आएगी. बीच में कहीं पेड़-वेड़ गिर गया
तो एक हफ्ते का समय भी लग सकता है.
मैंने रेलगाड़ी में विवाह करके लौट रहे एक दूल्हे को कहते सुना कि दहेज में फ्रीज,
वाशिंग मशीन, फ्लैट टीवी...सब कुछ मिला है लेकिन इन चीजों का गांव में क्या उपयोग
होगा ? बिजली के बिना ये चीजें वहां डिब्बा बन कर पड़ी रहेंगी.
अंधेरे से लड़ने के लिए लोगों ने वैकल्पिक इंतजाम कर रखे हैं. हर गांव में कोई न
कोई व्यक्ति जेनरेटर की सहायता से शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक बिजली की आपूर्ति
करता है. दो बल्ब जलाइए और महीने भर का शुल्क 60 रुपए दीजिए.
मेरे गांव में यह व्यवस्था शुरु तो हुई थी मगर बीच में ही खत्म हो गई. दरअसल
आपूर्तिकर्ता की पत्नी के साथ झगड़ा होता रहता था और नाराज़ होकर पत्नी शाम सात बजे
ही जेनरेटर बंद कर देती थी. गांव के लोग अंधेरा छा जाने से नाराज़ होकर
आपूर्तिकर्ता की धुनाई कर डालते थे. इस तरह इस वैकल्पिक व्यवस्था का पतन हो गया.
पंचायती राज व्यवस्था की कृपा से गांव के लिए सौर ऊर्जा से जलने वाले पांच लैंप
पोस्टों को आबंटित किया गया. चार लैंपपोस्ट मुखिया जी बेचकर खा गए. एक लैंपपोस्ट
लगाया गया. दो-चार दिन रोशनी भी हुई. फिर एक दिन कोई लैंप पोस्ट की बैटरी चुराकर ले
गया. अब रोशनी नहीं होती. मगर शोभा की वस्तु की तरह लैंप पोस्ट अपनी जगह खड़ा है.
लगभग सभी सरकारी योजनाओं के साथ मुखिया जी इसी तरह बलात्कार करते हैं मगर राज्य
सरकार सुशासन चालीसा दोहराने में जुटी रहती है.
कोई है ?...
अपने गांव से पास के कस्बे तक जाने के लिए गांव के इकलौते रिक्शा चालक बुधना को
मैंने एक दिन पहले ही कह दिया था. गांजे के कई कश लगाने के बाद बुधना रिक्शा खींचने
लगा. उसने बताया कि गांव की सड़कें इतनी खराब हैं कि गांजा पीए बिना इन पर रिक्शा
खींच पाना मुमकिन ही नहीं है.
खराब सड़को की वजह से दूसरे रिक्शा चालकों ने यह काम ही छोड़ दिया. बुधना को इस बात
की शिकायत है कि कहीं कुछ भी नहीं बदला है. सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने का नाटक किया जा
रहा है. सुशासन है, इसलिए घूस अपने हाथ से न लेकर एजेंटों के माध्यम से ली जा रही
है. मुखिया के कई एजेंट इंदिरा आवास योजना से लेकर दूसरी सभी योजनाओं के हिस्से
गरीबों से छीनकर मुखिया तक पहुंचा देते हैं. बिहार की तो तकदीर ही खराब है...बुधना
की आवाज़ केवल मेरे कानों तक जा रही है. दूसरा कोई सुनने वाला नहीं है.
12.10.2008,
00.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित