पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

साहित्य का ओपेरा संस्करण

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

यह सबके लिये चेतावनी है

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > बहस > अर्थ-बेअर्थPrint | Send to Friend 

devinder sharma | financial depression hits markets

मुद्दा

 

पैसा आएगा कहां से

देविंदर शर्मा

 

 

कुछ माह पहले जिस दिन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट भाषण में किसानों के लिए साठ हजार करोड़ रुपये ऋण माफी की घोषणा की थी तब एक सवाल को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया था-यह पैसा कहां से आएगा? समाचार चैनलों पर प्रस्तोता किसानों को दी गई इस मदद पर गुस्से में नजर आ रहे थे. अखबार भी आक्रोशित थे कि आगामी चुनाव से तुरंत पहले उठाया गया यह कदम आर्थिक न होकर राजनीतिक है. उद्योग जगत के धुरंधर भी अपनी बेचैनी व्यक्त कर रहे थे.

indian money


छह माह बाद कोई यह सवाल नहीं पूछ रहा है. वैश्विक वित्तीय संकट से निकलने के लिए रिजर्व बैंक पर हस्तक्षेप का दबाव है. वाल स्ट्रीट में मची मारकाट के तुरंत बाद रिजर्व बैंक ने तरलता सुविधाओं के समायोजन के माध्यम से घरेलू बैंकिंग व्यवस्था में 84 हजार करोड़ रुपये डाल दिए. इसके पश्चात सीआरआर में आधा प्रतिशत की कमी करके 20 हजार करोड़ रुपये और जारी कर दिए.

यह तकनीकी पेंच नजर आता है, लेकिन मामले को स्पष्ट करने की जरूरत है. आम लोगों के शब्दों में तरलता से आशय फंड की उपलब्धता से है. सरल शब्दों में इसका अर्थ है अधिक नगदी उपलब्ध कराना. पूरी दुनिया में सरकारें निजी बैंकों के हाथों में अधिक नगदी सौंप रही हैं. भारत इसका कोई अपवाद नहीं है.


वित्त मंत्री के इस भरोसे कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत आधारों पर टिकी हैं, के बावजूद बैंक भारी उधार ले रहे हैं. अक्टूबर के पहले सप्ताह में ही उन्होंने तरलता सुविधाओं के नाम पर रिजर्व बैंक से रोजाना 90,075 करोड़ रुपये लिए. इसके अलावा रिजर्व बैंक पर सीआरआर दर में और कमी करने का भी दबाव है. इससे बैंकों की झोली में अतिरिक्त 30 हजार करोड़ रुपये आ जाएंगे. यही नहीं, रिजर्व बैंक पर रेपो रेट में और कमी करने का भी दबाव है. ध्यान रहे, रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक अन्य बैंकों को कर्ज देता है.

ऋण माफी की मेहरबानी से आगामी सप्ताहों में बैंकों को 50 हजार रुपये और मिल जाएंगे. ये किसानों की ऋण माफी और खाद ऋण देने के मद में जारी किए जाएंगे. क्या यह सच्चाई नहीं है कि साठ हजार करोड़ रुपये की ऋण माफी, जो बाद में 71 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गई, वास्तव में बैंकों के लिए एक राहत थी?

ऋण के बोझ तले किसानों को राहत पहुंचाने के नाम पर लिया गया राजनीतिक निर्णय वास्तव में बैंकिंग व्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए उठाया गया कदम था. अगर सरकार ऋण माफी नहीं देती तो बैंकों के सामने तरलता का भयावह संकट खड़ा हो जाता. किसान ऋण चुकाने की हालत में नहीं थे, इसलिए मजबूरन इन बैंकों में भारी संख्या में नान परफार्मिंग संपत्ति का ढेर लग जाता. इससे उनके सामने तरलता का संकट खड़ा हो जाता और वे 71 हजार करोड़ रुपये से वंचित रह जाते. दूसरे शब्दों में, ऋण माफी बैंकों के लिए आंशिक राहत थी.

अगर ऐसी 'तेजी और दूरदर्शिता' पिछले एक दशक से चल रहे भयावह कृषि संकट को दूर करने के लिए दिखाई गई होती तो हजारों किसानों को आत्महत्या करने से बचा लिया जाता.


