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राजेंद्र यादव | एक नॉन-पापा की बात | रचना यादव

बात निकलेगी तो...

 

एक नॉन-पापा की बात

 रचना यादव

 

 

किताबघर से गीताश्री के संपादन व संयोजन में शीघ्र प्रकाश्य 'राजेंद्र यादव और तेइस लेखिकाएं' में यह आलेख शामिल है. इस किताब में राजेंद्र यादव से संबंधित आलेख, संस्मरण और साक्षात्कार हैं.

 

'मैं वापस आऊँगा, जरूर आऊँगा, पहचान पाओगे मुझे' -राजेन्द्र यादव

1983 में पापा की टेबल पर रखे कुछ थीसिस के नोट्स में मैंने यह लाइन पढ़ी. ऐसा लगा कि यह लाइन एक ऐसे व्यक्ति के अंदर से फूटी है, जो कहीं भटक गया है, खो गया है या खत्म हो रहा है. पर अपने आपको फिर से खड़ा करने की चाह उतनी ही जीवित है और उम्मीद उतनी की प्रबल. और क्यों यह पंक्ति पापा द्वारा कही गई थी तो मेरे अनुमान से यह एक लेखक अपने पाठकों को संबोधित कर रहा था. मरते हुए लेखक की इस लाइन ने, पापा को पहली बार मेरे सामने एक लेखक के रूप में जीवित कर दिया.

रचना यादव


जानती तो थी ही कि वे लेखक हैं. जानती क्या, दिन-रात पापा को लिखते-पढ़ते देखती थी. पर इस पंक्ति में छिपी कुंठा ने मुझे अंदर तक इस हद तक छू लिया कि पहली बार मुझे पापा के लेखक होने का अर्थ समझ आया. केवल लेखक ही नहीं, एक सफल लेखक होना उनकी जिंदगी में कितनी अहमियत रखता है, इस बात का अहसास मुझे उस दिन पहली बार हुआ.

साल भर पहले गीताश्रीजी ने मुझे पापा के बारे में लिखने को कहा और मैं टालती गई. मैंने तो इतनी गहराई से कभी पापा का व्यक्ति-विश्लेषण किया ही नहीं. दिमाग में ही नहीं किया तो कागज पर क्या उतारूँ. वैसे भी मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह प्रसन्न दिखने वालों का कम और दुखी लोगों का विश्लेषण ज्यादा करता है. और जब पापा के बारे में सोचने बैठी तो इतना तो समझ आ ही गया कि इतने प्रसन्न, सहज-सरल दिखने वाले पापा, विश्लेषण के लिए एक जटिल विषय हैं.

जैसा मैंने कहा कि उस दिन पहली बार मुझे अहसास हुआ कि लेखन और लेखक होना, पापा की जिंदगी में कितना महत्व रखता है. उनकी समस्त जिंदगी और शायद जीने का कारण ही उनका लेखन है. पर क्योंकि अनेक लोगों ने, समीक्षकों ने उनकी रचनाओं पर और लेखक-राजेन्द्र यादव पर बहुत कुछ लिखा है, मैं कोशिश करूँगी कि अपने अनुभव के आधार पर, उनके पिता-रूप पर टिप्पणी करूँ.

मुझे नहीं याद कि पापा (जिनको मैं बचपन से ही पप्पू बुलाती हूँ) को मैंने कभी दुखी या अवसाद में देखा हो. कुछ किस्से मम्मी बताती हैं, जब वे बहुत रोए या दुखी हुए पर मैंने खुद कभी नहीं देखा. सारे समय हँसी-मजाक, मस्ती-मुझे तो बस यही याद है. 'बाबा मौज करेगा' ताली बजाते हुए, फकीरी अंदाज में वह इस तकिया-कलाम को बोलकर घर में कभी भी किसी भी चिंताजनक या तनाव के माहौल को क्षणभर में हलका कर देते.

मुझे यह भी याद नहीं कि उन्होंने मुझे कभी डाँटा हो या नाराज हुए हों. या कभी अच्छे बच्चे बनने के तौर-तरीकों पर लंबे भाषण पेले हों, जो अक्सर आम पिता अपने बच्चों के साथ करते हैं. या कभी पढ़ाई करने के लिए डॉक्टर-इंजीनियर बनने के लिए कोई जोर या दबाव डाला हो. इस सबको पढ़कर तो कोई भी बच्चा यह सोच सकता है कि वाह! ऐसे पापा सबको मिलें और कम ही लोग इतने अच्छे पापा बन पाते हैं.


