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दास्तां-ए-मानुष | बुरुवा

दास्तां-ए-मानुष अंतिम

वार्तालेख


पीयूष दईया

 

सन् 1999 में उत्तराखंड के रांउलेक गांव, ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए भू-स्खलन से प्रभावितों के विवरण आपने पांच किश्तों में पढ़े. यहां प्रस्तुत है इस श्रृंखला की छठवीं और अंतिम किश्त.

 

 

ढूंढ़ें कहां, रोये किसे

कुंवर सिंह एवं राजेश्वरी देवीः गांव बुरुवा, पोस्ट मनसूना, के दंपत्ति

 

17 अगस्त, सन् 1998 की रात भेंटी पोण्डार भूस्खलन में आपका चौदह बरस का बेटा संजय व आपके भाई तथा भाभी का भूस्खलन में दब जाने की वजह से निधन हो गया था और वे अपने पीछे अपने दो बच्चों--नौ साल के बेटे रंजन व छ: साल की बेटी रजनी को छोड़ गये.
प्रस्तुत विवरण कुछ परिवारों से की गई वार्ता पर आधारित है.


11 अगस्त 1998 की रात इस क्षेत्र में बादल फटने की वजह से भूस्खलन हुआ था और बुरूवा गांव के भेंटी नामक हेमलेट में तीन व्यक्ति मर गये थे. यहां आठ-नौ परिवार रह रहे थे. घटना के बाद बचे हुए सभी परिवार बुरूवा गांव के खेतों में तिरपाल की झोंपड़ी बना कर रहने लगे. इन्हीं लोगों में कुंवर जी की भाभी शान्ति देवी भी थी, जिनके पति राजेन्द्र सिंह दिल्ली में किसी फैक्ट्री में नौकरी करते थे और घटना का पता चलने पर वे 16 अगस्त को वहां पहुंचे.

 

उनके आने तक बारिश बंद हो चुकी थी और माहौल व मौसम सामान्य होने लगा था. सो उन्होंने आने के बाद अपनी पत्नी के साथ विचार किया और यह निर्णय लिया कि सबको वापस भेंटी चले जाना चाहिए. रंजन और रजनी अपनी अध्यापिका बुआ के साथ मनसूना में ही रह गये थे क्योंकि बारिश की वजह से पहले सड़कें भी क्षतिग्रस्त हो गयीं थी.

जब राजेन्द्र सिंह भेंटी जाने लगे तब उन्हें जाता देखकर अन्य सब परिवारों ने भी वापस भेंटी जाने का निर्णय ले लिया लेकिन स्थानीय लोगों ने सबको यह समझाने की कोशिश की कि अभी भेंटी जाने में खतरा है लेकिन राजेन्द्र जी दूसरे तीन परिवारों के साथ वापस भेंटी लौट गये और कुछ परिवार वहीं रह गये.

भेंटी आने पर सारा दिन तो ठीक बीता लेकिन रात में करीब साढे ग्यारह बजे के आसपास फिर से बारिश होने लगी और भोर से पहले लगभग तीन बजे कान फोड़ देने वाले भयंकर विस्फोट-सी आवाज़ हुई और सदा के लिए दोनों गांवों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया.

रात में बुरूवा गांव के कुछ लोगों को भेंटी की ओर देखा तो गया लेकिन एक तो अंधेरा था और दूसरा बड़े-बड़े पत्थरों का गिरना तथा उनकी गड़गड़ाहट का शोर इतना ज्यादा आतंकित कर देने वाला था कि कोई भी यह साहस नहीं जुटा सका कि वह उस तरफ़ जा सके. सबको लगा कि अब वे लोग जीवित नहीं बचे हैं.

सुबह के उजाले में जो मंजर दिखा वह नरक के अंधेरे से भी भयानक था-सारा पहाड़ उलट चुका था और भेंटी व पोण्डार का नामोनिशान तक नहीं बचा था. पोण्डार के ऊपर जो बांज के पेड़ खड़े थे, वे भेंटी वाले पहाड़ के थे और जहां कल तक भेंटी था, वहां उसकी जगह अब गहरी खाई नज़र आ रही थी. दोनों के बीच में मिट्टी और पत्थर की जैसे दीवार खड़ी थी जिसके चलते झील बन गयी थी. मद्महेश्वर गंगा में कहीं पानी नहीं था और भेंटी के चार परिवारों के तेरह सदस्य दफ्न हो चुके थे.

गांव के कुछ लोग किसी तरह जानकारी देने ऊखीमठ तहसील पहुंचे. सुबह आठ-नौ बजे तक तहसील स्तर का पूरा प्रशासन यहां पहुंच चुका था. ग्यारह-बारह अगस्त को हुई घटना के कारण पहुंचे सभी अधिकारियों ने पूरा गांव खाली करवाया और सभी गांववासियों ने मनसूना रा. इण्टर कॉलेज के भवन में शरण ली. पन्द्रह-सोलह दिन तक पूरा गांव वहीं रहा. अनुसूचित जाति और सामान्य जातियों के शिविर अलग अलग लगे थे.

 

स्थानीय प्रशासन ने पहले दिन तो सवर्ण जाति के लोगों को भोजन बनाने के लिए लगाया और सभी को एक मेस में खिलाया हालांकि वहां पर दोनों वर्गो-जातियों-के लोग अलग अलग बैठे थे. उसके कुछ दिनों बाद तक दोनों जातियों के लिए अलग अलग मेस की व्यवस्था हो सकी और उसके बाद हर परिवार ने अपने कुछ और मित्र परिवार के साथ मिलकर अलग अलग खाना बनाना शुरू कर दिया.