अब कोई नहीं पूछ रहा है कि ये राशि कहां से आएगी? इसके विपरीत अधिकांश विश्लेषक इस संकट से उबरने के लिए उपायों में और तेजी लाने तथा दूरदर्शिता दिखाने की हिमायत कर रहे हैं. अगर ऐसी 'तेजी और दूरदर्शिता' पिछले एक दशक से चल रहे भयावह कृषि संकट को दूर करने के लिए दिखाई गई होती तो हजारों किसानों को आत्महत्या करने से बचा लिया जाता.

अगर केवल रिजर्व बैंक ही अधिक नगदी उपलब्ध करा देता तो देश में प्रत्येक भारतीय को साल में सौ दिन नहीं, बल्कि 365 दिन सुनिश्चित रोजगार मिल जाता. यह समझ से परे है कि गरीबों को भूखों मरने देने और फिर उच्च विकास दर की अपेक्षा करने के पीछे कौन सा विवेकपूर्ण तर्क है? बैंकों और औद्योगिक घरानों को करोड़ों रुपये के वेतन तथा अन्य सुविधाएं देने और फिर सड़क के आदमी को उसका खामियाजा उठाने के लिए विवश कर देने में कौन सी समझदारी है? दूसरे शब्दों में, लाभ के निजीकरण और नुकसान के समाजीकरण का क्या तुक है?

दिवालिया लेहमन ब्रदर्स का मामला देखें. इसके शेयरधारकों को तो खाली हाथ चलता कर दिया गया है, जबकि इसके प्रमुख कार्यकारी रिचर्ड फेल्ड को उनके आठ साल के मेहनताने के रूप में 48 करोड़ डालर की भारी-भरकम रकम दे दी गई. यही नहीं, उन्हें फ्लोरिडा में स्की रिसोर्ट में समुद्र तट पर 1.4 करोड़ डालर का एक मकान भी दिया गया है.

इंश्योरेंस कंपनी की जांच कर रहे अधिकारियों को यह जानकर बड़ा धक्का लगा कि सरकार द्वारा कंपनी को बचाने के कुछ ही दिनों बाद कंपनी ने अपने अधिकारियों की मौज-मस्ती में 44 हजार डालर फूंक डाले. अमेरिका के औद्योगिक घरानों को क्या दोष दिया जाए, जब राष्ट्रपति जार्ज बुश ने ही उन्हें पूरी छूट दे दी है. शायद बुश यह संदेश देना चाहते हैं कि चाहे जो भी हो जाए, अमेरिकी सरकार कंपनियों के अधिकारियों के वेतन और सुविधाओं के लिए धन उपलब्ध कराती रहेगी.

फिर से मूल प्रश्न की ओर लौटते हैं. विश्व कब तक ऐसी व्यवस्था को प्रोत्साहन देता रहेगा जिसमें अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब बनते हैं.

भारत के 36 सबसे धनवान व्यक्तियों की आर्थिक संपत्ति देश के सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई है, जबकि साठ करोड़ किसानों की इसमें हिस्सेदारी मात्र 17 प्रतिशत है. साल दर साल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी गिरती जा रही है. इसमें हैरानी नहीं होती कि पांच परिजनों और दो पशुओं वाले एक कृषक परिवार की औसत मासिक आय 2400 रुपये ही है.

किसानों को संकट से उबारना हमेशा खराब अर्थशास्त्र माना जाता है. कहा जाता है कि राजनेता जितनी जल्द इससे छुटकारा पा लें, आर्थिक प्रगति और विकास के लिए उतना ही बेहतर होगा. दूसरी ओर जब बात करोड़पति उद्यमियों, कंपनियों और बैंकों की हो तो उन्हें बचाना न सिर्फ अनिवार्य हो जाता है, बल्कि यह कार्य जल्द से जल्द भी होना चाहिए. तब यह सवाल भी नहीं किया जाता कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा? शायद यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है.

 

25.10.2008, 10.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

AnitaTyagi Dubai

 
 I am agree with this writer Davindra shaarma 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in