पर असलियत तो यह है कि पापा बनना तो उन्हें कभी आया ही नहीं. फिर अच्छा पापा बनना तो दूर की बात है.

मेरे लिए तो माँ और पिता, इन दोनों की भूमिकाएँ मम्मी ने ही अदा कीं. मुझे नहीं लगता कि उन्हें कभी इस बात का अहसास हुआ कि उनकी एक बेटी है, जो उनकी जिम्मेदारी है.

बचपन में मुझे कई बार बात खटकती थी कि मेरे पापा अन्य पापाओं से अलग क्यों हैं? वे दूसरे बच्चों के पापाओं की तरह मुझे बस-स्टाप पर छोड़ने क्यों नहीं आते? इंडिया-गेट और चिल्ड्रन म्यूजियम क्यों नहीं जाते? या टाई और सूट पहन, ब्रीफकेस लेकर, ऑफिस की गाड़ी में बैठे, ऑफिस क्यों नहीं जाते? आसपास के माहौल से प्रभावित जो मेरे दिमाग में उस समय एक 'पिता-छवि' थी, उसमें वे दूर-दूर तक कहीं फिट नहीं होते थे. बुरा भी लगता था और शायद अपनी सहेलियों के बीच कॉलेक्स भी होता था.

पर आज सोचती हूँ तो लगता है कि यदि वह एक आम पिता की तरह यह सब करते तो मैं भी शायद आम लड़की की तरह एक सुघड़ गृहिणी होकर रह जाती. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर आम और अच्छे पिता के बच्चे साधारण ही निकलते हैं. मैं केवल अपने संदर्भ में यह बात कह रही हूँ.

हाँ, यह जरूर है कि इस नॉन-पापा की भूमिका को पापा ने इस हद तक अदा किया कि मेरे बहुत बीमार होने पर भी वे गायब. डॉक्टर के पास ले जाने की तो उनसे अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए थी. जिस व्यक्ति के अपने पिताजी यानी मेरे दादा साहेब ने, उनकी बीमारी के दिनों में महीनों उनके सिरहाने बैठकर उनकी देखभाल की वह व्यक्ति अपनी खुद की बेटी की बीमारी में ऐसा कर सकता है-यह विश्वास करना ही बहुत कठिन है, पर सुनती हूँ कि ऐसा ही हुआ. और मम्मी का इस बात पर बहुत-बहुत नाराज होना तो जायज ही था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

drishti (drishtianeja@gmail.com) bhuvaneashwar

 
 शहरोज़ जी, रचना अगर कुछ बन पाई है तो ये कमाल उसकी मां मन्नू जी का भी है, जिन्होंने मां और पापा दोनों की जिम्मेदारियां निभाईं और बच्ची को कुंठित नहीं होने दिया. Hats off to Mannu Bhandari !! 
   
 

poonam choubey (poonam.tanvi@yahoo.com) ranchi, jharkhand

 
 it is realy inpiring to know such statement from a girl for her father. being a daughter of such father u hav done a marvellous job. sometimes we get annoyed eeing our father not keeping proper attention on us, but after reading this i think no daughter will ever complain for anything to her father. thank u for sharing this experience. 
   
 

Purnima (Nishu, as I am fondly known to my family!) (purnima.mundel@gmail.com) Jaipur

 
 Being her cousin, and having been real close in our childhood, I think Tinku (the pet name Rachna is fondly called by in the family) has drawn quite an accurate picture of Rajendra Mamu (yes, he is my eldest Mama). He has been very unconventional in almost every aspect of his life - as a father, as a husband, as a brother, an uncle...but, very endearing nonetheless! Anyone who gets to know him can never forget him - either which way! His happy-go-lucky demeanour is his secret of the jest he still has for life! For us, his family members, catching up with both - Mamu and Mami Sahib (Manu Bhandari) together in the lighter moments of the family gatherings was indeed a pleasure! For those who are not appreciative of the 'personalized' version of Tinku's write up - I have just one thing to say...I think that is exactly what she was asked to write about, and I think she has made quite a good and true attempt! And, she is truely her father's daughter !!! 
   
 

gauri diwakar (gaurikathak@hotmail.com) delhi

 
 दीदी, पढ़ कर अच्छा लगा. मुबारक हो. कुछ लिखा तो आपने. ऐसे ही लिखती रहें. खून बोलता है, ऐसा मैने सुना है. 
   
