संदीप पांडेय | फिर कहां से आएगी बिजली
मुद्दा
बिजली आएगी कहां से
संदीप पांडेय
दुनिया के पैमाने पर वैश्विक तापमान
चर्चा एवं चिंता का विषय बना हुआ है,
तो दूसरी तरफ लोग पेट्रोलियम
पदार्थो की मूल्य वृद्धि से परेशान हैं. जैसे-जैसे कोयले व पेट्रोलियम के सीमित
भंडार कम होते जाएंगे,
ऊर्जा संकट गहराता जाएगा.
इस समय भारत में करीब 70 प्रतिशत
बिजली कोयला आधारित ताप बिजलीघरों से आती है. लगभग 20 प्रतिशत बिजली बड़ी पनबिजली
परियोजनाओं से प्राप्त होती है. किंतु जब से विस्थापन के सवाल पर बड़े बांधों के
खिलाफ आंदोलन शुरू हो गए हैं,
तब से ये परियोजनाएं व्यावहारिक नहीं
रह गई हैं. एक बड़े बांध का जीवनकाल करीब 40 वर्ष होता है यानी आने वाले समय में
भारत के बिजली उत्पादन के जो दो सबसे बड़े स्रोत हैं,
वे समाप्त होने वाले हैं. तब
हमारी बिजली कहां से आएगी ?
भारत में परमाणु ऊर्जा से वर्तमान
समय में मात्र 3 फीसदी प्राप्त होती है. जब हमारे यहां परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की
शुरुआत हुई थी,
तो इसके जनक होमी जहांगीर भाभा ने
भविष्यवाणी की थी कि सन 1987 तक हम इस कार्यक्रम से 20 से 25 हजार मेगावाट बिजली
बनाएंगे.
जाहिर है कि यह कार्यक्रम बहुत सफल
नहीं रहा है. यदि इसके साथ परमाणु बम का कार्यक्रम नहीं जुड़ा होता,
तो अब तक इस कार्यक्रम को बंद
करने की नौबत आ गई होती. दुनिया के पैमाने पर भी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम दिक्कतों
का सामना कर रहा है.
इस कार्यक्रम में प्रमुख कठिनाई यह आ
रही है कि परमाणु बिजली संयंत्रों से निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित
निबटारे का वैज्ञानिकों के पास कोई समाधान नहीं है. अमेरिका के 104 परमाणु बिजली
घरों से निकलने वाले कचरे को फिलहाल संयंत्र परिसरों में ही ड्रमों में भर-भरकर रखा
जा रहा है. नेवाडा राज्य की यूक्का पहाड़ियों में सुरंगे बनाकर इस कचरे को दफनाने
की योजना का स्थानीय जनता ने भारी विरोध किया है.
यही वजह है कि अमेरिका में 35 वर्षो
में एक भी नए परमाणु बिजली संयंत्र लगाने की योजना नहीं बनी. इंग्लैंड,
कनाडा व जर्मनी में पिछले
दो-तीन दशकों से नए परमाणु बिजलीघर लगने बंद हो गए हैं. फ्रांस जो आज तो अपनी 75
प्रतिशत बिजली की जरूरत परमाणु ऊर्जा से पूरी कर रहा है,
आने वाले दिनों में सिर्फ एक
नया कारखाना लगाने वाला है.
आने वाले दो से तीन दशकों में फ्रांस
जिसको आज परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल में एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया
जाता है,
के बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा
के योगदान के प्रतिशत में भारी गिरावट आएगी. जापान भी ऊर्जा के नए स्रोत,
खासकर पर्यावरणीय दृष्टि से
साफ-सुथरे पुनर्प्राप्त संसाधन तलाश रहा है.
भारत के योजना आयोग का 2006 का एक
अध्ययन यह बता रहा है कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौता होने के बाद भी ज्यादा से
ज्यादा 40 हज़ार मेगावाट बिजली भी बना लेते हैं,
तो भी वह भारत के कुल बिजली
उत्पादन का 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने वाला.