पूरे शिविर के दौरान महिलाओं व बच्चों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं थी. सभी लोग एक स्थान पर तिरपाल/बिस्तर बिछा कर सोते रहे. अपने बच्चों की देखभाल के सन्दर्भ में सभी माता-पिताओं को अनेकानेक समस्याओं का सामना दिन-प्रति-दिन करते रहना पड़ा.

एक और व्यावहारिक संकट यह भी रहा कि वहां शौचालय आदि की अलग से कोई व्यवस्था नहीं हो सकी थी. सभी को नज़दीक के खेतों व पगडण्डियों की ओर हाजत रफा करने के लिए जाना पड़ता था और इससे आसपास के गांववासियों ने न केवल अपने एतराज दर्ज करना शुरू कर दिया बल्कि गाली-गलौच भी. शरणार्थियों के पास भी कोई और उपाय नहीं था. शरणार्थियों ने अपने पालतु पशुओं को तो गांव में ही छोड़ रखा था. सो दिन में उनके चारा-पानी के लिए उन्हें जाना पड़ता था और शाम ढले वे वापस शिविर में लौटते. अब पशुओं के लिए अलग से चारे-पानी की कोई सुविधा या सम्भावना न होने की वजह से उन्हें खेतों में छोड़ना पड़ता था जबकि उस दौरान खेतों में फसल पक चुकी थी.

अन्तत: कहीं कोई विकल्प न बन पाने के चलते पन्द्रह-सत्रह दिनों में ही सभी को शिविर से अपने गांव लौट आना पड़ा. एक तो इसलिए कि आसपास के गांववासी उन्हें वहां रहने नहीं दे रहे थे-गाली-गलौच की स्थितियां बढ़ने लगी थी. दूसरा बच्चे बेचैन थे और फिर स्थानीय विद्यालय के लोग भी यह बात उठाने लगे कि उनके विद्यालय का माहौल खराब होने लगा है.

भूस्खलन के बाद से अब तक यहां कोई आया नहीं है जो यह बताए कि इन आपदाओं से कैसे बचा जा सकता है या कि आपदा आने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

 

अलावा इसके पशुओं की देखरेख भी करनी होती थी क्योंकि उनके लिए भी इतने दिनों से ठीक तरह से चारे-पानी का बंदोबस्त नहीं हो पा रहा था. उन दिनों पशुओं ने घास भी बहुत कम खाया और वे इतने डरे हुए रहने लगे कि अगर वे अपने मालिक या आदमियों को अपने इर्दगिर्द न देखते-पाते तो आवाज़ करने लगते और इधर-उधर बेकाबू हो डरे हुए दौड़ने-बिगड़ने लगते.

इन पन्द्रह-सत्रह दिनों में शिविर में सभी शरणार्थियों का अनुभव बहुत नारकीय रहा. वहां का वक्त इस तरह कट रहा था जैसे किसी भिखारी का. खाने के लिए जो राशन मिल रहा था उसमें अक्सर दालों में कीड़े रेंगते हुए नज़र आते या कंकड़ मिलते. जब राहत की गाड़ियां आतीं तो लोग वहां मानवीय उम्मीद से जमा तो होते पर उन्हें जो कपड़े मिलते वे अक्सर फटे-पुराने या गंदे होते. कुछ राहत वाले तो ऐसे भी आए जो यह मांग रखते कि पहले ''जय शंकराचार्य कहो'' तब राहत का सामान देंगे. इस तरह की जिल्लत सहते-सहते सभी को यह लगने लगा था कि ''इससे तो अच्छा यह रहता कि हम मर जाते.''

जहां तक सवाल विस्थापन या पुनर्वास का है उसमें अगर सही व्यवस्था व सुरक्षित जीवन मिल सके तो कहीं और जाकर रहा जा सकता है लेकिन विकल्प न होने से विवश हो यही सोच बन पाती है कि जाएं तो जाएं कहां.

उल्लेखनीय यह भी है कि उन दिनों के बाद से अब तक वहां कोई आया नहीं है जो यह बताए कि इन आपदाओं से कैसे बचा जा सकता है या कि आपदा आने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं-किसी तरह की कोई नयी जानकारी नहीं दी गयी है-न तो शासन की ओर से और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से.

 

इन सब चीज़ों को घटे इतने साल बीत चुके हैं लेकिन अब भी वहां जीवन मानो बारह में से छ: महीनों के लिए ही बचा है. बारिश आते ही या प्रकृति की कोई और हलचल होते ही प्राण गले में अटक जाते हैं और रात भर कोई सो नहीं पाता. उठ उठ कर बाहर खेतों में जाकर लोग यह देखते हैं कि कहीं कोई दरार तो नहीं आ गयी है या कहीं भू-स्खलन का ख़तरा तो फिर से कहीं सिर पर मंडराने नहीं लगा है. जीवन इस तरह बीत रहा है जिसमें लोग चौबीसो घंटे इस तरह जी रहे हैं मानो भागने के लिए तैयार खड़े हो. पहले जैसा जीवन अब कभी वापस नहीं आ सकेगा-कभी नहीं.

समाप्त


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.11.2008, 20.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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