 

gulzar hussain (gulzar.mahanagar@yahoo.co.in) mumbai

 
 एक लेखक को न केवल बाहरी संघर्षों से बल्की भीतरी उथल-पुथल से भी गुजरना पड़ता है...और शायद इसलिए लेखक अपनों के पास रहते हुए भी बहुत दूर होता है. ग़ालिब ने लिखा है- रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो... 
   
 

chetanya jain (chetanjain87@yahoo.com) bhopal

 
 इस तरह की बात लिखने के पीछे क्या कोई ऐसा कारण है, जो आपको पाठकों की सहानुभूति दिलाएं ? अगर आप अपने पिता को असफल पिता कहती हैं तो गांधी जी को क्या कहेंगी? और जिस मुकाम पर आपके पिता हैं, उस मुकाम पर पर पहुंच कर क्या आप एक जिम्मेवार मां की भूमिका निभा सकती हैं ?  
   
 

santosh kumar () lucknow

 
  I am fully satisfied from the statment of Rachana Yadav.  
   
 

satish mumbai

 
 रोचक और अनछुए पहलूओं को बेबाकी से रखने के लिये रचनाजी बधाई की पात्र हैं। 
   
 

जगत मोहन शरण (jagatmohansharan@gmai.com) नयी दिल्ली

 
 राजेन्द्र यदव एक चर्चित लेखक लेकिन एक निहायत असफ़ल और गैर ज़िम्मेदार पति व पिता. अब यह बात उनकी बेटी के मुख से आयी है.सवाल यह है कि इस तरह की चीजों को हम पाठकों के सामने परोसने के पीछे उद्देशय क्या होता है ?हम किससे सहानुभूति दिखायें ?उनके द्वारा उपेक्षित उनके परिवार जनों के प्रति या लेखक की महान छवि रचना के प्रयासों में इन बातों सब चलता है वाले अंदाज़ में अनदेखा कर दें ?क्या कोई तीसरा रास्ता भी होता है ?लेखक की सफलता बनाम उसके निजी जीवन की अमानवीयताओं पर कोई बुनियादी बहस क्यों नहीं की जाती? 
   
 

संदीप स्वस्तिक (ssdipu@gmail.com) मुजफ्फरपुर

 
 लेख में ऐसा कुछ भी नहीं है की लेखिका पे ' निजता बेचने ' का आरोप लगाया जाये......... 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com)

 
 लो, ठेकेदार फिर से हाजिर हो गए. निजता को बेचने से क्या आशय है ? क्या आप महात्मा गांधी के खानदान वालों का लिखा नहीं पढ़ते, और गोडसे के परिजनों का लिखा ? फिर इसमें निजता को बेचने का क्या सवाल है ? मैं समझ नहीं पाता कि जो लिखा हुआ है, उस पर टिप्पणी करने के बजाय रविवार में ऐसा क्यों होता है कि ठेकेदार लोग अपनी टिप्पणी करने लग जाते हैं. संपादक जी, आपको इस तरह की टिप्पणी हटानी चाहिए, जो केवल अपनी कुंठा के लिए किसी के द्वारा लिखी जाती हो. 
   
 

Sanjay singhal (sanjay.singhal@gmail.com) , Patna

 
 राजेंद्र यादव की बेटी को पहली बार पढ़ना हुआ. मन्नू जी और राजेंद्र जी को तो पढ़ता ही रहा हूं.
रचना ने शुरु में तो राजेंद्र यादव के असली पापा का चेहरा लाया है लेकिन अंत होते न होते हर भारतीय स्त्री की तरह अपने पिता के पक्ष में खड़ी हो गई हैं. फिर भी यह लेख अच्छा है.
 
   
 

chandra prakash pandey (pandeycp_2000@yahoo.com) East punjabi bagh

 
 samya ki silla par sab kuch sahi nahi hota hai Nijata ko bechkar naam kamana theek nahi................. 
   
 

शहरोज़ (shahroz_wr@yahoo.com) दिल्ली

 
 राजेन्द्र जी की सच्ची-मुच्ची छवि!
रचना का अंदाज़ भी ठीक है.
लेकिन क्या और संतान भी इतनी लायक़्मन्द हो पाती है!
पिता के बिना पले बच्चे कहीं न कहीं इक कमी का एहसास ज़रूर करते हैं.ऐसा हमने घर-बाहर देखा है.
ये राजेन्द्र जी कमाल आपका नहीं रचना का है!
 
   

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