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देविंदर शर्मा | devinder sharma | कृषि

बहस

 

खतरे में खेती

देविंदर शर्मा


लगभग ढाई दशक पहले आयरलैंड के कोर्क में आयरिश अकाल की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर शहर के मेयर ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ''तब समाज कितना बर्बर था. लोग भूखों मर रहे थे और मक्के से लदे जहाज इंग्लैंड भेजे जा रहे थे.''

 

उस भीषण अकाल के करीब 175 साल बाद विश्व इससे भी अधिक बर्बरता की उर्वर जमीन तैयार कर रहा है. इस बार दुनिया विदेशी खेतों में निवेश करने की होड़ का गवाह बन रहा है. लाखों हेक्टेयर उर्वर जमीन खरीदी जा रही है और उसे खाद्य संपदा में बदला जा रहा है. अनेक खाद्य और वित्तीय कंपनियां विदेशों में जमीन में निवेश करने के साथ-साथ अपने कामगार, उत्पादन प्रौद्योगिकी और उपकरण ला रही हैं.

देविंदर शर्मा


खाद्य उत्पादन की आउटसोर्सिंग की अपेक्षाकृत नई अवधारणा निवेशकर्ता देश की तो खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करेगी, लेकिन मूल देश की जनता को भूख, भुखमरी और खाद्य संकट की विभीषिका में झोंक देगी. ये कंपनियां अति सघन खेती करेंगी, जिसका पर्यावरण पर बेहद घातक प्रभाव पड़ता है. मेजबान देश के पल्ले पड़ेगी मिट्टी की गिरी हुई उर्वरता, भूमिगत जलस्तर में कमी और रसायनों की भरमार से विषैली बनी धरा. यह पूरी दुनिया में चल रहा है.

 

भारत की बात करें तो कर्नाटक में इस प्रयोग की शुरुआत होने जा रही है. खेती वाली भूमि की खरीद पर लगा नियंत्रण ढीला करके प्रदेश निवेश आकर्षित करने का खतरनाक प्रयास कर रहा है. यहां निवेश के लिए 15 कंपनियां तत्पर हैं. इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन के अलावा कुछ बड़ी निजी कंपनियां शामिल हैं. पैरागुवे, ऊरुग्वे और ब्राजील में पहले ही दस हजार हेक्टेयर जमीन में मुख्यत: सोयाबीन और तिलहन के उत्पादन के लिए विदेशी कंपनियों ने भूमि पट्टे पर लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

भारतीय कंपनियां भी दलहन उत्पादन के लिए म्यांमार में प्रवेश कर रही हैं. इसके अलावा इंडोनेशिया में तेल उत्पादन के लिए पाम के पेड़ खरीदे जा रहे हैं. इसके बाद खरीदारी की सूची में आस्ट्रेलिया और कनाडा हैं. कृषि संपदा से संबंधित राष्ट्रीय कानूनों को संशोधित जा रहा है.

 

खाद्य एवं कृषि मंत्रालय खेती की आउटसोर्सिग के पक्षधर हैं. रिजर्व बैंक वर्तमान कानूनों में बदलाव कर रहा है ताकि विदेशों में कृषि भूमि खरीदने के लिए कंपनियों को वित्तीय सहायता मुहैया कराई जा सके. भारत में ही नहीं, अर्जेटीना से मंगोलिया और आस्ट्रेलिया से रूस तक में विदेशी कंपनियों को कृषि भूमि खरीदने की अनुमति प्रदान करने के अनुकूल कानून संशोधित किए जा रहे हैं. खाद्य संकट की तीव्र वेदना झेल रहे पाकिस्तान में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने मध्य जून में सऊदी अरब के दौरे से लौटने के बाद अति उत्साह का परिचय दिया. खबर है कि विदेशी निवेश की जबरदस्त तंगी के कारण उन्होंने लाखों एकड़ उर्वर भूमि बेचने की पेशकश कर डाली.

 

इस बीच कतर पाकिस्तान के पंजाब में कृषि भूमि खरीदने की तैयारी कर रहा है, जिसके लिए करीब 25 हजार गांवों के किसानों को बेदखल होना पड़ेगा. सऊदी अरब भी इंडोनेशिया के मेरोके में 16 लाख हेक्टेयर कृषि संपदा हासिल करने की योजना बना रहा है. यहां चावल का उत्पादन कर वह वापस अपने देश मंगाएगा.

विदेश में जमीन खरीदने के इच्छुक देशों में सऊदी अरब अकेला नहीं है. गल्फ कारपोरेशन काउंसिल का गठन किया जा चुका है, जिसके सदस्यों में सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, जार्डन और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं. ये निवेश पर लाभ के बदले विदेशों में जमीन की खोज कर रहे हैं.

यह स्पष्ट है कि खाद्य पदार्थो की राजनीतिक अर्थव्यवस्था फिर से लिखी जा रही है. नि:संदेह इसके गंभीर नतीजे निकलेंगे.

 

एशिया में लाओस, इंडोनेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, कंबोडिया, पाकिस्तान, थाईलैंड और म्यांमार, मध्य एशिया और यूरोप में यूक्रेन, कजाकिस्तान, जार्जिया, रूस और टर्की तथा अफ्रीका में सूडान व उगांडा में पहले ही भूमि संबंधी करार किए जा चुके हैं. इन देशों को अहसास हो गया है कि तेल से आय लोगों का पेट नहीं भर सकती. हालिया वैश्विक खाद्य संकट में सुपर मार्केटों से खाद्यान्न गायब हो गया था. इसलिए खाड़ी देश भविष्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के इरादे से निवेश कर रहे हैं.