भारत ने पिछले दस वर्षो में पवन
ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय तरक्की की है. दुनिया में पवन ऊर्जा से बिजली
उत्पादन के मामले में हम चौथे सबसे बड़े देश बन गए हैं. जबकि 60 वर्षो से परमाणु
ऊर्जा विभाग पूर्णतया सरकार द्वारा वित्तपोषित है,
सिर्फ दस वर्षो में बिना
सरकारी मदद के पवन ऊर्जा से भारत में 5 प्रतिशत बिजली उत्पादन की क्षमता स्थापित हो
गई है यानी पवन ऊर्जा से बिजली उत्पादन की क्षमता परमाणु ऊर्जा से ज्यादा हो चुकी
है.
भारत में पवन ऊर्जा से 45,000
मेगावाट बिजली उत्पादन की संभावनाएं बताई जा रही हैं. अमेरिका की एक संस्था
‘इनर्जी
इन्फारमेशन एडमिनिस्ट्रेशन’के
अनुसार आने वाले दो से तीन दशक में दुनिया भर में बिजली उत्पादन के जो कारखाने
लगेंगे,
उनमें से करीब दो तिहाई गैस आधारित
होंगे.
भारत के लिए गैस के दो बड़े स्रोत हो
सकते हैं- म्यांमार व ईरान. म्यांमार के सैनिक शासक नाराज न हो जाएं,
इस वजह से भारत सरकार ने
खुलकर कभी आंग सान सू ची के लोकतंत्र बहाली आंदोलन का समर्थन नहीं किया. किंतु
म्यांमार ने अपनी गैस चीन को बेचने का निर्णय लिया है. इस नाते अब प्रस्तावित
ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन से आ सकने वाली ईरान की गैस हमारे लिए और भी
महत्वपूर्ण हो गई है.
आने वाले दो से तीन दशकों तक तो भारत
को अपनी बिजली उत्पादन का आधार अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले तथा गैस को ही बनाना
होगा. कोयला होते हुए भी शायद कोयला जलने से पैदा होने वाला कार्बन उत्सर्जन कोयले
के उपयोग की सीमा निर्धारित करेगा. गैस के इस्तेमाल में कार्बन उत्सर्जन कोयले की
अपेक्षा कम है इसलिए भी आने वाले दिनों में गैस आधारित प्रौद्योगिकी अधिक प्रचलन
में होगी. किंतु तीन दशकों के बाद तो हमें पुनप्र्राप्य स्रोतों को ही अपनी ऊर्जा
आवश्यकताओं की पूर्ति का मुख्य आधार बनाना होगा. इनमें पवन के अलावा सौर,
बायोगैस व सूक्ष्म पनबिजली
प्रमुख होंगे.
|
एक जिम्मेदार
देश को पारिस्थितिकीय संतुलन एवं पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने में अपनी भूमिका
स्वत: निभानी चाहिए. |
जिस तरह से जापान व यूरोपीय संघ ने
यह तय किया है कि 2050 तक वे अपने को कम कार्बन उत्सर्जन वाले समाज बनाएंगे,
हमारे लिए ये आदर्श होने
चाहिए. अमेरिका अभी अपने ऊपर इस किस्म की कोई पाबंदी लगाने को तैयार नहीं है. इसलिए
अमेरिका को आदर्श मानकर हम बहुत बड़ी भूल करेंगे. एक जिम्मेदार देश को
पारिस्थितिकीय संतुलन एवं पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने में अपनी भूमिका स्वत:
निभानी चाहिए.
भारत के सामने असली ऊर्जा चुनौती यह
है कि बहुसंख्यक भारतीय नागरिकों के पास गांव-गांव तक बिजली कैसे पहुंचे. भारत के
गांवों की जरूरत को पूरा करने के लिए सस्ते,
सूक्ष्म/लघु,
विकेंद्रीकृत व स्थानीय ऊर्जा
विकल्प चाहिए. पुनर्प्राप्य ऊर्जा स्रोत ये जरूरत भी बेहतर ढंग से पूरी कर सकते
हैं.
हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि
जब भी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति की बात आती है,
तो हमें सिर्फ बिजली उत्पादन
के बारे में नहीं सोचना चाहिए. बिना बिजली के भी ऊर्जा जरूरत पूरी हो सकती है.
उदाहरण के लिए सौर ऊर्जा की गर्मी से सीधे खाना पकाया जा सकता है. हमारा उद्देश्य
यह होना चाहिए कि हम समतामूलक दृष्टिकोण से पूरी समझदारी एवं जिम्मेदारी के साथ
व्यापक जन एवं पर्यावरण हित में समाज की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए
विकल्प विकसित करें.
17.10.2008,
01.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित