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कनक तिवारी | बस्तर में नक्सली हिंसा

बहस

 

बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा

कनक तिवारी


छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से झुलस रहा है. नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से होकर छत्तीसगढ़ तक एक गलियारा बन गया है जिससे नक्सली तत्व आ जा रहे होंगे. नक्सलवाद का रिश्ता सघन वनों से होता है. यह अलग बात है कि जंगलों में आदिवासी संस्कृति विकसित हुई है. इसलिए नक्सलवाद का आदिवासी जीवन से रिश्ता ढूंढ़ लिया जाता है.

bastar maoist


भारत में अकूत वन संपदा आज भी है. यह उसका अर्थशास्त्र है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. यह उसका राजनीतिशास्त्र है. भारत में चीन को छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है. यह उसका अभिशाप हो रहा है, जबकि उसे एक बड़ी मानव शक्ति के रूप में समझा जाना चाहिए था. अंग्रेजी हुकूमत के दुष्परिणामों में उसकी सड़ी गली शासन और न्याय व्यवस्था भी भारत के खाते में आई है.

आजादी का आंदोलन एक भावुक विद्रोह था जिसके एक छोर पर महात्मा गांधी और दूसरे छोर पर सुभाष बोस और भगतसिंह जैसे असंख्य देशभक्त मौजूद थे. संविधान सभा में लेकिन ऐसे लोग हिंदुस्तान का बुनियादी संविधान और प्रशासकीय ढांचा रचने में हावी हो गए जो प्रखर बुध्दिजीवी तो थे, लेकिन आजादी के आंदोलन से उनका दूर दूर का रिश्ता नहीं था. यह दुखद लेकिन सच है कि संविधान सभा में आजादी के सूरमाओं ने ऐसे बुध्दिवादियों को बहुत अधिक महत्व दिया. परिणाम यह है कि हिंदुस्तान को जिस रास्ते पर चलना पड़ा, वह सत्ता का राजपथ है, सेवा का जनपथ नहीं.

आजादी के बाद सत्ता में आना हर राजनीतिक पार्टी और विचारधारा का अधिकार है. कम्युनिस्ट आंदोलन देशज प्रकृति का नहीं है इसलिए उसे माक्र्स, लेनिन और माओ से प्रेरणा लेने का अधिकार है. यह अधिकार लेकिन भारतीय संविधान नियंत्रित करता है और उन रास्तों को बनाने की इजाजत नहीं देता जिससे संविधान का मखौल उड़ाया जा सके. धीरे-धीरे कम्युनिस्ट विचारधारा में जो जितना उग्र होता गया वह उतना प्रगतिशील और गरीबों का हिमायती अपने आपको कहने लगा.

जब किसी को दीवार तक धकेल दिया जाएगा तब हमला करके ही बचाव किया जा सकता है-साम्यवाद का यह मानक पाठ बस्तर के आदिवासियों को भी पढ़ाया गया. भारतीय किस्म का समाजवाद छत्तीसगढ़ में काफी फला फूला लेकिन संगठन के अभाव में और व्यक्ति को समूह से बड़ा समझने की गफलत पाले समाजवादी इतने हिस्सों में टूट गए कि अब उनका कोई नामलेवा भी नहीं है. हिंदूवादी संगठनों ने यहां पहले तो कोई उपस्थिति दर्ज नहीं कराई लेकिन पूरा देश जानता है कि कांग्रेस की कमजोरियों की वजह से किस तरह हिंदू प्रतिक्रियावाद को राजनीतिक विचारधारा के केन्द्र में आने से रोका नहीं जा सका.

लगभग अकेले संगठन के रूप में कांग्रेस में छत्तीसगढ़ का रचनात्मक इतिहास लिखना तो शुरू किया लेकिन केवल सत्ताभिमुखी हो जाने की वजह से यह पूरा कारवां इस तरह बिखरता चला गया कि गैर कांग्रेसी विचार धरे लोग कांग्रेस में इस कदर शामिल हो गए कि वे आज बहुमत में हैं. राजनीति में धींगामस्ती और नूराकुश्ती इस कदर गड्डमगड्ड हो गई है कि जनता को पता ही नहीं चलता कि कौन किस विचारधारा का प्रतिनिधि है.

छत्तीसगढ़ सघन नक्सली हिंसा का प्रदेश हो गया है. अनुमानत: केवल बस्तर संभाग में एक लाख से अधिक नक्सली हो गए हैं. सरगुजा क्षेत्र में भी नक्सली घुसपैठ की स्थितियां जस की तस हैं, यद्यपि वहां स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रण में है. नक्सल समस्या का लगभग तीन दशकों का चिन्तनीय इतिहास हो गया है. प्रशासनिक उपेक्षाओं और पूंजीपतियों, ठेकेदारों और उद्योगपतियों (जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र भी शामिल है) के द्वारा किए गए उत्तरोत्तर प्रकृति और परिमाण के शोषण ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में प्रतिक्रिया के रूप में नक्सलवाद को सक्रिय होने का अवसर जुटाया है.

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने आदिवासियों के हितों का संरक्षण करने के लिए विशेष उपबंध किए लेकिन उनको सही ढंग से अमल में नहीं लाया जा सका. स्वयं आदिवासी नेतृत्व में इन उपबंधों को लागू करने के संबंध में हिंसात्मक मतभेद तक उजागर हुए हैं. छठवीं अनुसूची के अनुपालन की समस्या इसका एक उदाहरण है. बस्तर, सरगुजा और रायगढ़ सहित आदिवासी क्षेत्र जंगलों में ही अवस्थित होते हैं.

प्रकृति ने छत्तीसगढ़ को भरपूर प्राकृतिक संपदा दी है. ऐसी प्राकृतिक संपदा (मुख्य खनिज) पर राज्य और आदिवासियों को बहुत अधिक अधिकार नहीं मिल पाए हैं. जिन मूल कानूनों के आधार पर लोकतंत्रीय शासन चल रहा है, वे अधिकतर उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों द्वारा रचित किए गए हैं. भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, भारतीय संविदा अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम, व्यवहार प्रक्रिया संहिता, भारतीय वन अधिनियम, भू अर्जन अधिनियम जैसे कानून 1857 के जनसंग्राम की प्रतिक्रिया के स्वरूप बनाए गए प्रतीत होते हैं.

छत्तीसगढ़ में पनप रहा नक्सलवाद अपनी मूल दार्शनिक (भले ही विवादग्रस्त) प्रकृति से भटक गया प्रतीत होता है. यह भी संभव है कि नेपाल, बंगाल, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आदिवासी/वन इलाके हिंसक तथाकथित माओवादी गतिविधियों के प्रसार के लिए एक कॉरिडॉर का निर्माण करते हैं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) जैसे राजनीतिक संगठनों के क्रमश: और अधिक उग्र तथा हिंसक होते जाते धड़े लोकप्रिय भाषा में नक्सलवादी कहे जा रहे हैं.

संविधान के रास्तों को अपनाकर कोई भी राजनीतिक विचारधारा लोकतंत्र में जनसमर्थन जुटाने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन उसका यह अर्थ नहीं है कि भारतीय संविधान में वर्णित संवैधानिक आजादियों को हिंसक गतिविधियों में बदल दिया जाए. संविधान में यह भी उल्लिखित है कि उपरोक्त आजादियों को राज्य सत्ता द्वारा युक्तियुक्त आधारों पर नियंत्रित और प्रतिबंधित किया जा सकता है, जो भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों अथवा अदालतों की अवमानना, मानहानि या अपराधों को भड़काए जाने आदि के आधारों पर होंगे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shrimati neelima nishad (nishadneelima@ymail.com) Raipur

 
 भारत को आज़ादी अभी तक नहीं मिली. बस्तर का भोलेभाले लोगों को आज भी किसी न किसी रुप में शोषण हो रहा है. क्या अगली सरकार कुछ नहीं कर पाएगी ? 
   
 

रुद्र अवस्थी बिलासपुर

 
 छूरियां तो इतिहास में खून पीती हैं और हंसती हैं.यही पूरी व्यवस्था या कहें अव्यवस्था का निचोड़ है. लेकिन ऐसी छूरी को बोथरा करने के लिए कोई उपाय खोजा जाना चाहिए, तभी मसले का हल निकल सकता है.-रुद्र अवस्थी, बिलासपुर 
   
 

Prof. Shailesh Zaidi (shaileshzaidi@gmail.com) AIGARH,UP

 
 गंभीर और विचारोत्तेजक. 
   

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