 

जमीन हथियाने में चीन मुख्य खिलाड़ी बन गया है. आबादी को खेती से हटाकर शहरों में ले जाने की बढ़ रही प्रक्रिया के चलते अब चीन विदेशों में भूमि खरीदने की गतिविधि में बढ़-चढ़कर भाग ले रहा है. मुख्य रूप से अफ्रीका, मध्य एशिया, आस्ट्रेलिया और फिलीपींस में चीन तीस से अधिक भूमि समझौतों को अंजाम दे चुका है. चीन खाद्य उत्पादनों की आउटसोर्सिग के अनुरूप कृषि नीति तैयार कर रहा है. मजेदार बात यह है कि एक तरफ चीन विदेशों में भूमि खरीदने की फिराक में है और दूसरी तरफ जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका की खाद्य उत्पादन से जुड़ी कंपनियां उसकी कृषि व्यवसाय गतिविधियों पर नियंत्रण कर रही हैं.

कोरिया मंगोलिया की प्राकृतिक भूमि खरीद रहा है, जिससे विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक परिवेश में पारिस्थितिक संतुलन गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो गया है. चीन में ग्रामीण आबादी के शहरों में पलायन ने वहां का सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. इससे वहां सामाजिक असंतोष पैदा हो गया है, जो अक्सर हिंसक रूप ले लेता है. चीनी सरकार के अधिकारिक मुखपत्र 'चाइना डेली' में छपी रिपोर्ट के अनुसार चीन में ग्रामीण समुदाय के विरोध प्रदर्शनों में भारी बढ़ोतरी हुई है. करीब 11 साल पहले यह संख्या मात्र दस हजार प्रति वर्ष थी, जो 2005-06 तक बढ़कर 75 हजार पहुंच गई.

 

इसका मतलब है कि वहां रोजाना करीब ढाई सौ प्रदर्शन हो रहे हैं. देहात के इलाकों में भारी उद्योगीकरण के कारण टिकाऊ कृषि व्यवस्था में हड़कंप मच गया है. इस कारण उसके पास देश से बाहर भूमि की तलाश ही एकमात्र रास्ता बचा है. भारत भी चीन के साथ अंधी दौड़ में यह दोषपूर्ण प्रतिमान हासिल करने की सोच रहा है. हाल ही में खाद्य दंगों को झेलने वाले मिस्र ने बर्र का छत्ता छेड़ दिया है.

 

उसने रहस्योद्घाटन किया है कि आठ लाख चालीस हजार हेक्टेयर भूमि, जो युगांडा के भूभाग का ढाई प्रतिशत है, के संबंध में करार प्रक्रिया जारी है. इस भूमि पर गेहूं और मैदा का उत्पादन कर इसे वापस मिस्र को निर्यात किया जाएगा. दुविधा के शिकार कई अन्य देश हैं. एक तरफ तो वे दूसरे देशों में भूमि की तलाश कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ कंपनियां उन्हीं के देश में भूमि में निवेश कर रही हैं.

बार्सिलोना स्थित ग्रेन द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार जापान की बड़ी खाद्य कंपनियों ने चीन, ब्राजील, अफ्रीका और मध्य एशिया में सैकड़ों हेक्टेयर कृषि भूमि खरीदी है. मौजूदा समय आर्थिक मंदी की चर्चाओं के बीच अगर आपको हैरानी हो रही है कि करदाताओं की कीमत पर बेलआउट पैकेज कहां जा रहा है तो अपनी सांस रोक लीजिए.

 

गोल्डमैन सैश और ड्यूश बैंक चीन के पशुधन उद्योग पर नजरे गड़ाए हैं. मार्गन स्टेनले ने यूक्रेन में चालीस हजार हेक्टेयर भूमि खरीद ली है. ब्रिटिश निवेश समूह लैंडकोम भी यूक्रेन में एक लाख हेक्टेयर भूमि खरीद चुका है. स्वीडन की दो निवेश फर्म ब्लैक अर्थ फार्मिग और आल्पकोट एग्रो ने रूस में क्रमश: 3.31 लाख और 1.28 लाख हेक्टेयर भूमि खरीद ली है. यह सूची बढ़ती जा रही है. स्पष्ट है कि खाद्य पदार्थो की राजनीतिक अर्थव्यवस्था फिर से लिखी जा रही है. नि:संदेह इसके गंभीर नतीजे निकलेंगे.

 

09.11.2008, 15.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sandeep Diwan (sandeepdeewan@yahoo.co.in) Raipur, Chhattisgarh

 
 खतरे में खेती, जैसी आत्मा है वैसा ही उसका शरीर। आपने वाकई में सहीं कहा है। आज वर्तमान में जो परिदृश्य सामने है उसे आपने शब्दों में जीवंत कर दिया। इसके लिए आप बधाई स्वीकारें। आज तमाम तरह की परेशानी है, लेकिन जिस बेबाकी से आपने लिखा है वह तारीफे काबिल है। इस लेख के माध्यम से तमाम तरह की जानकारी मुझे प्राप्त हुई इसके लिए आपको साधुवाद।  
   
 

nitish kumar singh (chandan.varanasi@yahoo.co.in) varanasi

 
 This report is very wonderful and every person should read this matter. It is very necessary. 
   

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